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How PV Narasimha Rao was humiliated in death by Sonia lead Congress

The corpse was clad in white dhoti and golden silk kurta. At 2.30 p.m., it was brought from Delhi’s All India Institute of Medical Sciences to 9 Motilal Nehru Marg. P.V. Narasimha Rao, prime minister of India from 1991 to1996, had died at around 11 a.m., 23 December 2004. The doctors had needed a couple of hours to dress the body before sending it back home.

One of the first people to arrive at Rao’s house was Chandraswami, the bearded guru who had known him since 1971. Also present were his eight sons and daughters —whom he had kept at a distance — as well as the nephews and grandchildren he had been closer to. Eldest son, Ranga Rao — who had fought bitterly with his father — inconsolable.

Then began the politics.

The home minister, Shivraj Patil, suggested to Rao’s youngest son, Prabhakara, that ‘the body should be cremated in Hyderabad’. But the family preferred Delhi. After all, Rao had last been chief minister of Andhra Pradesh more than thirty years ago, and had since worked as Congress general secretary, Union minister, and finally primeminister — all in Delhi. On hearing this, the usually decorous Shivraj Patil snapped, ‘No one will come.’

Kashmiri Congressman Ghulam Nabi Azad, another aide of party president Sonia Gandhi, arrived. He too requested the family to move the body to Hyderabad. An hour later, Prabhakara received a call on his mobile phone. It was Y.S. Rajasekhara Reddy, the Congress chief minister of Andhra Pradesh and no friend of Narasimha Rao’s. ‘I just heard about it,’ Reddy said, ‘I am near Anantapur, and I’ll be in Delhi by this evening. Take it from me. We will give him a grand funeral [in Hyderabad].’

At 6.30 p.m., Sonia Gandhi entered the house in Motilal Nehru Marg, named after her great-grandfather-in-law. Prime minister Manmohan Singh followed, along with Pranab Mukherjee. They walked through the long corridor to the room at the end where Rao’s body, now decked in flowers, was displayed. ‘What do you want to do with the body?’ the prime minister asked Prabhakara. ‘These people say it should be inHyderabad.’ ‘This [Delhi] is his karmabhoomi,’ Prabhakara replied, ‘you should convince your Cabinet colleagues.’ Manmohan nodded. Sonia Gandhi was standing nearby. She said little.

The journalist Sanjaya Baru arrived. His bureaucrat father knew Rao from the 1960s. As Baru entered the corridor, Sonia’s political secretary tapped him on the shoulder. ‘You know the family,’ Ahmed Patel said. ‘The body should be taken to Hyderabad. Can you convince them?’ Baru continued walking towards the end of the corridor, when he heard someone cry. He turned left to see Kalyani Shankar sobbing in a sideroom. Kalyani had been Rao’s most trusted friend for the last two decades.

Y.S. Rajasekhara Reddy had by now reached Delhi. ‘It is our government, trust me,’ he told Rao’s family. ‘Let him be moved to Hyderabad. We will build a grand memorial for him there.’ Rao’s daughter S. Vani Devi says, ‘YSR was playing a major role in convincing [the] family to get the dead body to Hyderabad.’

The family wanted a commitment that a memorial would be built for Rao in Delhi. The Congress leaders present said yes. But considering how the party had treated Rao in his retirement, the family wanted to make doubly sure. At 9.30 p.m., they paid a visit to the one man who had stood by Narasimha Rao in the last years of his life. Manmohan Singh was wearing his nightdress, a white kurta-pyjama, when Rao’s family met him at his official residence on Race Course Road. When Shivraj Patil explained the demand for a memorial in Delhi, Manmohan replied, ‘No problem, we will do it.’ Prabhakara recalls, ‘We sensed even then that Sonia-ji did not want Father’s funeral in Delhi. She did not want a memorial [in Delhi] . . . She did not want him [to be seen] as an all-India leader . . . [But] there was pressure.’

‘We agreed.’

The next day, 24 December 2004, leaders from across the political spectrum —from communists to BJP leaders — all came to pay their respects. At 10 a.m., the body was draped in the national flag, put on a flower-decked carriage pulled by an army vehicle, and escorted by military personnel in a slow procession towards the airport. Along the way, they planned to stop at 24 Akbar Road, the Congress party headquarters. Ever since Narasimha Rao had first moved into 9, Motilal Nehru Marg in 1980, he had made this journey countless times.

As the body approached 24 Akbar Road, located adjacent to Sonia Gandhi’s residence, the funeral procession slowed. The entrance gate to the compound looked firmly shut. There were several senior Congressmen present, but hardly any cadres had been rustled up. No slogans filled the air, just deathly silence. The carriage stopped on the pavement outside, as Sonia Gandhi and others came out to pay their respects.

It was customary for the bodies of past Congress presidents to be taken inside the party headquarters so that ordinary workers could pay their respects. The family was somewhat dazed when this did not happen. A friend of Rao’s asked a senior Congresswoman to let the body in. ‘The gate does not open,’ she replied. ‘This was untrue,’ the friend remembers.‘When Madhavrao Scindia died [some years earlier] the gate was opened for him.’ Manmohan Singh now lives in a guarded bungalow a few minutes from Akbar Road. When asked why Rao’s body wasn’t allowed into the Congress headquarters, he replies that he was present, but has no knowledge of this. Another Congressman is more forthcoming. ‘We were expecting the gate to be opened . . . but no order came. Only one person could give that order.’

He adds, ‘She did not give it.’

Source : Swarajya



बंधुभाव होगा तो देश बचेगा– भीमराव अम्बेडकर

बंधुभाव होगा तो देश बचेगाअम्बेडकर

दत्तोपन्त ठेंगड़ी

संघ की भूमिका

कुछ वर्ष पूर्व वसन्त व्याख्यानमाला में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्तमान सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने सामाजिक समता और हिन्दू संगठन विषय पर बोलते हुए कहा था –

“यदि अस्पृश्यता गलत नहीं है तो दुनिया में कुछ गलत नहीं है । महाराष्ट्र प्रान्त के तलजाई शिविर में उन्होंने घोषित किया था कि समतायुक्त और शोषणमुक्त हिन्दू समाज का निर्माण ही हमारा ध्येय है । अभी पिछले विजयादशमी महोत्सव में नागपुर में बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में जितने अन्तर्जातीय विवाह हुए हैं, उतने अन्यत्र कहीं भी किसी भी सामाजिक संस्था के सदस्यों में नहीं हुए हैं । हम लोग प्रचार और विज्ञापनबाजी नहीं करते। इसीलिए लोगों को यह पता नहीं है । किन्तु यह बात समाज को ध्यान में रखनी चाहिए कि अस्पृश्यता हिन्दू समाज पर कर्ज रूप में लदी है और वह कर्ज समाज को चुकाना होगा । पूर्वाग्रह दूषित तथाकथित प्रगतिशील नेता चाहे जो कहें, संघ के तीनों सरसंघचालकों द्वारा समझायी गयी भूमिका, रामजन्मभूमि पर  ‘अछूत’ कहे जाने वाले बन्धु से विश्व हिन्दू परिषद् द्वारा कराया गया शिलान्यास, नासिक के कालाराम मन्दिर में बाबा साहब के साथ में मन्दिर प्रवेश हेतु सत्याग्रह करने वाले बसु द्वारा राम ज्योति का प्रज्वलित करना और अब स्वयंसेवकों द्वारा महाराष्ट्र में “महात्मा फूले – डॉ. अम्बेडकर संदेश यात्रा”  का आयोजन, ये ऐसी घटनाएँ हैं जिनसे बाबा साहब अम्बेडकर संतुष्ट ही होते ।

सामाजिक समरसता निर्माण हुए बगैर सामाजिक समता नहीं स्थापित हो सकती, ऐसी धारणा पूज्य डॉ. हेडगेवार के समान ही पूज्य बाबासाहब की भी थी । उन्होंने २५ नवम्बर, १९४७ को दिल्ली में कहा था – हम सब भारतीय परस्पर सगे भाई हैं – ऐसी भावना अपेक्षित है । इसे ही ‘बंधुभाव’ कहा जाता है और आज उसी का अभाव है । जातियाँ आपसी ईर्ष्या और द्वेष बढ़ाती हैं । अत: यदि ‘राष्ट्र’ के उच्चासन तक हम पहुँचना चाहते है तो इस अवरोध को दूर करना होगा, तभी बन्धुभाव पनपेगा । बन्धुभाव ही नहीं रहेगा तो समता, स्वाधीनता सब अस्तित्वहीन हो जायेंगे ।“

बन्धुभाव की गारंटी

एक अन्य अवसर पर बाबसाहब ने कहा – “मेरा तत्त्वज्ञान राजनीति से नहीं, धर्म से उपजा है । भगवान बुद्ध के उपदेशों से मैंने वह ग्रहण किया है । उसमें स्वाधीनता और समता को स्थान है । किन्तु अपरिमित स्वाधीनता से समता का नाश होता है और विशुद्ध समता में स्वाधीनता का स्थान नहीं रहता । मेरे तत्त्वज्ञान में स्वाधीनता और समता का उल्लंघन न हो केवल इसलिए सुरक्षा के नाते विधान (कानून) के लिए जगह है। किन्तु कानून ही स्वाधीनता और समता की गारंटी है ऐसा मैं नहीं मानता । इसीलिए मेरे विचार में बन्धुभाव के लिए बड़ा ऊँचा स्थान है । स्वाधीनता और समता के उचित परिपालन में केवल ‘बन्धुभाव’ ही सुरक्षा की गारंटी हो सकता है । इसी बन्धुता का दूसरा नाम मानवता है और मानवता ही धर्म है ।“

हिन्दू संगठन के लिए संघ के उपक्रम के मूल में यही भावना निहित है यह सभी जानते हैं । ‘सर्वेषांऽविरोधेन’ काम करने की संघ की पद्धति है । संघ का काम बढ़ता देखकर कुछ लोगों के पेट में दर्द होता है । ये ऐसे कुछ समाजवादी प्रगतिशील कहलाने वाले महाराष्ट्र के नेता हैं जो कभी चार लोगों को भी अपने साथ लेकर नहीं चल सके । उनकी उस बाँझ महिला जैसी स्थिति है जिसे दूसरों के बच्चे होना बर्दाश्त नहीं होता । इस मनःस्थिति के कारण ही संघ का विरोध करना वे अपना एक मात्र कार्य मानते हैं । ऐसे लोगों को समझाना व्यर्थ है, क्योंकि सोते हुए को उठाया जा सकता है, सोने का नाटक करने वाले को नहीं उठाया जा सकता । इन प्रगतिशील महानुभावों का उद्देश्य विरोध के लिए विरोध करना मात्र है । समाचार-पत्र ही इनके एक मात्र शक्तिस्रोत हैं । उनके माध्यम से वे रणनीति के रूप से सतत् प्रयास करते रहे कि दलित समाज और संघ परस्पर विरोधी हैं – ऐसा आभास निर्माण किया जाये । इसीलिए इन लोगों ने यह प्रचार जोरों से किया कि नागपुर में संघ का मुख्यालय होने के कारण संघ को मानो चिढ़ाने के लिए ही बाबासाहब ने धर्मान्तरण के लिए नागपुर चुना। इससे जो गलतफहमी दलित और सवर्ण समाज में फैली, उसकी ओर बाबासाहब का ध्यान गया । इसलिए उन्होंने आरम्भ में ही कहा कि नागपुर का चुनाव भारत के मध्य में होने के कारण शास्त्रशुद्ध रीति से किया गया । उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “जो लोग ऐसा आरोप लगा रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केन्द्र होने के कारण उन्हें चिढ़ाने के लिए मैंने नागपुर का चुनाव किया, उनकी यह सोच असत्य और द्वेष-प्रेरित है ।“

संघ से सम्पर्क

बाबासाहब को संघ के विषय में पूरी जानकारी थी । १९३५ में वह पुणे में महाराष्ट्र के पहले संघ शिविर में आये थे । उसी समय उनकी डा. हेडगेवार से भी भेंट हुई थी । वकालत के लिए वे दापोली (महाराष्ट्र) गये थे, तब भी वे वहाँ की संघ शाखा में गये थे और संघ स्वयंसेवकों से दिल खोलकर संघ कार्य के बारे में चर्चा की थी । १९३७ की करहाड शाखा (महाराष्ट्र) के विजयादशमी उत्सव पर बाबासाहब का भाषण और उसमें संघ के विषय में प्रगट किये गये उनके विचार जिन्हें आज भी स्मरण हैं, ऐसे लोग आज भी वहाँ हैं । सितम्बर  १९४८ में श्री गुरुजी और बाबासाहब की दिल्ली में भेंट हुई थी। गांधीजी की हत्या के बाद सरकार ने द्वेष के कारण संघ पर प्रतिबंध लगाया था, उसे हटवाने के लिए पू. बाबासाहब, सरदार पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने कोशिश की थी । १९३९ में पूना संघ शिक्षा वर्ग में सायंकाल के कार्यक्रम हेतु बाबासाहब आये थे । डा. हेडगेवार भी वहीं थे । लगभग ५२५ पूर्ण गणवेशधारी स्वयंसेवक संघस्थान पर थे । बाबासाहब ने पूछा, ‘इनमें अस्पृश्य कितने हैं ?’ डा. हेडगेवार ने कहा, ‘अब आप पूछिए न?’ बाबासाहब ने कहा, “देखो, मैं पहले ही कहता था ।“  इस पर डा. हेडगेवार ने कहा, “यहाँ हम अस्पृश्य हैं ऐसा किसी को कभी लगने ही नहीं दिया जाता । अब यदि चाहें तो जो उपजातियाँ हैं, उनका नाम लेकर पूछिए ।“ तब बाबासाहब ने कहा – “वर्ग में जो चमार, महार, मांग, मेहतर हों वे एक-एक कदम आगे आयें ।“ ऐसा कहते ही कोई सौ से ऊपर स्वयंसेवक आगे आये ।

१९५३ में मा. मोरोपंत पिंगले, मा. बाबासाहब साठे और प्राध्यापक ठकार औरंगाबाद में बाबासाहब से मिले थे । तब उन्होंने उनसे संघ के बारे में ब्योरेवार जानकारी प्राप्त की । शाखाएँ कितनी हैं, संख्या कितनी रहती है आदि पूछा । वह जानकारी प्राप्त करने के बाद बाबासाहब मोरोपंत जी से कहने लगे, “मैंने तुम्हारी ओ.टी.सी. देखी थी । उसमें जो तुम्हारी शक्ति थी, उसमें इतने वर्षों में । जितनी होनी चाहिए थी उतनी प्रगति नहीं हुई । प्रगति की गति बड़ी धीमी दिखाई देती है । मेरा समाज इतने दिन प्रतीक्षा करने को तैयार नहीं है ।“

धर्मान्तरण के पूर्व

धर्मान्तरण के कुछ दिन पूर्व मैंने उनसे पूछा था, बीते समय में कुछ अत्याचार हुए तो ठीक है, लेकिन अब हम कुछ तरुण लोग जो कुछ गुणदोष रहे होंगे, उनका प्रायश्चित करके नयी तरह से समाज रचना का प्रयास कर रहे हैं, यह बात आप के ध्यान में है क्या? ‘यू मीन आर. एस. एस.?  उन्हें यह पता था कि मैं संघ का प्रचारक हूँ उन्होंने कहा, ‘क्या तुम समझते हो मैंने इस बारे में विचार नहीं किया ?

आगे उन्होंने बताया संघ १९२५ में बना । आज तुम्हारी संख्या २७-२८ लाख है, ऐसा मानकर चलते हैं । इतने लोगों को एकत्र करने में आपको २७-२८ वर्ष लगे । तो इस हिसाब से सारे समाज को इकट्ठा करने में कितने साल लगेंगे । मैं जानता हूँ कि गणितीय और ज्योमितीय प्रगति एक जैसी नहीं होती । लेकिन मेढ़क कितना भी फूले, वह बैल तो नहीं बन सकता । इनमें जितना समय लगेगा उससे न तो परिस्थिति ही प्रतीक्षा करेगी, न ही मैं । मेरे सामने प्रश्न यह है कि मुझे जाने से पहले अपने समाज को एक निश्चित दिशा देनी चाहिए । क्योंकि यह समाज अब तक दलित शोषित पीड़ित रहा है; और उसमें जो नयी चेतना आ रही है उसमें व्यवस्था के प्रति रोष का होना स्वाभाविक है । इस प्रकार का जो समाज है वह कम्युनिज्म का लक्ष्य बन सकता है । मैं ऐसा होना उचित नहीं समझता । इसलिए राष्ट्र की दृष्टि से कोई न कोई दिशा देनी आवश्यक है, यह मैं मानता हूँ । आप संघ वाले भी राष्ट्र की दृष्टि से प्रयत्न करते हैं, किन्तु यह ध्यान रखें कि –

‘अनुसूचति जातियों और कम्युनिज्म के बीच अम्बेडकर अवरोध हैं तथा सवर्ण हिन्दुओं और कम्युनिज्म के बीच गोलवलकर अवरोध हैं ।’ यह शब्दश: उनका कथन है ।

राष्ट्रहित में परम साहसी अम्बेडकर

बाबासाहब पं. नेहरू की विदेश नीति के कटु आलोचक थे । उन्होंने कहा था, एक ओर मुस्लिम देश आसानी से पाकिस्तान के साथ मिलकर गुट बना सकते हैं और इस ओर चीन को ल्हासा पर कब्जा कर लेने देने से हमारे प्रधानमंत्री ने चीन को हमारी सीमा के पास तक आ भिड़ने में मदद की है । संविधान में धारा ३७० जोड़ने के बारे में भी बाबासाहब को इसके लिए सहमत करने की जिम्मेदारी पं. नेहरू ने शेख अब्दुल्ला पर सौंपी थी । प्रत्यक्ष चर्चा में भाग लेना इस संकेतात्मक बन्धन के कारण संभव न होने से बाबासाहब ने ३७० धारा का विरोध करने का काम अपने मित्र मौलाना हसरत, मोहानी से करवाया।

भाषावार प्रान्त रचना देश के लिए घातक होगी, यह चेतावनी देने का कार्य केवल दो महापुरुषों ने ही किया था एक परम पूजनीय गुरुजी, दूसरे पूज्य डॉ. बाबासाहब अम्बेडकर । राज्य के पुनर्गठन में उनकी अवधारणा की इकाइयाँ  (यूनिट्‌स) पं. दीनदयाल जी की जनपद अवधारणा से मेल खाती थी।

शूद्र भी क्षत्रिय थे यह उनके द्वारा प्रमाणित किये जाने पर अनेक लोग बेचैन हो उठे थे । राष्ट्रहित की ओर सच बात निर्भीकतापूर्वक प्रकट करने का साहस उनमें था । कांग्रेस, ब्रिटिश सरकार, मुस्लिम लीग, सनातनी, सवर्ण धर्माचार्य – इन सबके सामने तो उन्होंने निडर होकर अपना सत्य पक्ष रखा ही, लोकमान्य तिलक के आर्यों के भारत आगमन के निष्कर्ष को भी उन्होंने निडर होकर चुनौती दी थी और उसका खंडन किया था । इतना ही नहीं जिनको वे गुरु मानते रहे उन महात्मा फुले के ब्राह्मणों के ईरान से भारत में आने के सिद्धांत का भी उन्होंने खंडन किया था ।

अम्बेडकर की महानता

१४ अप्रैल, १९४२ को बाबासाहब के ५०वें जन्म दिवस पर शुभकामनाएँ देते हुए स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने लिखा था, “अम्बेडकर अपने व्यक्तित्व, विद्वता, संगठन कुशलता और नेतृत्व कुशलता के कारण ही देश के एक आधारभूत महापुरुष गिने जा सकेंगे । किन्तु अस्पृश्यता के उन्मूलन और लाखों अस्पृश्य बस्तुओं में साहसपूर्ण आत्म-विश्वास और चेतना जगाने में जो यश उन्हें मिला है उससे उनके द्वारा भारत की अमूल्य सेवा हुई है । यह उनका कार्य चिरंतन स्वरूप का, देशभक्ति पूर्ण और मानवतावादी है । अम्बेडकर जैसे महान् व्यक्ति का जन्म, तथाकथित अस्पृश्य जाति में हुआ यह बात अस्पृश्य वर्ग की निराशा मिटा कर कथित स्पृश्यजनों के थोथे व्यक्तित्व एवं बड़प्पन को चुनौती देने की प्रेरणा उन्हें दिये बगैर नहीं रहेगी । अम्बेडकर के प्रति आदर रखते हुए मैं उनके स्वस्थ दीर्घ जीवन की कामना करता हूँ जिससे वे अपने समाज में बड़े प्रभावी परिवर्तनकारी अभियान चला सके ।“

बाबसाहब की नियुक्ति संविधान सभा द्वारा ध्वज समिति के सदस्य के रूप में होते ही हिन्दुत्वनिष्ठ नेताओं ने उनसे अनुरोध किया था कि वे भगवा ध्वज को राष्ट्र ध्वज के रूप में प्रस्तुत करें ।

११ सितम्बर, १९४९ को ‘संडे स्टैंडर्ड’ ने छापा कि भारत के कानून मन्त्री डॉ. अम्बेडकर उन लोगों में हैं जिन्होंने भारत की राजभाषा संस्कृत बनाने का प्रस्ताव रखा है । इस विषय में पूछने पर डॉ. अम्बेडकर ने पी.टी.आई. संवाददाता से कहा, “संस्कृत में क्या हर्ज है? भारत की राजभाषा संस्कृत होगी” यह संशोधन का मूल पाठ है ।

Newspaper clippings of 1949

हमारे बाला साहब – On Sri Balasaheb Deoras by Sri Dattopant Thengadi

हमारे बाला साहब

– दत्तोपंत ठेंगड़ी

प. पू. बालासाहब के साथ कई दशको तक घनिष्ठ संबंध रहा । ऐसे मेरे जैसे व्यक्ति के लिये आज के इस अवसर पर कुछ भी बोलना कितना कठिन है इसकी कल्पना आप कर सकते है । शायद यदि किसी को कल्पना न होगी तो अपनी भावनाओं के बारे में हमारे मान्यवर जगजीत सिंह जी ने जो बताया कि प्रगट करना बहुत कठिन हो जाता है । उसी का अनुभव मैं ले रहा हूँ । जैसा कहा गया कि खामोश गुप्तगूं है “आज बेजुबाँ है जबाँ मेरी” हम में से बहुत सारे लोगों की अवस्था इस समय एसी ही होगी, ऐसा में समझता हूँ । किन्तु एक कर्तव्य के नाते इस समय पर कुछ बोलना है इसी नाते बोलने का साहस कर रहा हूँ ।

यह मासिक स्मृति दिन मनाया जा रहा है । मा. सरकार्यवाह श्री. शेषाद्री जी के आदेश के अनुसार ‘सामाजिक समरसता’ दिन इस नाते इसको हम मना रहे है । बालासाहेब का पूरा जीवन हमारे सामने है । His life was an open book कई नेताओं का जीवन इतना open नही रहता । बालासाहब का जीवन open book जैसा जीवन रहा । जीवन के अंतिम चरण में विकलांग अवस्था के कारण उनको कितनी असुविधा बर्दाश्त करनी पडी, कष्ट बर्दाश्त करने पडे, हममे से बहुत लोगों ने उनका दर्शन करते हुए यह आखों से देखा है । कई वर्ष तक वो विकलांग थे किन्तु इसके कारण एक भ्रांति जिन्होने उनको नजदीक से देखा नही उनको मन में रही कि विकलांग है, अब कुछ काम काम नही कर सकते । निरूपयोगी हो गये ऐसी भ्रांति अपरिचित लोगों के मन में हो सकती थी । वह गलत थी । भीष्म पितामह सरशैय्या पर थे, हलचल नही कर सकते थे किन्तु उस अवस्था में भी युधीष्ठर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा ”धर्म और अधर्म इसका निर्णय कर लेना चाहता हूँ ” तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा इसका निर्णय करने के लिए अधिकारी पुरूष भीष्म पितामह ही है । मै तुमको उनके पास ले जाता हूँ । ठीक यही अवस्था जब सरशैय्या पर बालासाहब थे, हलचल नही कर सकते थे तो भी सभी को मार्गदर्शन करना, सलाह देना, सभी की बाते सुनना ये सारा कार्य उनका चल रहा था । शरीर विकल था, बुद्धी विकल नही थी यही विशेषता थी । Intellectual capacity, memory intact थी और इसके कारण कोई भी समस्या लेकर भी जाता था, उसका उचित मार्गदर्शन करते थे । कोई भी मिलने को आया तो उसको ठीक ढंग से पहचानते थे । उसके बारे में, उसके परिवार के बारे में, उसकी शाखा के बारे में पूछते थे । सारे समाचार पत्र, जो भी उपलब्ध थे, हर दिन पढ़वा लेते थे । टी. वी. पर आधुनिक समाचार क्या है यह भी बारीकी से देखते थे । राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्र में क्या हो रहा है, इसका इनका निरीक्षण बराबर चलता था । sharp Intellect, sharp memory आखिर तक थी । बिलकुल अंतिम चरण तक थी । और इसी कारण राजनैतिक क्षेत्र में क्या उथल-पुथल हो रही है, सामाजिक क्षेत्र में क्या गलत बाते हो रही है सभी बातों का उनका निरीक्षण रहता था । और इस दृष्टि से मार्गदर्शक के नाते भीष्म पितामह के समान उनकी भूमिका हमेशा रहती थी ।

संघ के कार्यकर्ता, इतना ही नही तो स्वयंसेवकों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न संस्थाएं उनके कार्यकर्त्ता को भी मार्गदर्शन करने का काम उस विकलांग अवस्था में भी उन्होने किया यह एक उल्लेखनीय बात है । उनकी सारी उत्कृष्ट भावनाएँ संघ के स्वयंसेवक के नाते, सर संघचालक के नाते , उस विकलांग अवस्था में भी यथापूर्व कायम थी । वे हमेशा स्वयंसेवक की ओर अपने पुत्र के जैसे देखते थे । पितृतुल्य भावना उनके मन में थी । कुछ लोगों ने ऐसा कहा की भई इनकी मृत्यु हुई तो उनको बड़ा शोक हुआ । स्वयंसेवकों पर कोई भी आपति आती है तो उनका दिल दर्द करता था और इसलिये सबको आश्चर्य हुआ की जिस समय कार्यालय के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना wheel chair पर भी कठिन लगता था, ऐसे समय जब उन्होने पढ़ा की मद्रास में अपने संघ के कार्यालय में  Bomb Blast हुआ है, हमारे कुछ स्वयंसेवक हत और आहत हुए है, उनसे रहा नही गया और आखिर में डॉ. के Advice के विरूद्ध जाते हुए हर तरह की “रिस्क” लेते हुए वो उस अवस्था में भी मद्रास गये । जिनकी मृत्यु हो गयी थी ऐसे लोगों के परिवार जनों को स्वयं व्यक्तिगत रूप से मिले । जो आहत हुए थे, घायल हुए थे, उनको सांत्वना दी और वे फिर वापस आये ऐसी अवस्था में भी एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना उनके लिये कठिन था । इतना साहस उन्होने दिखाया इतनी ताकत उन्होने जुटाई तो सभी स्वयंसेवको के बारे मे कितना प्रेम कितनी पितृतुल्य आत्मीयता, एकात्मता उनके मन में थी । यह विकलांग अवस्था में भी उनका दर्शन हम लोगों ने किया ।

जीवित अवस्था में उन्होने जो कार्य किया वह हमारे सामने है । लेकिन विशेष रूप से मैंने इसका उल्लेख इसलिए किया कि बहुत लोगों के मन में भ्रांति देखी थी कि एक बार विकलांग होने के बाद, कार्य के लिए उनका मार्गदर्शन, योगदान नहीं रहा , ऐसी बात नही थी । विकलांग अवस्था में भी उनका योगदान था, आखिर तक यह योगदान रहा यह कहने की प्रमख बात थी ।

वैसे उनके जीवन के बारे में पिछले एक माह में बहुत कुछ कहा गया है, बहुत कुछ लिखा गया है । इसके कारण कोई नई बात बताने की है ऐसा मै नहीं समझता । देवरस परिवार यह आंध्र प्रदेश का है, महाराष्ट्र का नही । आंध्र-प्रदेश में चंद्रपुर के मार्ग से, वाया चंद्रपुर कई तेलगु परिवार नागपुर में आये । हेगडेवार परिवार उसी में था । बापूजी अणे उसमें थे । बाल शास्त्री हरदास का परिवार था । कन्नमवार का परिवार था । कई तेलगू परिवार वाया चंद्रपुर, नागपुर में आये, उसी मे से देवरस जी का परिवार था । उनका पहला नाम देवराजू ऐसा था । नागपुर में स्थायी होने के बाद देवराजू का मराठी करण देवरस हो गया । आचार्य विनोबा भावे जो शाब्दिक श्लेष करने में चतुर थे वह हम लोगों से कहते थे कि देवरस का अर्थ तुम नही समझते । सभी देवताओ का रस निकालकर जो तैयार हुआ वह तुम्हारा देवरस है । विनोबा भावे ऐसा शाब्दिक श्लेष करते थे । उनके पिताजी बहुत धार्मिक थे, कर्मठ थे । नागपुर में मोती बाबा जामदार करके एक श्रेष्ठ संत थे । जिनको दत अवतार कहा जाता था । उनके भक्त थे । उनकी माताजी, वह भी बहुत धार्मिक थी और प्रमुख बात यह थी कि बहुत कर्मठ और एक तरह से व्रती उनको कहना, यह ठीक होगा । ऐसा उनका व्यवहार था । परिवार में गृहिणी के नाते उनको ही सब काम करने पड़ते थे किन्तु किसी शारीरिक न्यून या बीमारी के कारण Medical Advice था कि उन्होने केवल छाछ पर जीवित रहना और कुछ लेना ही नही, केवल छाछ! दिन में, सुबह, रात को केवल छाछ । तो जीवन का आधे से अधिक हिस्सा बालासाहब की माता जी ने केवल छाछ पीकर बिताया और उसी अवस्था में घर का भी तो सब काम करती थी और हम बच्चे थे तो हम लोगों को आश्चर्य होता था कि इधर पूरण पोली, वडा ऐसे सारे भोजन के पदार्थ वह बनाती थी । सब लोगों को परोसती थी और स्वयं केवल छाछ पीकर रहती थी । इसमें उनका जो संयम है, व्रती जीवन है उसका परिचय उस समय भी हम लोगो को होता था । ऐसा उनकी माताजी का स्वभाव था । बालासाहब के मन में माता जी के बारे में बहुत ही प्रेम आदर था । आखिरी बीमारी में उन्होने अपने माताजी का बक्सा, माताजी का फोटो, उनका जो गांव है, आमगांव कारंजा, वहाँ से मंगवाया था और इसका कारण बालासाहब के जीवन में माताजी का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा । सूझबूझ आने के बाद या सूझ बूझ आते ही बालासाहब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रविष्ठ हुए और उन्होनें संघ के वायुमंडल के अनुकूल माताजी से कहा की मेरे साथ भोजन के लिए सभी जाति के लोग आयेंगे । दलित भी आयेंगे । उस समय मै यह नहीं सुनूंगा की ये दलित हैं तो मेरे रसोई घर में रोटी नही खा सकता । मेरे साथ बैठकर खायेगे । रसोई घर में बैठकर रोटी खाएंगे । माता जी ने कहा मेरी ओर से काई आपत्ति नही है । उन दिनों में आप कल्पना कीजिए जब वे बाल स्वयंसेवक थे । उन दिनों में orthodoxy इतनी प्रबल थी की जहाँ माता पिता दोनो बहुत कर्मठ, वहाँ यह बाल स्वयंसेवक आग्रह करता है कि मेरे दलित बंधु भी मेरे साथ आयेंगे और रसोई घर में खाना खायेंगे । बाहर नही । तो माताजी ने यह बात स्वीकार कर ली । यह एक अनोखी बात उन दिनों मानी गयी थी । सामाजिक समता परिषद् सामाजिक मंच आदि बातें तो सब नयी है । मै तो समझता हूँ उनके बाल्य अवस्था से ही यह सामाजिक समरसता का प्रांरभ उनके रसोई घर से उन्होने किया था और माताजी के सहयोग के कारण यह हो सका । इस तरह की माताजी भगवान की दया से उनके लिए उपलब्ध थी वह हमारे लिये भी एक सौभाग्य की बात थी । जब से सूझ-बूझ आयी तब से शाखा में शामिल हुए कुश पथक यह बाल स्वयंसेवकों का पथक उन दिनों में बहुत ही प्रसिद्ध था । प. पू. डॉक्टर जी का विशेष ध्यान कुश पथक के स्वयंसेवकों पर रहता था । बहुत आशाएँ उन्होंने लगायी थी और कुश पथक में से सभी वैसे ही स्वयंसेवक, कार्यकर्ता निर्माण हुए, जिन्होने डॉक्टर साहब की आशा फलीभूत करने का प्रयास किया । वहाँ से धीरे-धीरे संघ के कार्य में उनकी प्रगति हुई । संघ के बारे में आप जानते है कि संघ में हर एक को रगड़ में से जाना पड़ता है ऐसा नहीं होता की अच्छा भाषण देता है तो उसको अधिकारी बना दो, ऐसा नहीं होता । जो संघ की रगड़ है, स्वयंसेवक, गटनायक, शिक्षक, मुख्य शिक्षक, प्रचारक, जिला-प्रचारक, विभाग-प्रचारक, या कार्यवाह, जि. कार्यवाह, विभाग-कार्यवाह, एक रगड़ मे से हर एक को जाना पड़ता हैं । तो सभी तरह के काम करते करते उन्होने संघ कार्य में प्रगति की । जिस विभाग में उनका जन्म हुआ, उनका मकान जिस विभाग में था वह विभाग पुराने नागपुर में था । नागपुर के हम दो हिस्से उन दिनों में मानते थे । जो ब्रीज है, ब्रीज के उधर का नागपुर, याने Modern इधर का याने पुराना । तो पुराने नागपुर में उनका मकान था और इसके कारण तथा कथित पिछड़ी जातीयों, तथा कथित दलित जातीयाँ, ऐसे लोग उनके अगल बगल में रहते थे । तो सारा वायुमंडल ऐसा था । शाखा पर भी दलित और पिछड़े लोगों की संख्या अच्छी रहती थी । उन सब को लेना, संम्भालना, संस्कार देना यह काम करना पड़ता था और वह भाषण से नहीं करते थे ।

संघ कार्य के बारे में आप जानते है कि संघस्थान पर आना पड़ता है । संघस्थान कहाँ मिलेगा? पहला ही संघस्थान बालासाहब को ऐसा मिला की एक टूटा हुआ मकान, खंडहर, उसके सामने मैदान ऐसा ही पड़ा था । कोई उपयोग नही लेता था जो केवल खंडहर था, तो सुबह शाम को लोग प्रातविधी के लिये उसका उपयोग करते थे । इसके कारण वहा गंदगी रहती थी । वहाँ शाखा लगाने का सोचा तो वह गंदगी दूर करने का काम पहले करना पड़ा और दूसरे लोगों को कहने के पहले स्वयं बालासाहब सामने हो गये । उन्होने वह गंदगी अपने हाथ से उठायी, बाकी फिर स्वयंसेवकों ने यह काम पूरा किया । तो यहाँ ऐसे छोटे छोटे कामों से लेकर सबके साथ खेलना कबड्‌डी बहुत अच्छा खेलते थे- सबके साथ खेलना एक Sprit सभी लोगो में रह सके इस तरह से शाखा चलाना, होते होते नागपूर कार्यवाह तक उनकी प्रगती हुई और नागपूर कार्यवाह के नाते जितने भी कार्य आवश्यक थे वो बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से उन्होने किये । विभिन्न शाखाओं से संबंध, हर एक कार्यकर्ता को बराबर देखना, कौन कार्यकर्ता है, कैसा है? उसका स्वभाव कैसा है? दोनो के बारे मे Equations कैसे है ये सारा देखना, कार्यकर्ताओं को संस्कारित करना और विशेष बात कि सारे जो कार्यक्रम होते है, जैसे संघ शिक्षा वर्ग है उसकी व्यवस्था । शीत शिविर है उसकी व्यवस्था । उन दिनों शीत शिविर की व्यवस्था याने सारे शारीरिक कार्य स्वयंसेवक को ही करने है इस तरह की व्यवस्था थी । बिल्कुल तंबू ठोकने से लेकर सभी काम स्वयंसेवक करते थे । उसमें पहल करने का काम स्वयं बालासाहब करते थे । जिसके कारण बाकी लोगों को प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलता था । इस तरह के सभी कार्य नागपुर कार्यवाहक के नाते उन्होने किये । इतना ही नहीं तो कार्यवाह तो नागपुर के थे लेकिन नागपुर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केन्द्र है, उसका एक विशेष जिम्मेदारी है ऐसा प. पू. डॉक्टर जी कहते थे । उसके अनुसार नागपुर में रहते हुए बाकी देश मे प्रचार कार्य करने के लिए कार्यकर्ताओं को, प्रचारकों को निकालना ये महत्वपूर्ण कार्य अच्छी संख्या में बालासाहब ने किया और नागपुर के बाहर भी जब संघ शिक्षा वर्ग शुरू हुए तब वहाँ प्रारंभिक दिनों में मुख्य शिक्षक भेजना, वह भी नागपुर से ही भेजे जाते थे । तो संघ शिक्षा वर्ग में मुख्य शिक्षक, शिक्षकों को भेजना और प्रचारक के रूप में काम करने के लिये लोगों को Motivate करना इस तरह, नागपुर में रहते हुए संपूर्ण देश में कैसे यह कार्य का वटवृक्ष किस तरह से फैलेगा उसके लिए परिश्रम करना उनका काम रहा ।

प. पू. डॉक्टर जी के समय ही प. पू.  श्रीगुरूजी का संघ में प्रवेश हुआ और ऐसा दिखता है कि डॉक्टर जी के मन में श्रीगुरूजी और बालासाहब इनके बारे में कुछ विशेष Equation होगा । जैसे सन् 1939 में कलकता में संघ कार्य शुरू करने के लिए श्रीगुरूजी को भेजा गया और थोडे ही दिन के बाद उनके सहायक के नाते बालासाहब को भेजा गया । तो दोनो के विषय में कुछ विशेष भावना डॉक्टर जी के मन में थी ऐसा स्पष्ट दिखता है और यह भावना का अनुभव दोनों करते थे । इसके कारण दोनों की जो परस्पर विषयक भावनाएँ थी ये बहुत ध्यान में रखने लायक थी ।

श्रीगुरूजी सर संघचालक हो गये बालासाहब कभी नागपुर कार्यवाह थे, कभी सह-सरकार्यवाह थे । बाद में सर-कार्यवाह बने लेकिन पहले नागपुर कार्यवाह और सह-सरकार्यवाह ही थे । उस समय भी बालासाहेब का जब उल्लेख होता था – तब श्रीगुरूजी कहते थे जिन्होंने डॉ. हेडगेवार जी को देखा नही ,उन्हे बालासाहब को देख लेना चाहिए, तो फिर उनके ख्याल में आयेगा की डॉक्टर जी कैसे थे । एक समय श्री गुरू जी तांगे में जा रहे थे । उनके सामने ही रास्ता दिखाने के लिये बालासाहेब चल रहे थे । तो स्वाभाविक रूप से गुरू जी के मुख से शब्द निकले कि असली सर-संघचालक तो पैदल रास्ते से जा रहे है और नकली सर-संघचालक हम तांगे में बैठकर जा रहे है । मजाक में लेकिन जो स्वाभाविक रूप से शब्द निकला । एक समय उन्होने कहा ‘ संघ के संविधान में एक समय दो सर-संघचालकों की नियुक्ति करने की गुंजाईश नहीं है । यदि होती तो फिर शायद आज की अवस्था नहीं होती । दो सर-संघचालक एकदम नहीं नियुक्त हो सकते इसलिए मै सर-संघचालक हूँ और ये सरकार्यवाह है ।‘ माने कितनी भावना उनके बारे में श्रीगुरूजी के मन में थी यह हम देख सकते है । उनकी भी भावना श्रीगुरूजी के बारे में जो थी वह भी देखने योग्य है । मासिक श्राद्ध के समय सर-संघचालक पद ग्रहण करते समय उनका जो भाषण हुआ उन्होने वर्णन करते हुए कहा उनके वाक्य थे – ‘Under his benign  leadership, I was functioning as a manager’. श्रीगुरूजी उनको कितना उच्च पद देते थे और वे कहते थे , ” Under Guruji’s benign leadership I was functioning as a manager.” के नाते, organizer के नाते उनकी जो क्षमता थी वह विशेष थी ही किन्तु परस्पर संबंध कैसे थे यह एक देखने की बात है । हम जानते है की विविध कार्य स्वयंसेवको द्वारा चलाये गये । प्राय: श्री गुरू जी के कालखंड में ही शुरू हुए । बाद में भी कुछ शुरू हुए और भी कुछ शुरू होंगे । वह क्रम चलेगा क्योंकि यह तो Progressive unfoldment है । 1925 विजय दशमी के पूर्व ही प. पू. डॉक्टर जी ने संपूर्ण राष्ट्र पुनर्निर्माण की योजना बनायी थी, किन्तु जिसको प्रकाशित नहीं किया जो उनकी पद्धति थी । आजकल तो पद्धति नयी है कि एकदम 5 लोग भी पार्टी Form कर लेते है Manifesto Publish कर देते है कि दुनिया की सुर शक्ल कैसे सुधारने वाले है । ब्रह्माण्ड की सुर शक्ल कैसे दुरूस्त करने वाले है । डॉक्टर जी की कार्य शैली दूसरी थी । रघुवंश के राजाओं के बारे में कहा गया है की फलानुमेय: प्रारंभ: । माने किसी भी बडे काम का प्रारंभ करते थे तो पहले शोरगुल नही मचाते थे । उसकी Advertisement propaganda नही करते थे । शांत चित्त से कार्य का पारंभ करने देते थे । जब कार्य का फल आता है तो ”फलानुमेय: प्रांरभ:” । लोग अनुमान लगा सकते थे कि जो फल आया है तो इसका बीजारोपण कभी न कभी हुआ होगा । इस तरह से काम करने की डॉक्टर जी की शैली थी । इसके कारण तरह तरह की सारी योजनाएँ उनके मन में रहती थी । तो भी उन्होने इस तरह Manifesto नही दिया । किन्तु आज जितना हम देखते हैं मूल योजना की ही यह Progressive unfoldment है । उत्तरोत्तर होने वाला यह प्रस्फुटीकरण है । तो तरह तरह की संस्थाएं जो निर्माण हुई थी अब इसमें गुरूजी और बालासाहब का ऐसा कुछ Joint था । उदाहरण के लिये दादासाहब आपटे बहुत साल U.P. उस समय United Press करके थी, बाद में उसको U.N.I. बनाया गया । उसमें उन्होने काम किया । पत्रकारिता क्षेत्र में जाना है यह सोचा था, सभी क्षेत्र में जाना है यह पहले से ही सोचा था । संघ कुछ नही करेगा, संघ स्वयंसेवक सब कुछ करेंगे । संघ केवल संपर्क, स्वयंसेवक, संगठन यही तक अपनी सीमा रखेगा । किंतु संघ से प्रेरणा और संस्कार प्राप्त किये हुए स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे और वहाँ संघ के आदर्शों के अनुकूल कार्य की रचना और विकास करेंगे । यह विजय दशमी 1925 में सोचा गया था । उसके अनुसार जैसे जैसे संघ की शक्ति बढ़ती गयी वैसे वैसे अन्य अन्य क्षेत्रों में प्रवेश करना शुरू हो गया । तो दादासाहब आपटे की कुछ Apprenticeship United Press  में हुई थी । उनके साथ श्रीगुरूजी की  बातचीत हुई । अपनी भी देशी भाषाओं को लेकर ‘News agency’ होनी चाहिए । ”हिन्दुस्थान समाचार” का विचार हुआ । जैसे वह विचार तय हुआ तो उसको ठीक ढंग से क्रियान्वित करना, उसके लिए उपयुक्त व्यक्ति कौन है , उनको locate करना motivate करना उनकी team बनाना । दादासाहब आपटे थे, बापूराव महाशब्दे, बापूराव लेले।, जी.आर. माधवराव, नारायणराव तरके, वसंतराव देशपांडे और आखिर तक जिन्होनें यह काम चलाया वह बालेश्वर जी अग्रवाल यह सारी जो team बनी, वह बनाने का काम बालासाहब ने किया । जैसे वनवासी कल्याण आश्रम, प्रेरणा गुरू जी की थी । बालासाहब देशपांडे जसपुर में वकालत करते थे । उनको वनवासियों में काम करने की प्रेरणा दी, किन्तु जैसे वह काम बढा, जो केवल जसपुर तक सीमित था । तो फिर उसको अखिल भारतीय स्वरूप देना चाहिए यह प्रेरणा बालासाहब ने दी और उसका अखिल भारतीय स्वरूप होना चाहिए इसलिए जो -जो सहायता संघ की ओर से होनी चाहिए वह देने की व्यवस्था भी की और उस कार्य से इतनी एकात्मता थी, जैसे मैने मद्रास का उदाहरण दिया, एक बडे सम्मेलन की योजना, वनवासी कल्याण आश्रम की, एक बिहार के गुमला में और एक बस्तर में हो गयी । सम्मेलन की योजना हुई इस समय बालासाहेब की तबीयत ठीक थी । योजना होने के बाद प्रत्यक्ष सम्मेलन के समय उनकी तबीयत बहुत खराब हो गयी उनके लिये चलना फिरना भी असंभव हो गया । फिर भी लोगों का विरोध न मानते हुए आग्रह पूर्वक गुमला में और बस्तर में वो स्वयं गये । वनवासी लोगो ने देखा की कितने कष्ट उठाते हुए सरसंघचालक हमारे बीच में आ रहे है । एक कृतज्ञता का भाव उनके मन में था । तो योजना बनाना, जनरल मार्गदर्शन -क्रियान्वयन करने का काम इसी तरह उनका चलता था । विशेष रूप से हम जानते है कि संघ कार्य में हमेशा एक समस्या रहती है ,आगे भी रहेगी और ये समस्या ये है ,और वह सच भी है कि संघ कार्य परिस्थिति निरपेक्ष है । संघ कार्य परिस्थिति निरपेक्ष है किन्तु स्वयंसेवक का मन यह परिस्थिति सापेक्ष  रहता ही  है । संघ  कार्य परिस्थिति निरपेक्ष है, लेकिन स्वयंसेवक  का मन परिस्थिति सापेक्ष है और इसके कारण बाह्यय परिस्थिति का परिणाम कम अधिक मात्रा में विभिन्न लोगों पर होता है ।

इसके कारण स्वयंसेवको की मानसिकता क्या है, जिसका ज्ञान केंद्र को रहना, केंद्र का विचार क्या है इसकी जानकारी स्वयंसेवको तक पहुंचाना यह  ‘Two way communication ‘ बहुत आवश्यक होता है । यह रास्ता बालासाहब ने खोला । मुझे स्मरण है कि पहला ही प्रयोग 1945 में जब बहुत खलबली स्वयंसेवकों  के मन में थी, कई तरह तरह के विचार मन मे थे -कार्यपद्धति के बारे में खासकर तो उन्होने नागपुर में जो  राजाबाग मारूति मंदिर है, उसके प्रांगण में दिनभर का कार्यक्रम रखा । एक दिन में और कुछ नही , प.पू. गुरूजी ने बैठना ओर नागपुर के सभी कार्यकर्ता एकत्रित थे और उन्होने मुक्तचिंतन करना । जो भी विचार मन में हो वहां संकोच की बात नही थी, आदर के, मर्यादा के कारण कम बोलना ऐसी भी बात नही थी । जो विचार जिसके मन में आयेगा वो बोलेगा । पूरे दिन यह कार्यक्रम चला और कोई बात नही थी और फिर दूसरे सप्ताह में मा. बाबासाहब घटाटे के यहाँ बैठक हुई और वही लोग, और फिर जो जो बोला गया था उसके बारे में सरसंघचालक के नाते क्या प्रतिक्रिया है वह श्री गुरूजी ने उस समय प्रकट किया ।‘Two way communication ‘की प्रकट पद्धति बालासाहब ने शुरू की । उसी का अधिक विस्तृत स्वरूप सिंदी के जिला प्रचारकों के वर्ग में, इंदौर के विभाग प्रचारकों के वर्ग में, ठाणे में नवंबर 1972 मे वर्ग हुआ उसमें इसी का विस्तृत स्वरूप हम देख सके और इसके कारण इस तरह से केंद्र के मानस की जानकारी नीचे के स्वयंसेवक तक और नीचे के स्वयंसेवक की मानसिकता केंद्र तक -पहुंचाने की व्यवस्था भी बालासाहब की कुशलता की योजना के कारण हो सकी ।

हमारे विजय गिरकर जी ने उल्लेख किया था कि तरह तरह से कुछ लोग जानबूझकर गलतफहमी फैलाते है । जैसे श्री गुरू जी के समय कहते थे, कि डॉक्टर जी का संघ अलग था, श्री गुरूजी  का संघ अलग था और आगे कहा की गुरूजी का संघ अलग था, बालासाहब का संघ अलग था । माने समझते दोनो को नहीं । लेकिन जानबूझ कर बुद्धिभेद करने का प्रयास होता है । वो लोग नही जानते कि कितने उनके घनिष्ठ संबंध थे । आखिरी दिनों में  Ban  (प्रतिबंध)  के समय द्वारका प्रसाद जी मिश्र इनको जवाहरलाल जी ने नागपुर भेजा । श्री गुरू जी सिंदी के जेल में थे, बालासाहब आदि बाहर थे । उनके साथ मिश्रा जी की बैठक हुई । मिश्रा जी ने कहा की जवाहरलाल जी ने तय किया है कि  Ban  (प्रतिबंध) उठाना है । केवल उसके लिए श्री गुरू जी ने, केवल नेहरू जी के नाम पत्र देना चाहिये कि Ban  (प्रतिबंध) उठाये । तो बालासाहब ने कहा- नही, इतने दिन का हमारा अनुभव ऐसा है जिसके कारण आपके शब्द पर हमारा विश्वास नही । श्री गुरू जी ऐसा कोई पत्र नही लिखने वाले । मिश्रा जी ने कहा आप केवल पत्र लिखिये, Ban  (प्रतिबंध) उठने वाला है, मैं आश्वासन देता हूँ । बालासाहब ने कहा कि नेहरू जी के नाम श्री गुरू जी यह पत्र नही लिखेगें   । फिर मिश्रा जी ने compromise  निकाला की श्री गुरूजी ने नेहरू जी के नाम पत्र नही लिखें, किंतु मध्यस्थता करने वाले पं. मौलीचंद्र शर्मा इनके नाम Private  पत्र देना । इसके आधार पर Ban (प्रतिबंध) उठाने का काम होगा और ऐसा ही हुआ । आखिरी जो पत्र था  श्री गुरूजी का, नेहरू जी को नही था, Private  letter to  पं. मौलीचंद्र को शर्मा था और उसी के आधार पर Ban (प्रतिबंध) उठाने काम हुआ । किन्तु ये जब मिश्रा जी से बात हुई तब श्री गुरूजी तो सिंदी में थे । लोगो के साथ उनका  Communication  नही था, लोगो का जाना आना नही था । किन्तु जब मौलीचंद्र गये तो पत्र का content सीलबंद करके उनके पास दिया और उन्होन कहा कि इस पर आप को हस्ताक्षर करना चाहिये । बालासाहब का जब यह पत्र देखा कि इस पर आपको हस्ताक्षर करना चाहिये, गुरू जी ने तुरन्त हस्ताक्षर कर दिया वो Private letter to मौलीचंद्र शर्मा , इनके आधार पर बाद में Ban (प्रतिबंध) हटाया गया । माने इतना विश्वास ।

इनके परस्पर संबंधों  के बारे में, खासकर जिन्होने गलतफहमी फैलाना अपना धर्म माना है कितनी बात कही  है । कितनी परस्पर आत्मीयता थी उनकी, इसका केवल एक उदाहरण मै देना चाहता हू । शायद बाहर के लोगो को इतना मालूम नहीं । बहुत ही मार्मिक ऐसा यह प्रसंग है । गांधी हत्या हुई, शासन ने जानबूझकर संघ के बारे में गलतफहमी फैलाई जो राजनैतिक तत्व संघ को बदनाम करना चाहते थे । उन्होने उसका लाभ उठाया । जनता में क्षोभ पैदा किया गया । और फिर यह बात हुई की एक आदमी की हत्या हुई उसका बदला दूसरे आदमी की हत्या से होना चाहिये -खून का बदला खून से, हत्या का बदला हत्या  से, ऐसा कहते हुए और ऐसे जो राजनेता थे बहुत बडे, वो Mob  (भीड़) को लेकर प.पू. गुरूजी के मकान पर हमला करने के लिए आए । मकान छोटा था बालासाहब ने पहले ही व्यवस्था कर दी थी । Mob (भीड़) आ रही देखा तो 40 दंडधारी स्वयंसेवको को अंदर रखा था । किंन्तु Mob (भीड) इतना बडा था कि इतने Mob (भीड) के सामने 40 दंडधारी स्वयंसेवक कुछ नही कर पाते । इसलिये कई लोग गुरूजी से कहते थे आप यहाँ से सुरक्षित बाहर चले जाइये । बडा Mob (भीड़) है, यहा आप रहेंगे तो आपकी हत्या होगी । गुरू जी ने इन्कार कर दिया । उन्होने कहा की मेरी भूमिका ये है कि मै जिस हिंदु समाज के लिये काम करता हूँ वही हिंदु समाज यदि मुझे नही चाहता, मुझे मारना चाहता है, तो मुझे मारे । जो हिंदु समाज की इच्छा होगी वही हो । मै अपनी जान नही बचाऊंगा – अगर हिंदु समाज मेरी जान लेना चाहता है तो । कई लोग गये लेकिन गुरूजी हटने के लिए तैयार नही थे । बाहर Mob (भीड़)  इकट्ठा हुआ था । मकान छोटा था । दरवाजा लकडी का था और वो भी पुरानी लकडी का दरवाजा था । आखिरी में दरवाजे को धक्के लगाना भी उन लोगों ने शुरू किया, गुरूजी मानने को तैयार नही थे । शायद उनके मन मे यही भावना थी की इस समय यहाँ आत्मार्पण करना यही सिद्धान्त के अनुकल है, ऐसा कुछ विचार होगा । आखिर में बालासाहब आये और बालासाहब ने उनको कहा आप हमारे सरसंघचालक है, हम आपके स्वयंसेवक है । सरसंघचालक के नाते आपके आदेश का पालन करना हमारा काम है । किन्तु स्वयंसेवक का भी स्वयंसेवक के नाते आप पर कुछ अधिकार है और उस अधिकार के नाते मै कहता हूँ कि आपको यहाँ से सुरक्षित बाहर जाना चाहिये । बाहर जाने के लिए रास्ता था । गुरू जी तैयार नही थे । मुझे इस समय बिल्कुल समानान्तर घटना का स्मरण हो रहा है, समानान्तर घटना! अपने इतिहास की! गुरू गोविंदसिंह जी चमकौर के दुर्ग में – उसको दुर्ग क्या कहा जाय उसको कच्ची गढी़ कहते है । बहुत थोडे़ लोगों के साथ थे । घेरे गए थे मुगल सेना से । मुगल सेना बहुत बडी़ थी । इतनी बडी सेना के साथ एकदम लड़ना भी संभव नही था किंतु जब घेराव हुआ तो पहले उन्होने अपने बडे पुत्र साहब जादा अजीतसिंह व बाद में पुत्र साहब जादा दूसरा जुझारसिंह दोनो को  10, 15 –  10, 15 लोग देकर लड़ने को गुरू गोविंदसिंह जी ने भेजा । अब लड़ने के लिए क्या भेजना था मरने के लिए ही भेजना था । स्पष्ट था जो जायेगा मरेगा ही । इतना होने के बाद  15-20 लोग गुरू गोविन्दसिंह जी के पास रहे फिर उन्होने कहा अब हम जायेंगे, उस समय शिष्यों ने कहा कि साहबजादा अजीतसिंह, साहबजादा जुझारसिंह उनका आत्मार्पण हुआ है । लेकिन आपकी बात दूसरी है आप हमारे नेता है आपने हमको सिखाया है कि ‘ ‘आप्पे गुरू आप्पे चेला । ” इस युक्ति के अनुसार अब हमारी बात मानना आपके लिए बाध्य हो जाएगा । आपको हमारी बात माननी चाहिये । आप सुरक्षित बाहर निकलिये । यह अपने लिये, देश के लिये आवश्यक है । ठीक यही बात जैसे बालासाहब ने कही स्वयंसेवक के नाते हमारो बात आप को माननी पडेगी । यही शिष्यों ने कहा ”आप्पे गुरू-आप्पे चेला” इसी उक्ति के अनुसार हम आपको कह रहे हैं और हमारी बात आप को माननी पडेगी । अपनी अनिच्छा होते हुए भी गुरू गोविंदसिंह जी ने शिष्यों की बात मान ली । वैसे ही अपनी अनिच्छा होते हुए भी श्री गुरू जी ने बालासाहब की बात मान ली और सुरक्षित बाहर आये, वरना हिंदुस्थान का ओर संघ का इतिहास बदल जाता । यह हम समझ सकते है दोनो में इतना परस्पर संबंध था ।लेकिन लोगों ने उसको तरह तरह के रंग दिये !

जैसे उन्होने कहा  ‘Under his benign  leadership, I was functioning as a manager’.   वारत्तव में “Sceience ofManagement की शिक्षा दीक्षा न लेते हुए जन्मजात वो  Manager थे, जन्मजात । बचपन में शाखा में तो Management करना ही पडता था । एक Philonthrophist डॉ चोलकर उन्होने नागपुर में अनाथ विद्यार्थी गृह निकाला । यह अनाथ विद्यार्थी गृह पुराने नागपुर में था । तो अनाथ विद्यार्थी गृह में स्वाभाविक रूप से उस पुराने नागपुर के दलित और पिछडी जाति के अनाथ विद्यार्थी ही आते थे । उन्होने वसतिगृह तो निकाला था । प.पू.डॉक्टर जी को उन्होने कहा की कोई अच्छा compitent आदमी दीजिये कि वो वसतिगृह की Management कर सकेगा और कैसी Management करना उसकी व्यवस्था लगा देगा । बालासाहब की वहाँ योजना हुई । 2 साल तक उन्होने ठीक ढंग से व्यवस्था की, अनुशासन बद्ध व्यवस्था की । उसी समय उनका बाकी दलित और पिछडे हुए लोगो के साथ संबंध आया । अच्छी Management  इस नाते डॉ. चोलकर जी ने भी उनकी बहुत प्रशंसा की । आपको आश्चर्य होगा, बहुत लोगो को शायद यह पता नही है,१९४५,४६,४७  में उन्होन एक स्टार्स भी चलाया था’ भारत स्टोर्स ‘करके । मा. मनोहरराव ओक उनके सहयोगी रहे । भारत स्टोर्स की व्यवरथा तो business  Management थी, Regular Management वो भी Management बहुत Efficiently वे कर सके ।

वैसे बहुत लोगों को ये पता नही होगा की उनकी पैतृक खेती थी, कृषि थी । बालाघाट जिले में कारंजा के पास आमगाव करके गांव है वहाँ थी । तो उन्होने सोचा कि प्रयोग के नाते मैं स्वय कृषि करूगा । और उस समय का उनका अनुभव है एक आदर्श कृषक  इस नाते उन्होने काम किया और उन्होने उस समय कहा – जब बाकी कृषकों के सामने तो यह बात बहुत बाद में आयी तब उन्होने कहा कि- कृषको को जो कीमते मिलती है वो ठीक नही है । हमारे यहां हर तीन चार साल में एक बार अकाल आता है । माने दो साल में उसको इतनी कमाई करनी पडती है कि तीसरे साल भी इस पर या उस पर गुजारा कर सके । यह ध्यान में रखकर कृषि उपज का मूल्य तय होना चाहिये । यह बात उन्होने उस समय कही कि जिस समय यह बात उस हवा में नही थी और दूसरी बात उनके साथी किसान उनसे नाराज थे । क्योंकि उनके यहाँ काम करने वाले खेतीहर मजदूर और कारीगरों को वे पूरी रोजी देते थे । लोगो ने विरोध किया कि आप पूरी रोजी देते हैं, इसलिए हमारी Position  खराब होती है आप पूरी रोजी देते है तो हमको भी देनी पडेगी । तो बालासाहब ने कहा आप भी दीजिये । ये तो न्याय की बात है । तो वो बोले हम नही दे सकते । बालासाहब ने कहा मत दीजिये मैं मेरा क्रम बंद नही करूंगा । मैं खेतीहर मजदूर और कारीगरो को पूरी रोजी दूँगा । ये उन्होन चलाया । इतना होते हुए भी उनकी कृषि एक आदर्श कृषि के नाते रही । तो वहा की भी Management उन्होन बहुत ही अच्छे ढंग से चलाई थी ।

विशेष रूप से जब तरूण भारत, यह पेपर खरीदा गया तो वह तो उनकी परीक्षा ही थी । उनके ही उपर भरोसा रखकर संघ के लोगो ने तय किया था कि पेपर खरीदेंगे । क्योंकि पेपर के संपादक और Management  के जो लोग थे वो सब कांग्रेस के लिए अनुकूल, ऐसे थे । संघ के लिए कुछ तो विरोधी, कुछ प्रतिकूल, कुछ कम से कम अनुकूल ऐसे लोग थे और सीधा रास्ता जो होता है जो प्राय: होता है जब Management Change  होती है, कि पुराने लोगो को हटाना, नये अपने लोग लाना । वो भी नही करना ऐसा बालासाहब ने तय किया ।और पुराना जो स्टाफ था, संपादकीय जिसमें सामान्य लोग नही थे । भाऊसाहेब माडखोलकर, तात्यासाहेब करकरे, श्री पटवर्धन, गोविंदराव गोखले, यशवंतराव शास्त्री, मानो  Each one of them was great in his own right in field of journalism ऐसे लोग जो संघ के लिए विरोधी या प्रतिकूल थे ऐसे वायुमंडल से वह पेपर लेकर आये, इनको बदला नही लेकिन उनके ऊपर प्रेशर भी नही डाला । जब कभी समय मिलता था, तरूण भारत में जाते थे । इन लोगों के साथ बराबरी के नाते बातचीत करते थे, बार बार जाते थे । सब लोगो के मन में apprehention  था, आशंका थी ,ये संघ का है यहाँ डिक्टेटर शिप होगी । परंतु उनको आश्चर्य हुआ की बालासाहब 2-2, 3-3 घंटे उनके साथ बातचीत चाय पान, नाश्ता करते थे और ऐसे stalwards  में, पुराने लोगों में उन्होने इतना परिवर्तन लाया जिसके कारण तरूण भारत अपने लिए अनुकूल इस ढंग से काम कर सके । इस बीच ”समचार पत्रो की Management” इस विषय को उन्होने पूरी तरह से हस्तगत किया और इसक कारण वो बता भी सकते थे, कि कोई पत्र निकालना है तो कैसे निकालना यह सलाह दे सकते थे ।

उदाहरण के लिये दिल्ली में जब लोगो ने सोचा की र Motherland  ये दैनिक पत्रक निकालना चाहिये । तो पहले उन्होने warning  दी पत्रक निकालिये, आज आपके पास Finance है ठीक है लेकिन पत्र का Model  क्या रहे यह तय करें । उन्होन कहा Model  का मतलब ?  तो बालासाहब ने कहा  Mother land  का Model  नागपुर टाइम्स का होना चाहिये । Indian Express, Times of India या  हिंदुस्थान टाइम्स  ये  Model लेकर आप मत चलिये । किन्तु दिल्ली पंजाब का उत्साह था, उस समय उन्होने दूसरा Model  लिया और Mother land बंद करना पडा ये हम जानते है । तो Science of  Management इस नाते उनकी एक विशेषता हर जगह दिखाई देती है और इस दृष्टि से उन्होन कहा कि “ Under His Benign leadership I was functioning as a manager “ बिलकुल सही है ।

राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रो पर उनका ध्यान था । सभी क्षेत्रों पर और हर क्षेत्र में जहां जहां आवश्यकता स्वयंसेवको को होती थी वो सहायता करते थे । वो जानते थे की राजनैतिक क्षेत्र का महत्व है और इस दृष्टि से जैसे विद्यार्थी क्षेत्र में, मजदूर क्षेत्र में, किसान क्षेत्र में वैसे राजनैतिक क्षेत्र में भी अपने स्वयंसेवक संघ की नीति-रीति पद्धति, आदर्श लेकर काम करे और एक Model Political  पार्टी बनाकर लोगों के सामने उपस्थित करे । ये उनका प्रयास रहा और खासकर ये सब जानते हैं , कि जब आपातकाल आया उस समय बाकी सारे राजनैतिक दल निष्प्रभ हो गये थे । सारे निष्प्रभ हो गये थे । उस समय RSS had to bear the brunt उस समय जो R S S ने किया इसके कारण कुछ क्षण के लिए सभी राजनेताओं ने संघ की बडी प्रशंसा की, संघ के बारे में कृतज्ञता प्रगट की, किन्तु कृतज्ञता का भाव ज्यादा दिन तक मन में रखना ये राजनैतिक नेतृत्व का स्वभाव नही है इसके कारण वो बात बाद में भूल गये । किन्तु उस समय सभी ने प्रशंसा और कृतज्ञता भाव प्रकट किया था । वो सारा जो आपातकालीन संघर्ष था इसका सारा संचालन येरवडा जेल में रहते हुए बालासाहब करते थे । जो बाहर थे उनके साथ दिन प्रतिदिन उनका संपर्क रहता था । बाहर क्या हो रहा है उसकी खबर उनको जेल में मिलती थी । उनका आदेश क्या है ये लोगो को हर दिन मालूम होता था और इस तरह से सारा संचालन उन्होन किया । येरवडा जेल में बाकी लोगों को भी बालासाहब का परिचय हुआ । विभिन्न दलों के लोग थे, नाम लेने की आवश्यकता नही वो भी व्यक्तिगत संपर्क में आये । मुसलमान लोग भी संपर्क में आये और सभी के मन ने बालासाहब के प्रति इप्ताा?  फादर  फिगर  के नाते श्रद्धा हुई  कि विभिन्न दलो के नेता भी बालासाहब के चरणस्पर्श करने लगे वापस जाते समय और मुसलमान लोग भी बालासाहब के चरणस्पर्श करने लगे और जेल के बाहर आने के बाद भी बालासाहब को मिलने को बहुत लोग आते थे किन्तु हिंदु मुसलमान एकता हो जायेगी तो हमारी मिनिस्टरशिप का क्या होगा ?  ऐसी चिंता जिन लोगों के मन में थी उन लोगो ने यह भी व्यवस्था की, इस तरह का हिन्दू मुसलमानों का मिलन नही होना चाहिये । तो मुसलमानों में फिर से गलत फहमी फैलाने का काम राजनेताओं ने किया । किन्तु उन सब लोगों में बालासाहब के विषय में श्रद्धा का भाव था । यह उल्लेखनीय बात है ।

राजनीति का महत्व वो जानते थे । साथ ही साथ राजनीति की सीमाएं भी जानते थे । खराब लोग राजनीति में रहें उसकी तुलना में अच्छे लोग शासन में रहे तो देश का नुकसान नही होगा, यह भी जानते थे । अच्छे लोगो का शासन में लाना चाहिए यह भी समझते थे किन्तु साथ ही साथ राजसत्ता के द्वारा ही राष्ट्र निर्माण होगा यह उनका विश्वास नही था । राष्ट्र निर्माण जो होगा वह सामाजिक, सांस्कृतिक शक्ति के आधार पर होगा ऐसा वो मानते थे । और इसके कारण जहाँ लोकतंत्र के अस्तित्व का ही सवाल आया, जब लोकतंत्र ही खतरे में था उस समय 1977 के चुनाव में खुलेआम बालासाहब ने घोषणा की, कि लोकतंत्र को बचाने के लिए कांग्रेस के खिलाफ हमारे लोग काम करेंगे । उस समय जो चार्टर ओफ डिमाण्ड बताया गया था, उसमें हम क्यो लडाई लड़ रहे हैं, उसमें ये  Clause नही था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का Ban  (प्रतिबंध) हटना चाहिये । इसके लिए यहClause  नही था । संघ का नाम नही था । संस्थागत अभिनिवेश की बात नही थी ।  Institutional Ego की बात नही थी । एक ही था कि लोकतंत्र को बचाना और लोकतंत्र को बचाया गया । तानाशाही खत्म हो गयी । जिनको शासन चलाना था, उनके हाथ में शासन की बागडौर चली जाये और फिर, फिर से लोगों को चेतावनी के रूप में बालासाहब ने कहा कि राजनीति, राजनैतिक सत्ता, इसका महत्व कितना है और संघ का उससे क्या संबंध है । तो जनता पार्टी शासन में आने के पश्चात् दिल्ली में जो  Rallies हुई उन Rallies में बालासाहब ने स्पष्ट रूप से एक विषय रखा था । तीन बार बालासाहब ने यह विषय दिल्ली की Rallies में रखा । जनता पार्टी शासन में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व इन शक्तिओं का मापदंड राजनैतिक नही हो सकता । वह मापदंड सामाजिक और सांस्कृतिक ही होना चाहिए । यह विषय तीन बार उन्होने सामने रखा । तो इस तरह से संतुलन था । राजनीति का महत्व भी जानना, साथ ही साथ उसकी सीमाएं जानना और राष्ट्र निर्माण का कार्य लोकशक्ति के आधार पर होगा राजशक्ति के आधार पर नही, यह सारी बाते संतुलित रीति से उन्होने लोगों के सामने रखी ।

जहाँ तक सामाजिक समरसता का प्रश्न है, यह बताना आवश्यक है कि, संघ की विचारशैली, कार्यशैली इसकी एक विशेषता है । जैसे मैने कहा कि विजय दशमी सन् 1925  को जो संघ की स्थापना हुई वह  Reflex action  नाते नही हुई । एक Reaction  के रूप में नही हुई । सालों तक प.पू. डॉक्टर जी ने सोच विचार किया था । डॉक्टार जी का सभी समकालीन कार्यो से प्रत्यक्ष संबंध था । सभी देशी-विदेशी विचारधाराओं का गहन अध्ययन था । यह सारा करते हुए उनके मन में यह लगता था कि कुछ कमी है और वह क्या है? इसका गहन चिंतन सालो तक उन्होने किया । उसके बाद संघ की स्थापना हुई । उनको Bi-focal Vision   हो गया था । Bi-focal Vision आप जानते है कि नीचे पढने का होता है, और ऊपर का दूर का देखने का होता है । तो उनका Bi-focalVision  हो गया था । नीचे के चश्मे से दिखता था कि तात्कालिक लक्ष्य क्या है? Immediate Object वो स्वराज्य है और ऊपर के चश्मे से दिखता था कि

Ultimate Object क्या है ? अंतिम लक्ष्य क्या है? वो है ”परम् वैभवम् नेतु मेतत् स्वराष्ट्रम्” इस ढंग से कार्य की रचना थी और इस कार्य की रचना में सारी जो योजना थी बहुत लंबी योजना थी । आज एकदम लोग जो संरथाएं खडी करते है ऐसा नही था । गहन चिंतन का परिणाम था और इस दृष्टि से आगे क्या होगा इसका पूरा विचार डॉक्टर जी के सामने था । यहाँ वो सारा विषय लेने की आवश्यकता नही है और इस दृष्टि से जो भी नया नया कार्य बाहर के लोगों ने देखा तो कहा कि अब संघ के लोग राजनीतिक क्षेत्र में भी आए, मजदूर क्षेत्र में आए, और किसी क्षेत्र में आए ऐसा कहा । वास्तव में यह पूर्व योजना थी । जैसे जैसे Capital बढेगा वैसे वैसे दुकानो की संख्या बढेगी ।Capital  के Intrestपर दुकानों की संख्या बढानी है । पहले से ही योजना थी और भी नयी नयी संस्थाएं हमारे स्वयंसेवक निर्माण करेगें, किन्तु पूर्व योजनानुसार यह सारा चला और यह सारा जो पूर्व योजना के अनुसार चल रहा तो इसमें एक शैली इस नाते, जैसे, मैने कहा ”फलानुमेय: प्रारंभ:” यह विचार शैली होने के कारण पहले से  declare  नही हुआ । सभी बाते आरंभ में थी । एकदम सारा Manifesto घोषित नही हुआ । धीरे धीरे प्रस्फुटीकरण हुआ । उसको Progressive unfoldment कहना चाहिए । Progressive unfoldment धीरे धीरे होता गया । उदाहरणार्थ गौ हत्या विरोध संघ के स्थापना के पूर्व ही से डॉक्टर जी  को यह  Article of faith  था । संघ का तो था ही किन्तु उसको समय की आवश्यकता के , अनुसार विशेष आग्रह जिसको thrust कहते है,  इस रूप में प.पू. श्री गुरूजी के कालखंड में आया । जो गौ हत्या विरोध आदोंलन हुआ । ”स्वदेशी” अभी स्वदेशी जागरण मंच के नाम से काम चल रहा है । किन्तु स्वदेशी का आग्रह पहले से ही रहा । यहाँ तक कि नागपुर में  जो स्वदेशी भंडार चलता था वहां Counter पर बहुत समय तक डॉक्टर जी भी बैठते थे । पहले से ही स्वदेशी का आग्रह रहा, किन्तु विशेष आग्रह, thrust के रूप में परिस्थिति की आवश्यकता के अनुकूल इस समय स्वदेशी जागरण मंच के रूप में आया । वैसे, ही सामाजिक समरसता यह आरंभ से ही थी । जब मैने कहा बालासाहब बाल स्वयंसेवक थे उस  समय अपने कर्मठ परिवार के रसोई घर में दलित स्वयंसेवक बंधुओं को ले जाते थे यह सामासिक समरसता छोड़ कर और क्या थी । स्वयं डॉक्टर जी के जीवन मे आता है । मेरे गांव में , आर्वी गांव में एक जरठ युवती का विवाह उस युवती के मामा ने पैसे की लालच में आकर तय  किया था । डॉक्टर जी को पता चला उनको बात बर्दाश्त नही हुई । वो आए, उन्होने देखा कि वो विवाह नही होगा ,उन्होने वो तोडा़ और उसी युवती का विवाह दूसरे अनुरूप वर के साथ ,युवक के साथ उन्होने विवाह करवा दिया । उसकी प्रसिद्धी नही की, आजकल Modern Fashion जो है , Propaganda , Image building  की,  थोडा सा काम करना और बहुत प्रसिद्धी करना ऐसा नही । लेकिन यह जो है सामाजिक कुरीति का विरोध चाहे बाल विवाह रहे ,चाहे दहेज वाली प्रथा रहे, सभी बातों का ये मूल से विरोध है । किन्तु इसका एक Propaganda  कुछ लोगों ने तो ऐसा किया कि  Propagandaकरते जाना, काम कुछ नही करना । अपनी ऐसी पद्धति नही रही । सामाजिक समरसता पहले से ही थी ।. लोगो ने खासकर  के महाराष्ट्र के, एक ऐसा वायुमंडल निर्माण किया और हमारे विजय गिरकर ने उसका उल्लेख भी किया कि गुरूजी और बालासाहब दो ध्रुव के समान एक बिलकुल Orthodox और एक बिलकुल Progressive  गलत बात है । बहुत पहले 7 अक्टुबर 1945 को महाराष्ट्र में एक सुप्रसिद्ध अंतरजातीय विवाह हुआ । नवले- करपे ऐसा विवाह था । अंतरजातीय था । उस अंतरजातीय विवाह के लिए शुभेच्छा और आशीर्वाद भेजेने वालों में महात्मा गांधी  और  सावरकर जी के साथ श्री गुरूजी का भी शुभेच्छा संदेश उस विवाह के लिए था जो उन्होने ही सारा छपवाया था । 7 अक्टुबर 1945 की बात है । इतना है कि Progressive लोगों के समान उसका डिम-डिम बजाना अपनी पद्धति में नही है । तो सिद्धांत मूल से लेकिन परिस्थिति  की आवश्यकता के अनुकूल और thrust के रूप में देना यह काम बालासाहब के समय हुआ और  वो उन्होने बहुत ही सक्षमता के साथ किया यह हम जानते है । हम जानते है कि कठिन परिस्थिति में भी बालासाहब ने इतना संतुलन भी रखा और आग्रह भी छोडा नही । सवर्ण लोगों को बताया कि तुमने दशको तक – शतकों तक दलित बंधुओं के साथ अन्याय किया है । अत्याचार किया है और पहली बार जब वो आरक्षण का सवाल खडा़ हुआ था- अभी तो आरक्षण के सवाल ने केवल Political Character लिया है- पहली बार जब आरक्षण का सवाल खडा़ हुआ था उस समय उन्होने स्पष्ट कहा कि, आरक्षण के बारे में सोचते समय हर एक सवर्ण हिंदु के मन में यह कल्पना करनी चाहिए कि यदि उस दलित जाति में मेरा जन्म होता – जिस दलित जाति पर शतकों तक अन्याय हो रहा है- तो मेरी मन: स्थिति? क्या होती ? मेरी प्रतिक्रिया क्या होती ? यह कल्पना मन में करके फिर आरक्षण के प्रश्न पर विचार करो ऐसा उन्होने उस समय कहा । सभी सामाजिक प्रश्नों के बारे में अभी वसंत व्याख्यान माला का उनका जो भाषण है उसका भी उल्लेख हुआ । राष्ट्र सेविका समिति का अखिल भारतीय सम्मेलन नागपुर में था उस समय अंतरजातीय विवाह का उन्होने प्रतिपादन किया । दहेज वगैरह कुरीतियों के खिलाफ वो हमेशा बोलते रहे और सामाजिक समरसता यह विषय उनके मन में कितना था, सरसंघचालक बने Officially घोषित भी हुआ । प. पू. श्री गुरूजी ने लिखा था कि  ततीय सरसंघचालक पद का ग्रहण करना तो मासिक श्राद्ध के समय वह होने वाला था । Official सरसंघचालक पद ग्रहण करने के लिए जाते समय मंच पर जाने के पहले महात्मा फूले इनकी प्रतिमा को पुष्पहार समर्पण किया, उनको वंदन किया और उनका आशीर्वाद लेकर मंच पर गये और फिर वहाँ उन्होनें सरसंघचालक पद का ग्रहण घोषित किया यह दिखता है कि किस तरह उनके मन में इस विषय में एकात्मता थी । यह एकात्मता ,जो- जो राष्ट्र पुरूष है, सबके मन में रही । अभी जो कहा विजय गिरकर ने डॉ. आम्बेडकर जी के बारे मे। पाश्चात्य देशों  में सिद्धान्त त्रयी  का बोलबाला है । Liberty , Equality, Fraternity  स्वातंय, समता-बंधुता पू. डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने कहा कि मैं इन सिद्धान्त त्रयी को मानता हूँ । किन्तु ऐसा कोई न समझे कि मैनें ये सिद्धान्त त्रयी, फ्रेंच राज्य क्रांति से उठाई है , नही ! मेरी प्रेरणा फ्रेंच  राज्य क्रांति से नही है, ये सिद्धान्त त्रयी मेरे गुरू भगवान बुद्ध से उठायी है और जहाँ तक पाश्चात्य  देशों का सवाल है, पू. डॉ. अंबेडकर जी ने कहा पाश्चात्य देश तो इसको  Implement नही कर सके । घोषणा की स्वातंत्र्य, समता-बंधुता । स्वातंत्र्य की स्थापना की तो समता बिगड गयी । समता की स्थापना करने गये तो स्वातंत्र्य  खत्म हो गया । स्वतंत्रता और समता दोनों एक साथ नही चला सके इसका कारण ? अंबेडकर जी ने इसका कारण यह कहा कि तीसरा जो फैक्टर है बंधुता, इसका तो उदय ही नही हुआ-, इसका निर्माण ही नही हुआ और उन्होन साफ कहा जब तक बंधुता निर्माण नही होती तब तक स्वातंत्र्य और समता दोनो साथ- साथ जिंदा नही रह सकते और फिर उन्होने कहा कि इसी बंधुता को, मै ”धर्म” यह संज्ञा देता हूँ । ऐसा पू. अंबेडकर जी ने कहा । जिसको उन्होने ”धर्म” यह संज्ञा दी, जिसको बंधुता ऐसा उन्होने  कहा, वही अभिप्राय समरसता  इस शब्द का पू. बालासाहब देवरस का है ।

तो यह  संदेश सभी राष्ट्र परूषों ने दिया है । बिलकूल महात्मा फुले हो, अंबेडकर जी हो, साहू छत्रपती हो, राजाराम मोहन राय, केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर हो, स्वामी दयानंद जी, लाला हंसराज जी, स्वामी श्रद्धानंद हो, गुरू देव नारायण गुरूस्वामी  केरला  के हो, सभी लोगो ने यह समरसता का संदेश दिया । लोग भूल जाते है – public memory is short उसको फिर से उज्वल करने के लिये हमारे मा. शषाद्री जी ने कहा कि बालासाहब की स्मृति में यह जो मासिक स्मृति दिन होगा  ”सामाजिक समरसता दिन” इस नाते हमको मनाना चाहिये । तो सभी  लोगों की यह जो परंपरा है । उसी परंपरा में सामाजिक समरसता का संदेश  पू. बालासाहब देवरस का है । इसको हम ध्यान में रखे और यहाँ से जाते समय हम निश्चय करें  कि यह सामाजिक समरसता हम अपने जीवन में लायेंगे और इसका संदेश जहाँ जहाँ हमारा प्रवेश है ,एसे सब लोगों को यह संदेश पहुँचायेगें, उतना हम प्रण करें । इतना ही इस समय कहना पर्याप्त है ।

(16 जुलाई 1996 को मुंबई में श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी  द्वारा दिया गया भाषण ।)

Vanchinathan – Remembering the Great Hero on His 106th Death Anniversary

 Vanchinathan Iyer, popularly remembered as Vanchi, was a fearless freedom fighter, who participated in Bharat’s independence movement and gave up his life as a symbol of the uprising of Swatantra Bharat against the British and the atrocities committed by them in the name of governance. At the age of 25, he assassinated Robert Ashe and embraced brave death.

Hailing from Tamil Nadu, he was born to parents Raghupathy Iyer and Rukmani Ammal in Shenkottai (then part of the Travancore Kingdom) as Shankaran Iyer in the year 1886. He completed his schooling and higher education in Shenkottai .

Vanchi is notable as being one among the first and prominent Tamils who took part in the struggle for freedom and in some instances initiated the fight against the British Raj.

While working in Travancore, he came under the influence of many nationalists like V. O. Chidambaram Pillai, Neelakanta Brahmachari, Subramaniya Siva and Subramaniya Bharathi. They were his mentors and together they belonged to the Bharatha Matha Assocation (1900).

Robert William Ashe was the collector and district magistrate of Tirunelvelli district in year 1911. He was engaged in activities that were largely favourable to the ruling British class , ignoring and ensuring that the interests of the locals are never addressed nor issues pertaining to them redressed. He is also accused of propagating missionary activities of forcible conversion. Ashe was also instrumental in working against V. O. Chidambaram Pillai’s shipping company (established as the first indigenous Bharatiya shipping company between Tuticorin and Colombo) which led to its liquidation, and later in Pillai’s arrest.

On 17th June 1911, the Maniyachi Mail left Tirunulvelli Junction for Maniyachi with Ashe and his wife Mary Lillian Patterson aboard. They were on their way to Kodaikanal with their four children. At 10:38 AM the train pulled in at Maniyachi. The Ceylon Boat Mail was due to arrive at 10:48 AM. As the Ashes sat facing each other in the first class carriage, waiting for the Boat Mail to arrive, a neatly dressed man with tufted hair boarded the carriage and pulled out a Belgian made Browning pistol and shot Ashe at point blank range in the chest. The bullet hit Ashe and he immediately collapsed. Vanchi ran along the platform and took cover. After some time he was found dead having pulled the trigger in his mouth. The pistol was found to be empty, indicating his intention to shoot only Ashe and himself and nobody else, not even Ashe’s wife.

A letter with the below words was recovered from his pocket,

The mlechas of England having captured our country, tread over the sanathana dharma of the Hindus and destroy them. Every Indian is trying to drive out the English and get swarajyam and restore sanathana dharma. Our Raman, Sivaji, Krishnan, Guru Govindan, Arjuna ruled our land protecting all dharmas and in this land they are making arrangements to crown George V, a mlecha, and one who eats the flesh of cows. Three thousand Madrasees have taken a vow to kill George V as soon as he lands in our country. In order to make others know our intention, I who am the least in the company, have done this deed this day. This is what everyone in Hindustan should consider it as his duty.    –

                                                                          sd/-, R. Vanchi Aiyar, Shencottah

 The letter clearly indicates the motive behind the assassination was the removal of English mlechas (who eat the flesh of cow) who were destroying Sanatana Dharma. This clearly goes parallel with the common statement, “Poisonous weeds have to be removed at the earliest or else they could prove to be fatal.”

This brave and selfless act of Vanchi acted as the much needed adrenaline rush for Bharat’s independence movement. The assassination and contents of the letter caused great apprehension and unrest.

Ashe was the first and only colonial British officer to be assassinated in Dakshin Bharat throughout the freedom movement. The British were left shocked and rattled by this incident.

The Maniyachi Railway station was later renamed as Vanchi Maniyachi station. But it is greatly sad and shameful that this is the best act of secular government of Bharat to recognize the brave act of Vanchi and that this is the highest honour given to his bravery. And it is immensely angering that even this little gesture has become a thorn in the flesh of Dravidians and evangelists. It is unfortunately being used as a catalyst by #BreakingIndia forces to fulfil their agenda by demoralizing and demeaning Bharat’s history and belittling the valour of our brave heroes.

One such dangerous trend started by them is to brand nationalists from upper castes as casteists forgetting their contributions and sacrifices – this can be equated to the insult of our army jawans fighting to safeguard our borders. Falsified stores are being spread to tarnish the image of these brave warriors. One such illogical story is currently being floated around by the Periyar followers of Tamil Nadu where Ashe is eulogized as the champion of downtrodden people.

According to this fantastic spin, Ashe apparently angered Vanchinathan by taking a poor woman in labour pains to hospital via driving through agraharam. Yes, agraharam, the area around the temple where Brahmins live. Since Vanchi supposedly had so much hatred towards the lower castes, this is the reason for him assassinating Ashe.

Now this story is not only ridiculous but also completely devoid of any sense and logic. Ashe was a tax collector for the district of Tirunelvelli in the Madras Presidency, which was under British rule. Shenkottai was in Travancore state (a sovereign state). It can be clearly seen that Ashe had no business whatsoever to be in Travancore. Even if for argument’s sake we accept this falsified theory, geographical location and the city’s plan do not support this theory. In Shenkottai, the agraharam was located in a remote area outside the town. Now why would Ashe drive a woman in labour pain through the remote agraharam outside the town to the hospital inside the town? This clearly shows the baseless allegations made by these sectarian groups to tarnish the image of our freedom fighters.

Are we going to stay silent and let these fringe groups hijack the achievements and sacrifices of our freedom fighters by sullying their names with ulterior motive to break Bharat on the lines of caste? If no, then it’s high time we started teaching our children the real history which has always been ignored in our school.

Note: This article first appeared at and is being republished here with the permission of the author


आदर्श आत्मविलोपी मोरोपंत पिंगले -Sri Moropant Pingle by Dattopant ji

आदर्श आत्मविलोपी मोरोपंत पिंगले – दत्तोपंत ठेंगड़ी

मोरोपंत जी के गौरव समारोह में यद्यपि आज मैं सहभागी हो रहा हूँ फिर भी कृपया ऐसा न समझिये कि मैं भी उन्हीं के समान पुराना और अच्छा स्वयंसेवक कार्यकर्ता हूँ । ऐसी अगर कोई कल्पना करता होगा तो मुझे एक दृष्टि से आनंद होगा कि स्वयं असत्य कथन न करने पर भी मेरे विषय में अगर ऐसा संभ्रम फैलता होगा तो वह अच्छा ही है । लेकिन सच बात तो यह है कि मैं इतना पुराना और सच्चा कार्यकर्ता नहीं हूँ । हमारे छोटे से गाँव में दो शाखाएँ चलती थी। लेकिन मैं जब हाईस्कूल में था तब ‘ज्यादा बुद्धिमान्’ था । अत: शाखा में जाने की गलती मैंने कभी नहीं की । हमारे बाबूराव पालधीकर नाम के शिक्षक कभी कभी पास की शाखा में जानबूझकर ले जाते थे, तब मैं शाखा में जाता था । किन्तु स्वयं होकर कभी नहीं गया ।

मुझे स्मरण है कि उस समय मैं और मेरे कई मित्र बाबूराव पालधीकर के आने पर उन्हें कैसे टालते थे, कौन सी चाल चलने से उन्हें टाला जा सकेगा, इसके लिए ही बुद्धि का उपयोग करते थे । उस समय शंकर राव उपासभामा तोल्हारी नाम के एक उत्कृष्ट कार्यकर्ता उस शाखा के लिए मिले थे । वे जब शाखा का उत्कृष्ट कार्य करते थे तब हम पालधीकर जी को टालने हेतु क्या करना है, इस बारे में विचार करते थे । आगे महाविद्यालय की पढ़ाई के लिए मैं नागपुर आया । मेरा और मोरोपंत जी का महाविद्यालय एक ही था । ‘मॉरिस’ नाम का । हमारा मॉरिस कॉलेज उन दिनों का बड़ा प्रगतिशील और रोमांटिक ऐसा माना जाता था । मेरा शाखा  में न जाने का रवैया वहाँ भी मैंने चालू रखा था । हमारे कॉलेज में ऐसे जो शाखा में न जाने वाले रोमांटिक  युवा थे  ? उनका ग्रुप हुआ करता था।

और कभी टहलने जाना, पिक्चर जाना,  ऐसी प्रगतिशील बातें हम करते थे । टहलते समय उन दिनों यदि रास्ते की बाजु  में शाखा चलती दिखाई देती तो हम बड़ा अशिष्ट आचरण करते थे । परसर की और देखकर हम विविध प्रकार के भाव प्रकट करते थे। ‘इन्हें  बुद्धी नहीं इसलिए ये दण्ड (लाठी) चला रहे हैं’, ऐसी बात विभिन्न प्रकार के चेहरे,  हाव भाव (नाट्‌याभिनय) कर हम बताते थे । हम जब ऐसा आचरण करते थे तब उन दिनों में मोरोपंत शाखा चलाते थे । यानि उनमें और मुझमें   कितना अंतर है यह आपके ध्यान में आएगा ।

फिर भी अगर लोग यह समझेंगे कि मोरोपंत जैसा पुराना और अच्छा स्वयंसेवक कार्यकर्ता मैं हूँ, तो मुझे आनंद होना स्वभाविक नहीं होगा क्या?

मोरोपंत और मैं….हम जब कॉलेज में एकत्र थे तब भी वे शाखा के कर्मठ कार्यकर्ता और हम प्रगतिशील, ऐसा ही था । शाखा में जाने वाले हमारे स्वयंसेवकों की मानसिकता की ओर हम बहुत चिकित्सक व क्रिटिकल दृष्टि से देखते थे । उनमें कुछ सदस्य महाकर्मठ थे । हम लोगों से बात करते समय उनके मन में हमारे प्रति एक तुच्छता का भाव रहता था कि ये गैर जिम्मेवार हैं, इन्हें देश के बारे में कोई चिंत्ता नहीं । जिसे अंग्रेजी भाषा में होलिअर-दॅन-दाउ एटिट्यूड (holier than thou attitude) ऐसा कहा जाता है । ऐसी उनकी मनोवृत्ति थी । हम आपसे बहुत अधिक पवित्र हैं । ऐसा भाव जब उनके मन से प्रकट होता था तब उनके बारे में दूरत्व की भावना हमारे मन में तीव्र हो जाती थी ।

उस समय मोरोपंत की विशेषता यह थी कि अन्यों के समान वे कर्मठ थे फिर भी हमारे ग्रुप के लोगों से वे मिलते थे और जब हम लोगों के साथ वे रहते तब हमारे समान ही व्यवहार करते थे । हमारे जो विषय रहते वे ही उनके भी रहते । हमारे समान वे भी हँसी मजाक करते थे । इसलिए हम लोगों से वे कोई अलग हैं ऐसा हमें कभी भी लगा नहीं । यह उनका गुण उस समय प्रकट हुआ और उनके इस प्रकार के आचरण से हमे लगने लगा कि मोरोपंत पिंगले सरीखा व्यक्ति अगर हमारे में पूर्णत: घुलमिल गए तो कोई हरकत नहीं । अनुभव लेकर देखें ऐसा सोचकर शाखा में जाने का विचार मन में आया, अलौकिक नोहावे लोकांप्राते, यही मोरोपंत के स्वभाव की विशेषता है ।

तब से जो हमारे संबंध प्रारंभ हुए थे, वे बहुत दृढ़ हो गये । इतने दृढ हुए कि कॉलेज में हमने एकत्र पढ़ाई की (कंबाइंड स्टडी) । उन्हीं के घर। उन्हीं के खर्चे से हम ‘ब्रेकफास्ट’ लेते थे और इतने निकट संबंधो के कारण हमने कभी भी गंभीरता से चर्चा नहीं की । एक-दूसरे की हँसी-मजाक उड़ाना, चेष्टा-कुचेष्टा, मसखरी इत्यादि मित्र के नाते हम करते आए हैं । अनेक बार मैंने यह देखा है कि हम दोनों एकत्र आए तो सामने के स्वयंसेवकों को ऐसा लगता था कि ये श्रेष्ठ लोग बैठे हैं, कुछ तो भी राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय वार्ता करने में मग्न हैं । किन्तु प्रत्यक्ष में हम आपस में हँसी-मजाक ही करते रहते थे । ऐसी हमारी मित्रता होने के कारण जब मोरोपंत के बारे में मुझे कोई पूछते हैं, तो मुझे भगवद्‌गीता का वह श्लोक याद आता है जो ग्यारहवें अध्याय में विश्वरूपदर्शन होने के बाद अर्जुन ने भगवान से कहा है कि ”तू हमारा मित्र ही है, ऐसा समझकर  हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र, मैंने तुझे तू कहकर बुलाया होगा, तेरी श्रेष्ठता कितनी बड़ी है; यह न जानते हुए शायद मेरी यह भूल हुई होगी अथवा प्रेम के कारण मैं भूल गया हूंगा, इसलिए मुझे माफ करना ।” अर्जुन ने जो उस स्थान पर कहा है, वैसे ही विचार मोरोपंत की ओर देखकर मेरे मन में भी उठते हैं । मोरोपंत का व्यक्तित्व याने एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व, लेकिन सदा ही वे श्रेष्ठ है, इसकी सल (तपिश) हमें अनुभव नहीं हुई । चिड़िया के नाखून उसके पिलों को कभी घातक नहीं होते । वैसे ही उनके बड़प्पन की सल (तपिश) कभी भी स्वयंसेवक ने अनुभव नहीं की, यह जो उनकी विशेषता है उस दृष्टि से उनके जीवन का यदि हमने विचार किया तो मुझे ऐसा लगता है कि उसमें से सीखने लायक बहुत है । उनके जीवन के विषय में बहुत सी जानकारी प्रसिद्ध हुई है । मैंने भी भिन्न भिन्न वृत्तपत्रों से, साप्ताहिकों से उनके जीवन के बारे में जानकारी पढी है। मुझे भी थोड़ी जानकारी है । लेकिन बहुत सी बातें ऐसी हैं कि जो शायद बाहर प्रकट होगी भी नहीं । हम आपातकाल के समय एकत्र काम करते थे । उस समय उन्होंने जो कार्य किया वह तीस वर्षों के  बाद ही प्रकट होने लायक हैं । क्योंकि गुत्था-गुत्थी वाली बहुत बातें उसमें थी ।अलग-अलग नेताओं से संबंध, भिन्न भिन्न अधिकारियों से संबन्ध…. .जिनके बारे में आज कहा नहीं जा सकता ऐसी ये अनेक बातें हैं । इंगलैंड में एक ऐसी पद्यति है कि तीस वर्षो के बाद सरकार के पुराने रिकार्डस प्रकाशित किये जाते हैं । मुझे ऐसा लगता है कि तीस सालों के बाद जिन बातों के रिकॉर्डस भविष्य में आ सकेंगे ऐसी बातें उनके हाथों से घटी हैं ।

वैसे तो उनके कर्तृत्व के बारे में बहुत सी बातें सुनी हुई हैं । कब कहाँ संघ की विभिन्न जिम्मेदारियाँ उन्होंने संभाली है यह हम सब जानते हैं । विश्व हिन्दू परिषद् के उनके कार्य भी हमें मालूम हैं । हमें यह भी मालूम है कि हिन्दुत्व का यह जो प्रभाव बढ़ा, हिन्दुत्व के प्रभाव ने जो यह उड़ान ली है उसके मूल में इन्हीं की प्रतिभा है । शिलापूजन हो, कारसेवा हो, जो जो इस प्रकार के उपक्रम हुए उनमें कभी इनका नाम बाहर नहीं आया । इस कार्यक्रम के संयोजक कौन हैं, इसकी रचना, योजना किसने की है उनका नाम बाहर नहीं आया । परन्तु, इन्हीं योजनाओं में से हिन्दुत्व ने लंबी छलाँग लगाई है और ये सारी योजनाएँ मोरोपंत की प्रतिभा में से ही स्फुरित हुई थीं, यह हम सभी को मालूम है ।

विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से उन्होंने किए हुए इन कार्यक्रमों के अलावा उन्होंने अन्यान्य अनेक संस्थाओं को जन्म दिया है, व्यक्तियों को प्रोत्साहित किया है । उनके कार्य की व्याप्ति कल्पनाओं की मर्यादाओं में नहीं सिमट सकती । कोई ऐसा न माने के हमें मोरोपंत के जीवन चरित्र की पूर्णत: जानकारी है । वह संभव नहीं । क्योंकि उनकी प्रतिभा बहुत श्रेष्ठ है । उन्होंने सैकड़ों लोगों को कार्य करने की प्रेरणा दी । हजारों लोगों का मार्गदर्शन किया है । सैकड़ों परिवारों में वे कुटुंब प्रमुख के नाते माने जाते रहे, इसकी जानकारी महाराष्ट्र के लोगों को पहले से ही है और बाहर के लोगों को अभी ज्ञात हुई है । इस प्रकार के व्यक्तित्व के बारे में, चरित्र के विषय में अपने को कभी न कभी पूरी जानकारी मिलेगी ऐसा नहीं मानना चाहिए । क्योंकि वे स्वयं कभी नहीं बताएँगे और प्रत्येक को उनके कर्तृत्व के एक दो या तीन ऐसे कुछ ही आयामों के बारे में जानकारी हो सकती है । उनके कर्तृत्व के सभी आयामों के बारे में संपूर्ण जानकारी रखने वाला एक भी व्यक्ति इस देश में तैयार होना यह एक बड़ी असंभव बात है । इतने आयाम उनके कर्तृत्व के हैं । अंग्रेजी में एक वाक् प्रचार है, ‘स्काय इज द लिमिट’ । मर्यादा (सीमा) कौन सी, आकाश यही मर्यादा (सीमा) है । वे स्वत: होकर कभी किसी को बताएँगे नहीं क्योंकि ऐसा बताना अपनी परंपरा में बैठता नहीं ।

मुझे याद है कि, आपातकाल में अशोक मेहता जी के पास मुझे जाना पड़ता था । भूमिगत होने के कारण त्वरित जाना आना संभव नहीं होता था क्योंकि गुप्तचर लगे रहते थे । इसलिए थोड़ा रुकना पड़ता था । उस समय वे अपनी पुरानी घटनाएँ बताते थे । एक बार मैंने उनको कहा कि, ‘अशोक भाई, आप अपना चरित्र लिखिए । आत्म चरित्र लिखने से नई पीढ़ी को जानकारी मिलेगी, मार्गदर्शन होगा । ‘उन्होंने मेरी ओर तुरन्त कटाक्ष किया और बोले,’मिस्टर ठेंगड़ी यू आर आर.एस.एस. ऑर्गेनाइजर’ मैंने ‘हाँ’ कहा । किन्तु उसका इससे क्या संबंध है? ऐसा मेरे कहने पर वे बोले, ‘संबंध है, अपनी परम्परा में यह बैठता है क्या? वेदों की इतनी ऋचाएँ हैं किन्तु उनके कर्ता ऋषियों का चरित्र कहाँ किसी ने लिखा है? उन्होंने आत्म चरित्र लिखा है क्या? अपनी ऐसी परंपरा है कि हम अपना जो श्रेष्ठ कर्तृत्व होगा वह समाज-चरणों में अर्पण करना और इस जगत् से विदा लेना’ । अशोक मेहता जी से मैंने जब यह सुना तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । श्री गुरुजी के मुँह से यदि सुना होता तो आश्चर्य नहीं होता, पर अशोक मेहता ऐसा कुछ बोलेंगे यह सोचा नहीं था । कहने का तात्पर्य यह है कि मोरोपंत अपना चरित्र स्वयं तो नहीं लिखेंगे और उनके सब आयामों के बारे में जानकारी रखनेवाला एक भी मनुष्य मिलेगा नहीं । किन्तु इस व्यक्तित्व के मूल्यांकन के बारे में भिन्न भिन्न लोगों की अलग अलग कल्पनाएँ उभर कर आ सकती हैं । हम दोनों का मित्र जैसा संघ में है वैसा ही संघ के बाहर भी है । इसलिए सबके साथ बोलने का प्रसंग आता है । चर्चा हुई उस समय एकात्मता यात्रा हो चुकी थी । शिलापूजन के निमित्त से विदेशों से भी शिलाएँ आना प्रारंभ हो चुका था और यह कल्पना मोरोपंत की है यद्यपि सबको मालम नहीं हुआ था कि फिर भी निकट के लोगों को यह मालूम था । तब वे मेरे और मोरोपंत के मित्र बोले,’यह कल्पना मोरापंत की है ऐसा कह रहे हैं तो क्या यह सत्य है? मैंने ‘हाँ’ कहा । तब वे बोले, ‘यह तो विश्व हिन्दू, का काम है । हिन्दुत्व और मोरोपंत ने यह कार्य हाथ में लिया याने हमने क्या यह समझ लेना चाहिए कि मोरोपंत धार्मिक व्यक्ति हैं? मैं चुप रहा । वे बोले, ‘मेरे मन में उनका यह कार्य देखकर एक प्रश्न आया, आप उसका सच उत्तर देवें, क्योंकि मोरोपंत स्नान, संध्या, ध्यान, धारणा, पूजा, अनुष्ठान आदि कुछ करते हैं क्या?’ मैंने कहा, ‘ मैंने तो देखा नहीं, करते भी होंगे चुपचाप, पर मैंने देखा नहीं ।’ फिर वे बोले- यह धार्मिक व्यक्ति है ऐसा इन्हें कैसे कहा जाएगा? संघ का प्रचारक, संघ का कार्यकर्ता इस नाते मोरोपंत का व्यक्तित्व उसका मर्म जिसने संघकार्य को समझा, डॉ हेडगेवार का कार्य समझा है, उसी के समझ में आ सकता है । जिसने संघ और परमपूज्य डॉ हेडगेवार का जीवन समझा नहीं है उसे मोरोपंत का जीवन, व्यक्तित्व और प्रचारकों के व्यक्तित्व का आंकलन होना बहुत कठिन है । इसलिए मैंने चुप्पी साधी । मैंने चुप्पी साधी देख वे बोले, आप कछ भी कह लो, आपके मोरोपंत पिंगले इज एन एनिग्मा, एक अनाकलनीय  व्यक्तित्व है ।’ मैंने कहा, ‘ऐसा नहीं।’ हम सब को पता है कि विश्वामित्र और अन्य ऋषियों ने जो यज्ञ किया वह धर्म ही था । किन्तु यज्ञ ध्वस्त करने वाले राक्षसों को रोकने के लिए राम और लक्ष्मण धनुष-बाण लेकर गए । उन्होंने यज्ञ नहीं किया । लेकिन यज्ञ की रक्षा हेतु अगर वे धनुष-बाण लेकर गये तो राम और लक्ष्मण का कार्य उतना ही धार्मिक कार्य है और राम लक्ष्मण को भी उतना ही धार्मिक माना गया है । बाहर के व्यक्ति को यह समझ में आना सहज नहीं है । संघ के बारे में पूर्व में यही प्रश्न थे । यहाँ स्नान, संध्या सिखाते हैं क्या? गायत्री मंत्र सिखाते हैं क्या? ध्यान धारणा करते हैं क्या? कुछ भी करते नहीं होंगे तो इन्हें हिंदू धर्म रक्षक कैसे कहना? यह प्रश्न संघ में भी पहले कुछ लोगों ने उपस्थित किया ।

हमने यह समझ लेना चाहिए कि धर्म का संरक्षण याने धर्म का पालन नहीं । धर्म का पालन श्रेष्ठ तो है ही । इसीलिए शंकराचार्य, अन्यान्य संत, बल्लभाचार्य, महामंडलेश्वर आदि सभी का अपना एक स्थान है । उसी प्रकार से धर्म संरक्षण में ये जो लोग हैं जैसे अशोक सिंहल , मोरोपंत पिंगले हों, इनके भी अपने अपने स्थान हैं, उन्हें उस दृष्टि से धार्मिक पुरुष कहना चाहिए । यदि राम-लक्ष्मण धार्मिक होंगे, यज्ञ का संरक्षण करते होंगे तो ये लोग भी उतने ही धार्मिक हैं । ऐसा यदि हमने कहा तो भी उसे कितना समझा होगा, मान्य हुआ होगा, यह कह नही सकते । किन्तु उसका वाक्य मेरे ध्यान में रह गया कि, ‘मोरोपंत पिगले इज एन एनिग्मेटिक पर्सन (enigmatic person) अनाकलनीय व्यक्तित्व है । वह प्रचारकों की विशेषता ही है । बाहर का व्यक्ति इसे समझ नहीं सकेगा । मा. बाबासाहेब आपटे, मा. दादा साहब परमार्थ… … …. ..प्रचारकों के सबके नाम लेना हो विष्णुसहस्त्रनाम से भी बड़ी मालिका तैयार होगी । उन सभी ने बहुत कार्य किया किन्तु प्रसिद्धि के पीछे वे दौड़े नहीं । संस्था को जो थोड़ी बहुत प्रसिद्धि आवश्यक होती बस उतनी ही । लेकिन प्रसिद्धि की आस न रखते हुए शांति से परदे के पीछे रहकर कार्य करना दूसरों को आगे करना उन्हीं को श्रेय देना यही उन सब की मानसिकता रही है ।

इस बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दुत्व का इतिहास यदि लिखा गया तो उसमें मोरोपंत पिंगले यह नाम स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा । इतनी बड़ी उड़ान उनकी प्रतिभा के कारण संभव हुई है । फिर भी उन्होंने प्रसिद्धि की आस नहीं की । अन्यों को वह मौका दिया । इतना कार्य जहाँ पर किया है, वहाँ अपना कोई अखंड स्थान हो इसका आग्रह नहीं किया । धार्मिक जीवन हो अथवा राजकीय अपने जहाँ-जहाँ काम करेंगे  वह वहाँ तुरन्त अपना एक गुट तैयार करना, अपनी नित्य चापलूसी  करने वालों का एक गुट बनाना ऐसी एक सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति रहती है । किंतु मोरोपंत पिंगले ने ऐसा नहीं किया । विश्व हिंदू परिषद का यह प्रचंड कार्य नि: स्पृहता से छोड़ दिया और दूसरे कार्य की और बढे। यह प्रचारक की विशेषता है । संघ की पद्धति में से यह आई है । पू. डॉक्टर जी के जीवन से आई इस मनोवृत्ति को ही ‘आत्मविलोपी वृति’ कहते हैं ।

लोगों को ऐसा जो लगता है कि शक्ति प्रसिद्धि के कारण निर्मित होती है यह सत्य नहीं है । कुछ क्षेत्रों में प्रसिद्धी आवश्यक होती है । यह यद्यपि सत्य है किन्तु ध्यान में रखना होगा कि प्रसिद्धि के कारण एक माहौल मात्र बनता है । जो स्थायी नहीं रहता । अब क्लिंटन का ही उदाहरण देखिए । चुनाव के समय की उनकी इतनी सुंदर प्रतिभा बनाने का प्रयत्न हुआ कि वे राष्ट्राध्यक्ष पद पर चुनकर आए । लेकिन आज दो वर्ष बीतने पर उनकी लोकप्रियता का स्तर एकदम नीचे आ गया है । राष्ट्रनिर्माण के कार्य के समान कोई एक कार्य खडा करना हो तो प्रसिद्धि यह विश्वास की कसौटी हो नहीं सकती। इसके लिए आवश्यक है, प्रसिद्धि की जरासी भी आस न करते हुए, ध्येय प्राप्ति के लिए सवार होने वाले पागलपन से प्रेरित होकर, सालों साल कार्य में लगे रहने की प्रवृत्ति। श्रीगुरूजी के निर्वाण के बाद उनके जो पत्र प्रसिद्ध हुए उनमें से एक पत्र में उन्होंने कहा कि ‘मेरा स्मारक न बनाएं’ सबको आश्चर्य हुआ। किन्तु यह कोई एक क्षण में मन को सूचित करने वाला विचार था ऐसा नहीं। सम्पूर्ण जीवन भर में उनका यह विचार ओत-प्रोत भरा हुआ था। आपस में होनेवाले घरेलू बातचीत के समय मैंने तीन-चार प्रसंगों पर उन्हे एक अंग्रेजी कविता के माध्यम से आत्मविलोपी वृत्ति का वर्णन करते हुए सुना। अलेक्जेण्डर पोप की कविता है ‘Ode to Solitude’ ऐसा उस कविता का नाम है उसमें एक कड़ी ऐसी है कि,

“Thus let me live unseen, unknown.

Thus unlamented let me die.

Steal from the world,

And not a stone to tell where I lie.”

जगत् की दृष्टि में न आते हुए और जगत् को मालूम न होते हुए मुझे जिंदा रहने दो। मेरी मृत्यु भी ऐसी हो जिस पर कोई शोक न कर सके। यानि लोगों को पता ही न चले। जहाँ मुझे गाड़ दिया जाएगा वहाँ वैसा मालूम करा देने वाला पत्थर भी न रहे। ऐसा अलेक्जेण्डर पोप ने कहा है। यह कविता मैंने पूजनीय गुरुजी को तीन-चार बार बहुत उद्‌धृत करते हुए सुनी है। ऐसी आत्मविलोपी वृत्ति होगी तो ही उसमें से प्रभावी संगठन निर्माण होगा।

मुझे एक प्रसंग याद आता है। बाबा साहेब अम्बेडकर के अन्तिम दिनों में उनके सहवास में रहने का योग आया। जो धर्मांतर हुआ, उसके, पूर्व रात्रि में श्याम हॉटल में अपने कार्यकर्ताओं से वे बात करते थे ,और अनौपचारिक ऐसी बातें चल रही थीं। एक कार्यकर्ता ने पूछा कि, ”बाबा, हमने अपने जीवन में देखा है कि कई संस्थाएँ ऊपर उठती हैं और नीचे  आती हैं ऐसा क्यों होता है। बाबा साहेब बोले कि ‘इस प्रश्न का उत्तर मैं कैसे दूँ? दो हजार साल पहले भगवान बुद्ध ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है । सबको लगा कि यह ‘स्लिप ऑफ टंग’ है । कहीं तो भी बोलने में गलती से यह भूल हुई है । तो उदासीनता जहाँ होगी वहाँ काम बढ़ेगा । उदासीनता नहीं होगी तो काम गिरेगा । कुछ तो भी बोलने में गलती हुई ऐसा सबको लगा । बाबा के ध्यान में यह बात आई । वे बोले, ‘भाई ऐसा  है कि आप के मन की भावना मेरी समझ में आए किन्तु यह ‘स्लिप ऑफ टंग’ नहीं । फिर वह भिन्न अर्थ क्या है? वे बोले, ”एकाध काम नए सिरे से शुरू होता है । उस समय उस ओर कोई ध्यान नहीं देता । कुछ थोड़े लोग उसमें रस लेते हैं । वे काम करने लगते हैं तब अन्य लोग उदासीनता से देखते हैं । तुच्छता से देखते हैं । तब कुछ लोग निराश होकर वह काम करना छोड़ देते हैं । जबरदस्त विरोध होने से कुछ लोग काम छोड़ देते हैं । तथापि कुछ लोग जिद्‌द से तत्वनिष्ठ, ध्येयनिष्ठ होकर काम को आगे चालू रखते हैं और देखते देखते काम इतना बढ़ता है कि यश का शिखर सामने दिखने लगता है । जब तक यह यश का शिखर सामने आया हुआ नहीं दिखता, तब तक सब लोग स्वयं को भूल कर, आत्म केन्द्रितता छोड़ पूर्ण ध्येयनिष्ठा से सतत काम करते रहते हैं । लेकिन जब यश का शिखर सामने दिखने लगता है तब मन विचलित होता है और फिर बहुत लोगों के मन में ऐसी इच्छा निर्माण होती है कि यह जो यश है उसमें मेरा हिस्सा कितना, मेरे श्रेय का भाग कितना है? बाबा साहब ने उसका नाम दिया, ‘क्रायसिस ऑफ क्रेडिट शेयरिंग’ । मिलने वाली सफलता में कितना हिस्सा मेरा है, उस पर से स्पर्धा प्रारंभ होती है । ऐसी स्पर्धा जब शुरू होती है उस समय सगंठन के प्रमुख प्रणेता भी अगर उस स्पर्धा में दौड़ने लगे तो वह संस्था पतित होगी, नीचे आयेगी । किन्तु उन्होंने अगर श्रेय के हिस्से की उपेक्षा की तो फिर वह कार्य, वह संगठन वृद्धि किए बिना नहीं रहेगा । ऐसा बुद्ध के कथन का अर्थ था, इस प्रकार उन्होंने बताया । मुझे ऐसा लगता है कि संघ में जिसे हम आत्मविलोपी वृत्ति कहते हैं । उसका भी अर्थ यही है । इतने बड़े-बड़े काम किये तो भी श्रेय नहीं लेना ।

प.पू. डॉक्टर जी के जीवन में हम क्या देखते हैं? 1925 में संघ प्रारंभ हुआ । संघ के प्रयत्नों के कारण ऐसी एक शक्ति निर्माण हुई, गट निर्माण हुआ, नियुक्लियस निर्माण हुआ । हिन्दू समाज ने कभी न दिखाया होगा इतना साहस, दंगे के समय दिखाया । किन्तु उसकी प्रशंसा जब बाहर होने लगी तो डॉक्टर साहब कहते थे कि कोई भी काम संघ ने नहीं किया, हिन्दू समाज ने किया । संघ याने हिन्दू समाज, हम एक हैं । श्रेय नहीं लेना, यह जो आत्मविलोपी वृत्ति है उसका उत्कट आविष्कार मा. मोरोपंत में देखते आए है । अब उन्होंने लोगों के आग्रह के कारण कहिए अथवा विशेष परिस्थिति के कारण यह सम्मान स्वीकृत किया है । फिर भी उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता है, यह मैं जानता हूँ । यह संघ की कार्यपद्धति में बैठने वाली बात नहीं है । किन्तु कतिपय विशिष्ट कारणों से यदि मोरोपंत ने इसे स्वीकृति दी है तो उसके लिए हमने उनका आभार मानना चाहिए । उनके अनेक गुण हैं । कर्तृत्व के अनेक पहलू हैं । लेकिन सब स्वयंसेवकों ने, कार्यकर्ताओं ने जिन-जिन को राष्ट्र का गठन करना है ऐसे सभी ने सबसे महत्वपूर्ण तथा ध्यान में रखने लायक बहुत महत्व का गुण है । वह याने यह आत्मविलोपी वृत्ति ।

ऐसे आत्मविलोपी वृत्ति के लोग ही इतने लंबे समय तक अडिगता से, जीवटता से कार्य कर सकते हैं । यह आत्मविलोपी गुण हम में से प्रत्येक कार्यकर्ता स्वयं में अंगीकृत करने का निर्धारण करे यही मा. मोरोपंत जी का संदेश है, ऐसा मुझे कहना है । आत्मविलोपी होने से उत्कृष्ट सगंठित शक्ति और उस शक्ति में से हिन्दुत्व का परमवैभवशाली यश यही उनके जीवन का संदेश है । यह संदेश हम सब ध्यान में लाएं।

(‘वीर वाणी ‘ पत्रिका दीपावली अंक २००३ बेलगांव, कर्नाटक)