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संघ विचार के महान भाष्यकार श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी – डॉ. श्रीपति शास्त्री

संघ विचार के महान भाष्यकार श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी

डॉ. श्रीपति शास्त्री

श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी से सम्बन्ध सिर्फ संघ के सम्बन्ध में ही मेरा ज्यादा है, अपवादात्मक रुप से कई बार उनसे मिलने के लिये गया हूँ। दत्तोपंत जी का जीवन देखकर, उनके चाल-चलन, रहन-सहन, बोलने का ढ़ंग, ये सारा और इसका अनुभव लेकर, प्रश्नों के संबंध में उत्तर देने का उनका जो अद्भुत बौद्धिक सामर्थ्य था, उससे  प्रभावित होकर, संघ में जो अनेक कार्यकर्ता, अपने सम्भ्रम को त्यागकर, जो संघ कार्य में रत हुये, जिनके कारण से जो हजारों कार्यकर्ता खड़े हुये, उसमें से मैं भी एक साधारण स्वयंसेवक हूँ। संघ प्रारम्भ तो हुआ पच्चीस (25) में, सारी जो पहली पीढ़ी थी संघ की, वह तो, जो प्राथमिक संकल्पना  है, यह एक देश है, एक राष्ट्र है, और वह हिन्दू राष्ट्र है। इस बात को समाज में बिठाने के लिए एक पीढ़ी चली गई। वैचारिक दृष्टी से उस समय हिन्दू शब्द के साथ ही एलर्जी, स्वातन्त्र्य संग्राम चल रहा था, उसके जो आशय है तात्विक उससे कुछ भिन्न और हिन्दू समाज की  विचित्र परिस्थिति है, यह  संगठित होने वाला समाज है क्या? इन सारी बातों के बीच में संघ की बात को वहाँ पर बिठाना  एक पीढ़ी का काम हो गया। बाद में जैसे-जैसे समय बदलता गया, अनेक प्रकार के प्रश्न खड़े होते चले, जो प्रारम्भिक काल में नहीं थे और केवल समय नहीं था इतना ही नहीं तो उसको दूर रखा गया था। डॉ. हेडगेवार को कई प्रश्न पूछते तो वो कहते थे मुझे क्या मालूम उनसे पूछो, वो इतिहासकारों से पूछो, तत्व-ज्ञानी से पूछो वह टालते थे, उत्तर नहीं देते थे। हिन्दू शब्द को डिफाईन करने से भी उन्होंने इंकार किया जो अत्यन्त प्राथमिक बात है। क्योंकि वह जानबूझकर किया था वैसा।

लेकिन जैसे-जैसे दिन चले, काम का विस्तार होता चला गया। परिस्थितियों में बदलाव आया, इसलिए अनेक प्रकार के जो प्रश्न, खड़े होते गये, इन प्रश्नों को शास्त्रीय ढ़ंग से, संघ की अत्यन्त बुनियादी बातों से सुसंगत, अत्यन्त वैज्ञानिक दृष्टि से सम्मत ऐसी उसकी व्याख्या करना, उसको प्रस्तूत करना, दुनिया के सामने प्रस्तूत करना, समर्थ भाषा में प्रस्तूत करना, ऐसे एक महान भाष्यकार थे, श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी। (the greatest commentator of Sangh Ideological dimensions) “द ग्रेटेस्ट कॉमेन्टेटर ओफ संघ आयडियोलोजिकल डायमेन्सनस्”, संघ के सारे विचार-विश्व को विकसित करना, विकसित हुए आयाम का विश्षलेण करना और सबके सामने उसको प्रस्तुत कर, उसको सर्व-स्वीकार्य बनाना। यह जो कई लोगों ने काम किया, बड़े महत्व का काम, बड़ा बुनियादी काम, इसमें दत्तोपंत जी का बहुत बड़ा स्थान है। मेरा खुद का एक अनुभव है। मैंने पूछा कि भाषण में वो कई बार बोलते थे, संघ अलग, समाज अलग ऐसा नहीं होना चाहिये और संघ समाज एक ही है। ऐसा कुछ बोलते थे। बोलने में सुनने में तो ठीक ही लगता था, लेकिन इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है? तो उनका जो उत्तर देने का जो ढ़ंग था, “नहीं ऐसा नहीं, कल का इतिहासकार अगर लिखता है, संघ के बारे में, टुमारोज हिस्टोरियन, की ऐसा एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम का संगठन था उसने हिन्दू समाज के उपर जितनी-जितनी आपत्तियां थी, उसको दूर करने के लिए बहुत बड़ा परिश्रम किया “एण्ड संघ डिफेन्डेड हिन्दू सोसाइटी, प्रोटेक्टेड हिन्दू सोसाइटी” ऐसा यदि लिखने की नोबत आ जाये तो हमारे लिये यह हमारे विचार का पराभव हो गया। और  कल का इतिहासकार ऐसा लिखता है कि हिन्दू समाज में ऐसे प्रश्न तैयार हो गये, ऐसी-ऐसी समस्याएं, चुनौतियां खड़ी हो गयी, और उनसे निपटने के लिये हिन्दू समाज के अन्तर्गत विचार हुआ, औ हिन्दू समाज के विचारवान्-विवेकवान् लोगों ने अपनी बुद्धी लगायी और उन्होंने अपने सामर्थ्य से इसके उत्तर को ढूंढ़ निकाला और हिन्दू समाज स्व-संरक्षण-क्षम बना । हिन्दू समाज ने अपनी समस्याओं को स्वयं हल किया, ऐसा अगर इतिहासकार ने लिखा तो संघ के विचार की विजय होगी, नहीं तो संघ ने प्रोटेक्ट किया ऐसा हो गया, ऐसा नहीं आना चाहिये इसलिये हमारा जो संघ का जो एचीवमेंट है उसका रिकार्ड मत मेन्टेन करो, बैंक खाते में सारा रिकार्ड हिन्दू सोसाइटी के क्रेडिट पर करना, “ओल दी अचीवमेंट ओफ संघ सुड बी क्रेडिटेड इन दी नेम ओफ हिन्दू सोसाइटी” ऐसे इसको रखना चाहिये। और इसके योग्य शब्द वे गढ़ते चले, संघ और समाज समव्याप्त है, संघ और समाज ‘को-एक्सटेन्सिव’।

नये-नये संगठन, नये-नये आन्दोलन जो कभी-कभी प्रारम्भ किये गये, होते चले गये  और अभी भी हो रहे है, उसको उन्होंने, यह नई बात आ गई है, ऐसा नहीं बोलते थे। कहते थे यह पहले से संघ विचार में है, डॉ. साहब के समय का एकाध उदाहरण भी देकर, कलकत्ता में जब गड़बड़ हो गई तब डॉ. हेडगेवार ने क्या-क्या किया था उसका उदाहरण देकर, यह प्रारम्भिक काल से निहित संघ विचार है। उसको उन्होने एक नया शब्द भी दिया ‘प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट ओफ संघ आयडियोलोजी” ऐसा उन्होंने एक शब्द प्रयोग किया। ऐसे वैचारिक दृष्टी से एक संकल्पना के साथ उसको शुरु करना इतना ही नहीं तो सबको समझ में आ सके ऐसे शब्दों में रखकर, संघ के विचार की जो पूञ्जी है, उसको समृद्ध बनाने वाले ऐक बहुत बड़े भाष्यकार श्रीमान दत्तोपंत जी ठेंगड़ी हमारे बीच में, अपनी आंखों के सामने ही जीवन जीकर, वो चले गये। इसलिए संघ की वैचारिक भूमिका का जब हम विश्लेषण करने बैठते है, तो कौनसा  भी विषय लो, वहाँ पर दत्तोपंत जी का प्रवास आता है। वो आते है, उनका क्या कहना था, बोलने के लिए आते है।

कैसे-कैसे प्रश्न आते चले गये ? परिस्थिति जैसे बदलती चली गई, नये-नये प्रश्न आते गये। नये-नये प्रश्न जो संघ के लोगों को भी शायद हजम नहीं हो ऐसे है। दत्तोपंत जी ने एक घटना बतायी थी, 1960 की बात है, 1960 में अपने देश में गृहमंत्री श्री गुलजारी लाल नन्दा थे, उस समय एक बहुत बड़ा स्ट्राइक हो गया, वामपंथी लोगों से प्रेरित स्टम्प ऐसे होते थे वो बहुत बड़ा स्ट्राइक हो गया और स्ट्राइक होने के बाद नुकसान इत्यादि होते है वो हो गया, इसलिए नन्दा जी बहुत नाराज हो गये और  उन्होंने एक डिक्लेयर किया कि एक नया बिल लायेंगे, जिसमें यह स्टम्प करने का माने स्ट्राइक करने का यह जो राइट है, इसको हम ले लेंगे। समस्या समाधान के लिये नया मेकेनिज्म ढूंढेंगे। राइट टू स्ट्राइक यह नहीं रहना चाहिये ऐसा उनका स्टेटमेंट था उस समय। यह स्टेटमेंट आने के बाद 60-61 की बात होगी उस समय एक दो दिन नागपुर में होने के कारण श्रीगुरुजी से मुलाकात हो गई, गुरुजी ने दत्तोपंत जी को पूछा कि यह जो नन्दा जी का स्टेटमेंट है, इसके बारे में बी.एम.एस. की क्या भूमिका है? तुम्हारा क्या स्टैण्ड है? दत्तोपंत जी ने कहा हमारा स्टैण्ड तो कुछ नहीं है, गुरुजी ने पूछा की वृतपत्र में तुमने तुम्हारा स्टैण्ड विस्तृत नहीं किया ? दत्तोपंत जी ने कहा कि हमको कौन पूछेगा हम इतने छोटे है, कि नगण्य है, इसलिये हम दें तो क्या, नहीं दें तो क्या ? दें तो छापें भी नहीं पेपर वाले हमको, हम इतने छोटे है, ऐसा दत्तोपंत जी ने कहा। गुरुजी ने कहा कि वे छापे या न छापे कम से कम अपने पत्र तो छापेंगे, अपनी जो साप्ताहिक है वह तो जरुर छापेंगे, शायद हेडलाईन में भी छापे लेकिन तुम्हारी भूमिका क्या है, यह तो स्पष्ट होनी चाहिये, स्वयंसेवकों को समझना चाहिये, तुम्हारे विचार की दिशा तो समझनी चाहिये, दत्तोपंत जी ने कहा कि मैंने तो ऐसा सोचा ही नहीं। गुरुजी ने कहा कि शाखा होने के बाद शाम को फिर मिलेंगे। शाम को चाय के समय मिले, गुरुजी ने पूछा क्या तुम्हारा स्टेटमेंट तैयार हो गया? इन्होंने कहा नहीं, शब्द सूझते नहीं है, क्या कहना। गुरुजी ने कहा अच्छा पेपर और पेन लाओ और गुरुजी ने डिटेक्ट किया उनका जो स्टेटमेंट है बी.एम.एस. का, स्ट्राइक के बारे में, वो उन्होंने डिक्टेट किया, और दत्तोपंत जी ने वो लिख लिया, लिखने के बाद पेपर में भेजा, वो छपकर भी आ गया बी.एम.एस का स्टेण्ड क्या है? वो छपकर आ गया सारा, अर्थात् दत्तोपंत जी के नाम से आ गया, वो ही उसके प्रमुख थे, बाकि लोगों को कुछ मालूम नहीं है। बाद में जो बैठक हुई उस बैठक में अपने ही, अनेक संघ के जो प्रमुख थे, जिनमें कई लोग  जिनका कारखानों के साथ संबंध भी था, कई लोग एक्जीट्यूव भी होगें, उन्होंने गुरुजी से शिकायत की, कि हमारे संघ के बहुत बड़े अच्छे प्रचारको को हम अन्य क्षैत्र में काम करने को कहते है, देखा ठेंगड़ी जी जैसे ऐसे बड़े कार्यकर्ता क्या स्टेटमेंट देते है, स्ट्राइक पर।

माने स्ट्राइक करना यह कम्युनिस्टों का धन्धा, और उसको रोकना हमारे कार्यकर्ता का देशभक्तिपूर्ण कार्य है, ऐसा एक इक्वेशन है अनेक  लोगों के दिमाग में, उन्होंने गुरुजी से शिकायत की। देखीये गुरुजी क्या स्टेटमेंट दिया है, दत्तोपंत जी ने, वही स्टेटमेंट उन्होंने गुरुजी को सुनाया । स्टेटमेंट क्या था ? स्टेटमेंट यह था कि “राइट टू वर्क इज अ फन्डामेंटल राइट, देट मीन्स राइट नोट टू वर्क्स इज आलसो ए फन्डामेंटल राइट” इसलिये स्ट्राइक करना यह कामगारों का जो मूलभूत अधिकार है उसको खींच लेने का अधिकार सरकार को नहीं है। “दे मस्ट हेव देट राइट” यह मैंने सक्षिप्त में कहा लम्बा स्टेटमेंट है, उसका कॉपी है मेरे पास, मैंने दत्तोपंत जी से पूछा, उस समय गुरुजी ने क्या कहा ? गुरुजी ने कुछ कहा नहीं, आंखों के ऊपर ऐसा हाथ रखकर बैठे थे, सबकी सुनते थे, उस समय भी नहीं कहा, बाद में भी नहीं कहा, फिर आपने क्या किया ? उन्होंने कहा कि मैं क्या, कुछ न कुछ बोलना ही चाहिये वो तो बोल रहे है इतना बोल रहे है यह कुछ भी नहीं बोल रहे है तो मैंने कहा देखो भाई यह काम करने के लिये आपने मुझे कहा है, मैं काम कर रहा हूं और इस प्रश्न के ऊपर उचित ऐसा समझा  मैंने वह स्टेटमेंट दे दिया, मुझे जो ठीक लगा, आप सब लोग विचार करके अगर ऐसा कहते है कि यह उचित नहीं है, ऐसा यदि निश्चय हो गया तो मैं मेरी गलती हो गई ऐसा मानकर उसको वापिस ले लूगां। इतना कहकर वो भी छूट गये, सब छूट गये उस समय, इस अवस्था से अपने लेबर मूव्हमेंट का काम दत्तोपंत जी कर रहे थे, उस समय यह अपने ही कार्यकर्ताओं की स्थिति थी।

गुरुजी के साथ दत्तोपंत जी का निकट का सम्बन्ध भी था लेकिन मजदूर क्षैत्र में कार्य और विचार की दृष्टी से नई-नई जो बातें आती थी, ये उनको प्रस्तूत करके सर्वमान्य होना चाहिये ऐसा देखने का भी एक काम दत्तोपंत करते थे। वैसे उस क्षैत्र के सभी लोगों के साथ उनका सम्बन्ध भी था, मैं खुद उनके साथ, पूना में आते थे, मुम्बई में आते थे उस समय के जो ट्रेड युनियन लीडर थे एस.एम. जोशी के साथ उनको लेकर गया था, मधुलिमये के साथ उनके साथ गया था, ट्रेड युनियन के कम्युनिस्ट भी उनके निकट के मित्र थे, दत्तोपंत जी के। अनेक घटना जो बोलते है प्रो. हिरेन मुखर्जी उनके निकट के मित्र थे, आन्ध्र के जो पी. राममूर्ती जो कम्युनिस्ट लीडर रहे उनके मित्र थे, उनके संबंध में जो कुछ बातें हुई वे बोलते थे, वो अजातशत्रु थे यह तो एक बात है लेकिन जगन्न मित्र थे यह दूसरी बात है “फ्रेंड ओफ ओल ऐनेमी टू नन” इतना है उनका। इसलिये सर्वक्षैत्र में अत्यन्त आसानी से उनका प्रवास चलता था जिसका चित्र मैंने इमरजेन्सी के समय सभी पक्ष के लोगों को एकत्र लाने के लिए जो उनका हलचल चला था उस समय मुझे देखने को और उसको अनुभव करने का समय मिला, इतना ही नहीं बड़े-बड़े लोगों के साथ जब उनके  तरूणाई के समय के सम्बन्ध में बोलते बोलते संघ के संबंध में बोलते थे डी.पी. मिश्रा  के साथ जैसे जाते थे और आते थे कैसा सम्बन्ध था? पिता पुत्र के जैसा अपना संबंध था ऐसा वो बोलते थे। मध्यप्रदेश के उस समय के जो स्ट्रोंग मेन थे, उनके साथ संबंध के बारे में बोलते थे, बाबा साहब के बारे में तो अधिक उल्लेख किया यहां पर  तो उनका निकट का संबंध था।

और एक घटना वे बताते थे जिसका गुरुजी के साथ संबंध है। यहीं दिल्ली में गुरुजी आये थे। गुरुजी से मिलने के लिये नागपुर के बहुत बड़े कार्यकर्ता जो अपने संघचालक मान्यवर श्रीमन्त बाबा साहेब घटाटे, डॉ. हेडगेवार जी के समय से लेकर आखिर के दम तक नागपुर के संघचालक रहे, उनका घर माने अपने सर्व संघचालकों का देखभाल करने का एक “ही वाज दी केयरटेकर” ऐसा उनका स्थान था, वो बड़े थे, वो यहां पर आये थे, ये यहां क्यों आये ? दिल्ली में गुरुजी से मिलने के लिये आये, कार्य के लिये गुरुजी से मिलने के लिये आये थे, वह जो वर्ष था, पिछले जमाने के स्वातंत्र्य संग्राम जब चल रहा था इस देश में उस समय हिन्दू समाज का देखभाल करने वाले एक “वॉच डॉग ओफ हिन्दू सोसायटि”  ऐसा रोल अदा करने वाले एक नागपुर के डॉ. बी. एस. मुञ्जे उनकी जन्म शताब्दी का वर्ष था। बहुत बड़े आदमी थे वो अपने ढ़ंग से बहुत बड़ी लड़ाईयां भी लड़ी उन्होंने अकेले, तो अनेक लोगों को प्रिय थे विशेषत: महाराष्ट्र और विदर्भ में ज्यादा प्रिय थे और घटाटे जी के मन में उनके बारे में बड़ा आदर था। उनकी जन्म शताब्दी समारोह समिति करके कुछ कार्यक्रम करना चाहिये ऐसा वह सोचकर उस समिति के अध्यक्ष श्री गुरुजी रहे यह विनती करने के लिये वे यहाँ पर आये थे। गुरुजी से मिले और विषय रखा, लेकिन व्यक्तिश: गुरुजी ऐसी बातों में रुचि तो नहीं लेते और लेकिन उस समय मांग करने वाले जो थे बहुत बड़े आदमी थे, डॉ. हेडगेवार जी के आखिर के दिनों में उनकी जो अत्यन्त तत्परता से देखभाल की वह बाबा साहब घटाटे थे, उनका सारा घर “आल हिज असेटस ओन द डिसपोजल ओफ द ओर्गेनाइजेशन”, यह व्यक्ति जब वहाँ यह मांग करने के लिये आते है और खुद डॉ. बी.एस. मुञ्जे और डॉ. हेडगेवार जी का संबंध, संघ के अनेक प्रमुख कार्यकर्ताओं का निकट का संबंध ये होने के कारण गुरुजी, उनकी इच्छा रहे न रहे स्वीकार करना पड़ा, मुञ्जे जन्म शताब्दी समिति के अध्यक्ष बने, और उसमें कौन-कौन रहना चाहिये और समिति सदस्य इस नाते विचार हुआ, बी.एस. मुञ्जे से आदर रखने वाले कौन-कौन है इस देश में, वह थोड़ा गुरुजी ने याद किया और कहा केन्द्र के जो मंत्री थे  बहुत प्रतिष्ठित मंत्री बाबू जगजीवन राम उसके सदस्य रहना चाहिये ऐसा गुरुजी को लगा, और इसलिये उन्होंने कहा कि बाबू जगजीवन राम जी को सदस्य होने के लिये विनती करेंगे, वहां जो ओर कार्यकर्ता थे उन्होंने कहा कि वह कैसे बनेंगे, वे तो इसका सारा विरोध करेंगे, जन्म-शताब्दी तो मूञ्जे की है, और अध्यक्ष तो आप है और इसके साथ कैसे अपने आप को जोड़ लेंगे, ऐसा उन्होंने गुरुजी से कहा, गुरुजी ने कुछ नहीं कहा तो वो चुप हो गये। बाद में सब जाने के बाद उन्होंने दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को बुलाया, बुलाकर उनसे कहा अपनी और से बाबू जगजीवनराम से मिलकर आओगे क्या? यह विनती है कि सदस्य हो ऐसा जमता है तो जरा देखकर आना। वैसे दत्तोपंत जी गये, जगजीवन राम के पास गये पुराना परिचय भी था आसानी से मुलाकात भी हुई, वहाँ पर उन्होंने यह सारी बातें जग जीवन राम जी से कही। यह समिति है, आप सदस्य बने, अध्यक्ष तो गुरुजी रहने वाले है, बाबू जगजीवन राम ने एक प्रश्न पूछा, तुमको लगता है कि मैं सदस्य रहूँ इसलिये आये हो, या गुरुजी का संदेश लेकर तुम आये हो ये प्रश्न बोले। उन्होंने कहा गुरुजी की विनती लेकर मैं आया हूँ, “हिज  रिक्वेस्ट, आई ऐम केरिंग” हिज रिक्वेस्ट यह उन्होंने कहा। उन्होंने एक मिनट विचार किया, बाद में कहा अच्छी बात है, मैं बनूगां, तुम जाकर पेपर-वेपर तैयार करके भेज दो, उसके ऊपर जहाँ-जहाँ साइन करना है, मैं करके दूंगा, वापिस आ गये, गुरुजी से कहा,  गुरुजी ने कहा अभी किसी से आऊट मत करो, पहले सारा पक्का करके पेपर में छापने का बाद ही वे सारा आऊट हो जाये, पेपर तैयार किया, नेक्स्ट डे, उनके ओफिस में भेजा, दूसरे दिन प्रात: काल कार्यालय में वो साइन होकर आ गया। जब उनका नाम उसके साथ आ गया, इस समिति के यह सदस्य है, तो सबको बड़े आश्चर्य की बात हुई, तो उस समय कितना आश्चर्य लोगों को हुआ, जितनी आसानी से जगजीवन राम ने उसको स्वीकार किया। गुरुजी ने जैसे “हाऊ ही हेड रीड द माइण्ड ओफ जगजीवन राम” यह एक बात, गुरु शब्द का कीमत उसके पास क्या था ये बात, ये दत्तोपंत जी बहुत अच्छे ढ़ंग से वर्णन करके कहते थे, यह सब लोगों का उनका एक-एक, दो-दो, चार-चार, उदाहरण हम बता सकते है। जहाँ तक देश का संबंध है, संघ का संबंध है, एनेकडोट जिसको बोलते है तो बहुत स्टॉक है उसका,   विशेषकर श्री गुरुजी के सम्बन्ध में, बाला साहेब देवरस जी के संबंध में यह सारी घटनाओं और बाहर के लोगों के साथ के संबंध में यह वो बोलते है।

लेकिन देश से संबंध में उनका कुछ विशिष्ट रोल था, वो यह था जिसका उल्लेख रमन भाई ने किया है । देश में ट्रेड युनियन मुव्हमेंट जो है ये सारा लेफ्टिस्ट लोगों की मोनोपोली थी उस समय उनकी जो अनेक प्रकार की जो कॉम्पलेक्सिटी है उसको ग्रास्प करने में भी तकलीफ होती थी, वहाँ के लोगों को ऐसी एक विचित्र परिस्थिति में, उस क्षैत्र में प्रवेश करके, उनसे ही सारी बातें सीखकर और बाद में जो लेबर एक मूव्हमेंट जो अपने देश में अत्यन्त आवश्यक थी, ऐसा एक लेबर मूव्हमेंट उन्होंने खड़ा किया जो”विच इज इफेक्टिव अलटरनेटिव टू द लेफ्टिस्ट मूव्हमेंट ओफ ट्रेड यूनियन” उन्होंने इस देश के लिये, उसका एक पर्याय तैयार किया, जो लोकतंत्र की दृष्टी से आवश्यक था, जो राष्ट्रवाद की दृष्टी से आवश्यक था, राष्ट्रवाद की चौखट में ट्रेड यूनियन मूवमेंट हो सकता है ऐसा प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्थापित करना आवश्यक था, ये सारी जो बातों को अत्यन्त आसानी से, अपने सम्बन्ध के बलबूते पर, अपने बौद्धिक सामर्थ्य के बलबूते पर, राष्ट्रनिष्ठा के बलबूते पर, संघ में जो उनका स्थान था उसके बलबूते पर, एसा एक अल्टरनेटिव टू बी लेफटीस्ट ओरियेन्टेड लेबर मूवमेन्ट ट्रेड युनियन मूवमेन्ट, उसको किया और जिसका आज “दी बिगेस्ट लेबर मूव्मेन्ट एन दिस कंट्री” ऐसा उसका स्थान आज है। एक व्यक्ति अपने जीवन में कितनी बाते कर सकता है, इतना ही नहीं, अनेक क्षैत्रों में प्रवाह है छोटा सा पुस्तक है, उसको मैंने पढ़ते पढ़ते पढ़ा था  “वक्तृत्व की तैयारी” एक पुस्तक है छोटा सा , पच्चीस तीस पन्नो का “टू ट्रेन वन सेल्फ फॉर दी स्किल ओफ आरेटरी” ऐसा है उसमें जो छोटे छोटे उदाहरण है सारे यूरोप के इतिहास को लाया है, बड़ा मोह होता है, यूनियन के पार्लियामेंट की एक चर्चा को उन्होंने कोट किया है, ओरेटरी का कैसे इफेक्ट होता है। जार्ज थर्ड था, वार ओफ अमेरिकन इनडिपेन्डेन्स का कारण बना जार्ज थर्ड, ये राजा था उसके बारे में बहुत नाराजगी थी देश में, पार्लियामेंट में उसके उपर टीका होने लगी, टीका होने लगी उसमें एक आदमी ने  ऐसी टीका की जार्ज के ऊपर वह क्या है ऐसा है, ये ऐसा देश के लिये खतरा है राजा, तो इससे देश को छुटकारा कब मिलेगा कौन जाने, ऐसा कुछ वाक्य है। बाद में कहा “सीजर हेड हिज ब्रूटस” (Caesar had his brutus) यह पहला वाक्य है सीजर की हत्या करने वाला एक ब्रूटस था याद करो “सीजर हेड हिज ब्रूटस” (Caesar had his brutus), “चार्ल्स हेड हिज क्रोमवेल” (Charles had his Cromwell) इंग्लेंड का राजा था चार्ल्स फस्ट नाम का ही “हेड हिज क्रोमवेल” जिन्होंने उनको फांसी पर, फांसी नहीं “बिहेडिंग” उस समय सिर काटते थे। ही वाज “बिहेडिट” (Beheadit) ये दोनों हो गया, दो राजाओं को याद करो, सीजर हेड हिज ब्रूटस, चार्ल्स हेड हिज क्रोमवेल, अब तीसरा यह जार्ज के नाम पर क्या बोलता है डर हो गया, लोगों ने चिल्लाया “इट इज अ ट्रीजन” लेकिन वक्ता क्या था एक मिनट रुका फिर रिपिट किया सीजर हेड हिज ब्रूटस, चार्ल्स हेड हिज क्रोमवेल एण्ड जॉर्ज द थर्ड मेय  प्रोफिट बाय देयर एग्जाम्पल” ऐसा उन्होंने एंड किया उसका। माने राजद्रोह से बचा जो सजेस्ट करना था, वो किया, ये उस छोटी पुस्तक में है ऐक पेरा में वो है, ऐसे दस उदाहरण आपको मिलेंगे,  सारा यूरोप का इतिहास वक्तृत्व की तैयारी के लिए छोटी पुस्तक, मैंने उनसे पूछा कि इसके लिए आपको टाईम कहाँ है ? उन्होंने कहा  इसके लिये ज्यादा टाईम नहीं निकालना पड़ता, जब थोड़ा करने को कुछ धन्धा नहीं रहता है न, उस समय करते है यह काम, बड़ी आसानी से कहा उन्होंने, ऐसा हर क्षैत्र में उनको कुछ कहना है, और मूलत: उनका पिण्ड अध्यात्मवादी था वो और देव, भगवान, प्रभू-कृपा, ईश्वर कृपा, इश्वरेच्छा यह सारी बातें विशेष प्रसंग में उसका उल्लेख करते थे। दत्त उपासक थे और महाराष्ट्र में एक दत्त उपासना का क्षैत्र है और वहाँ पर तो वर्ष में एक बार दो बार तो वे जाते थे ऐसे आध्यात्मिक पिण्ड के आधार पर जन जहान, राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर अत्यन्त विज्ञान निष्ट तर्कबद्ध बौद्धिक आधार पर ऐसा एक संघ का बहुत बड़ा व्याख्याकार, भाष्यकार अपने को ये मिला इसलिये संघ का जो वैचारिक संवृद्धी में बहुत बड़ा कन्ट्रीब्युशन उनका हो गया, अंतिम समय में पूना में ही रहे निकट से जानता हूं कैसे उनका विचार चला था। डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर के संबंध में आखिर का पुस्तक लिखकर पूर्ण होने के बाद वो तुरन्त चले गये, क्योंकि सर संघचालक जी ने उनको कहा था कि अम्बेडकर के साथ का तुम्हारा संबंध के आधार पर एक पुस्तक लिखो। आज वो पुस्तक अवेलेबल है, मूल मराठी में है, हिन्दी मैं भी भाषान्तरीत हो चुका है, अंग्रेजी में करना चल रहा है ऐसे एक बहुत बड़े आदमी के जन्म दिन पर आप सब लोगों के साथ सम्मिलित होने का मुझे एक मोका मिला  इसलिये मैं स्वदेशी जागरण मंच के लोगों का अपनी और से बहुत बड़ा कृतज्ञ हूं इतना कहकर भाषण समाप्त करता हूँ।

 

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महामानव श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी – A Life Sketch of Sri Dattopantji Thengadi

महामानव का शब्दचित्र  – डॉ. रणजीत सिंह

प्रारम्भिक प्रसंग –

राष्ट्र ऋषि श्रद्धेय श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी का जन्म 10 नवम्बर, 1920 को, दीपावली के दिन, महाराष्ट्र के वर्धा जिला के आर्वी नामक ग्राम में हुआ। दत्तोपंत जी के पित्ताजी श्री बापूराव दाजीबा ठेंगड़ी, सुप्रसिद्ध अधिवक्ता थे, तथा माताजी, श्रीमति जानकी देवी, गंभीर आध्यात्मिक अभिरूची से सम्पन्न, साक्षात करूणामूर्ति, और भगवान दतात्रेय की परम भक्त थी। परिवार में एक छोटा भाई श्री नारायण ठेंगड़ी और एक छोटी बहन श्रीमति अनुसूया थी।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी की 11वीं तक की शिक्षा, आर्वी म्युनिशिपल हाई स्कूल में सम्पन्न हुई। बाल्यकाल से ही, उनकी मेधावी प्रतिभा तथा नेतृत्व क्षमता की चर्चा सब ओर थी। 15 वर्ष की अल्पायु में ही, आप आर्वी तालुका की ‘‘वानर सेना’’ के अध्यक्ष बने। अगले वर्ष, म्युनिशिपल हाई स्कूल आर्वी के छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। 1936 में, नागपुर के ‘‘मौरिस कॉलेज’’ में दाखिला लेकर अपनी स्नातक की पढाई पूरी की और फिर, नागपुर के लॉ कॉलेज से, एल. एल. बी. की उपाधि प्राप्त की। मौरिस कॉलेज में अध्ययन के दौरान, आप सन् 1936-38 तक क्रान्तिकारी संगठन ‘‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसियेसन’’ से सम्बन्ध रहे।

संघ से संपर्क

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी अपने बाल्यकाल से ही, संघ शाखा में जाया करते थे। दिसम्बर, 1934 के वर्धा जिले के शीत शिविर में पहली बार परम पूज्य डॉक्टरजी के दर्शन किये और उनका उद्बोधन सुनने का  सौभाग्य मिला। हालांकी वह अनियमित स्वयंसेवक थे, फिर भी नागपुर आने के बाद अपने सहपाठी और मुख्य शिक्षक श्री मोरोपंत जी पिंगले के सानिध्य में, दत्तोपंत जी ने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्गों का तृतीय वर्ष तक का शिक्षण क्रम पूरा किया। 1936 से नागपुर में अध्यनरत रहने तथा माननीय मोरोपंत जी से मित्रता के कारण दत्तोपंत जी को परम पूजनीय डॉक्टर जी को प्रत्यक्ष देखने, सुनने का अनेक बार सौभाग्य प्राप्त हुआ। आगे चलकर परम पूजनीय श्री गुरूजी का अगाध स्नेह और सतत मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

प्रचारक जीवन का प्रारम्भ

दिनांक 22 मार्च 1942 को संघ के प्रचारक का चुनौती भरा दायित्व स्वीकार कर आप सुदूर केरल प्रान्त में संघ का विस्तार करने के लिए ‘‘कालीकट’’  (Kozhikode) पहुंचे। 1942 से 1945 तक रा. स्व. संघ प्रचारक के नाते यशस्वी कार्य खड़ा करने के साथ ही, 1945 से 1947 तक, कलकत्ता में, संघ के प्रचारक के नाते, तथा 1948 से 49 तक बंगाल.असम प्रान्त के प्रान्त प्रचारक का दायित्व सम्पादन किया। इस समय राष्ट्रीय परिदृष्य में,भारत विभाजन, तथा पूज्य महात्मा जी की हत्या से उत्पन्न परिस्थितियों का बहाना बनाकर संघ पर आरोपित प्रतिबंध और देशभक्तों द्वारा अन्यायकारी प्रतिबंध के विरूद्ध देशव्यापी सत्याग्रह, इसी बीच जून माह में,सरकार के साथ बातचीत का घटनाक्रम तेजी से घटा और श्री वेंकटराम शास्त्री की मध्यस्थता में, सरकार ने संघ पर लगाया गया प्रतिबंध वापिस लिया। ऐसे चुनौती पूर्ण समय में, श्रद्धेय दत्तोपंत जी को बंगाल से वापिस नागपुर बुला लिया गया।

विद्यार्थी परिषद् की स्थापना

9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की औपचारिक घोषणा हुई। और, दत्तोपंत जी को,विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य तथा नागपुर विदर्भ के प्रदेशाध्यक्ष के नाते जिम्मेदारी दी गई। श्री दत्ताजी डिडोलकर को महामंत्री तथा बबनराव पाठक को संगठन मंत्री का दायित्व दिया गया।

विद्यार्थी परिषद् ने नागपुर-विदर्भ में सरकार के साथ अच्छे संबंध स्थापित किये। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, अर्थमंत्री, राज्यपाल आदि सभी को  अपने उत्सवों में बुलाने का क्रम विद्यार्थी परिषद् ने जारी रखा। अन्नमंत्री गोपाल राव काले के नेतृत्व में जो अधिक अन्न उपजाओ अभीयान चल रहा था, विद्यार्थी परिषद् ने पूरी शक्ती के साथ उसका समर्थन किया पूरे प्रदेश में जन-जागरण की दृष्टी से कार्यक्रम हुये। बडोदा,  फेटरी और गुमथला में सरकारी योजना के अन्तर्गत कम्पोस्ट खाद तैयार करने के यशस्वी प्रयोग भी हुये। प्रादेशिक सरकार ने भी एक डॉक्युमेन्ट्री के द्वारा विद्यार्थी परिषद् के इन प्रयासों को उचित प्रसिद्धी दी।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी के शब्दों में, “हमारी कार्यकारिणी ने कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर सुयोग्य व्यक्तियों के भाषण विद्यार्थीयों के लिये करवाने का विचार किया। नियमित अभ्यासक्रम में आने वाले महत्वपूर्ण विषयों पर सुयोग्य प्राध्यापकों के भाषण करवाये गये। अभ्यासक्रम के बाहर  भी कुछ महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी विद्यार्थीयों को हो यह विचार कार्यकारिणी ने किया। इस हेतु जो विषय चुने गये उनमें एक था “मध्यप्रदेश मजदूर आन्दोलन का इतिहास” इस विषय के संबंध में प्रादेशिक इंटक के अध्यक्ष श्री पी. वाय. देशपाण्डे इनके साथ मैं बात करूं यह तय हुआ। तद्नुसार मैं उनके पास गया, वैसे उनके साथ हमारा पारिवारिक संबंध था। आज हरिजन सेवक संघ की अध्यक्षा और राज्यसभा सदस्य कुमारी निर्मला देशपांडे के वे पिताजी थे। मैंने अपना विषय उनके सामने, उन्होंने गुस्से में आकर कहा कि, “यह सारी फिजूल बातें रहने दो, आज देश के मजदूर क्षैत्र पर सबसे बड़ा संकट कम्युनिस्टों का है। वे मॉस्को के                          पिट्ठू है। मजदूर क्षैत्र में उनके प्रभाव को रोकना आवश्यक है। इस दृष्टी से तुम स्वयं इंटक में आ जाओ, और यहाँ कुछ जिम्मेदारी का वहन करो।“ मैंने कहा कि इस विषय में मैं गम्भीरता से सोचूगाँ।

वापिस आने के बाद परम पूजनीय श्रीगुरुजी को यह बात बताई। मैं तो व्यक्तिगत रूप से इंटक में जाना पसंद नहीं करता था। क्योंकि इंटक के सभी नेता संघ को गांधी हत्यारा, ऐसा कहते हुये निन्दा करते थे। ऐसे लोगों में जाकर मैं कैसे काम कर सकूंगा ?

किन्तु श्रीगुरुजी की प्रतिक्रिया देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि श्री पी. वाय. देशपांडे का निमंत्रण यह हमारे लिये सुवर्ण अवसर है। मैं भी चाहता हूं कि अपने पास ऐसे भी कार्यकर्ता रहे जो मजदूर क्षैत्र में काम करने की पद्धती को जानते हो। इसलिये इस निमंत्रण को तुम स्वीकार कर लो और विद्यार्थी परिषद् के साथ ही इंटक में काम करो।

कुछ दिनों के बाद श्री देशपांडे जी ने मुझे बताया, की मुझे निमंत्रण देने का सुझाव गृहमंत्री श्री द्वारकाप्रसाद जी मिश्र का था। मेरे सभी कार्यों पर उनकी दृष्टी थी। इंटक में उस समय दो गुट हो गये थे। एक मिनिस्टेरियल और दूसरा एंटी मिनिस्टेरियल, एंटी मिनिस्टेरियल गुट के प्रमुख डॉ. डेकाटे थे। वे कुशल संगठक थे।उन्होंने इंटक में अपना प्रभाव बढ़ाया था। उनकी तुलना में दूसरा कोई भी कुशल संगठक  मिनिस्टेरियल गुट में नहीं था। इस कारण मिनिस्टेरियल गुट कमजोर हो गया था। इसके लिये क्या किया जाये यह चर्चा श्री देशपांडे जी और द्वारकाप्रसाद जी इनमे हुई। इस चर्चा में द्वारकाप्रसाद जी ने कहा कि, देशपांडे जी मुझे इंटक में निमंत्रित करे। उन्होंने यह भी विश्वास प्रकट किया कि यह व्यक्ति डॉ. डेकाटे का मुकाबला सफलतापूर्वक कर सकेगा। इस पार्श्वभूमी पर देशपांडे जी ने मुझे आमंत्रित किया।“ (स्मृतिगंध पृष्ठ संख्या – 6) 

 परम पूज्य श्री गुरुजी की इच्छा और मजदूर क्षैत्र में प्रवेश –

1949 में ही परम पूजनीय श्री गुरूजी ने, श्रद्धेय दत्तोपंत जी को, मजदूर क्षेत्र का अध्ययन करने को कहा। इस प्रकार दत्तोपंत जी के जीवन में एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। ऐसा लगता है, मानो, मजदूर आन्दोलन दत्तोपंत जी के लिये ईश्वर प्रदत कार्य था। विद्यार्थी परिषद के जन-जागरण कार्यक्रमों के दौरान, कांग्रेस से सम्बन्धित, इण्डियन नेशनल ट्रेड युनियन कांग्रेस (इंटक) के प्रदेश अध्यक्ष श्री पी. वाय. देशपाण्डे जी से अच्छा सम्पर्क आया था। उसी का लाभ लेते हुए दत्तोपंत जी ने इंटक में प्रवेश किया। अपनी प्रतिभा और संगठन कौशल के बल पर थोड़े समय में ही इंटक से सम्बधित नो युनियनों ने, श्रद्धेय ठेंगड़ी जी को, अपना पदाधिकारी बना दिया। अक्टुबर 1950 में, श्री दत्तोपंत जी को इंटक की राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बनाया गया तथा साथ ही तत्कालीन मध्य प्रदेश के इंटक के प्रदेश संगठन मंत्री चुने गये। श्रद्धेय दत्तोपंत जी, कहते थे – ‘‘पूजनीय श्री गुरूजी का यह आग्रह था कि, केवल इंटक की कार्यपद्धति जानना प्रर्याप्त नहीं है। कम्यूनिस्ट यूनियन्स और सोशलिस्ट यूनियन्स की कार्य पद्धति भी जाननी चाहिये।”

श्रद्धेय दत्तोपन्त जी ने इस दिशा मे प्रयत्न प्रारंभ किये और 1952 से 1955 के कालखंड में श्री दत्तोपंत जी, कम्युनिस्ट प्रभावित ‘‘ऑल इण्डिया बैंक एम्पलाइज एसोशियेशन’’ (AIBEA) नामक मजदूर संगठन के प्रांतीय संगठन मंत्री रहे। 1954 से 55 में आर. एम. एस. एम्पलॉइज युनियन नामक पोस्टल मजदूर संगठन के वे सेन्ट्रल सर्कल (अर्थात् आज का मध्यप्रदेश, विदर्भ, और राजस्थान) के अध्यक्ष इसी कालखंड में (1949 से 1955) श्री ठेंगड़ी जी ने कम्युनिज्म का गहराई से अध्ययन किया। कम्युनिज्म के तत्व ज्ञान और कम्युनिस्टों की कार्य पद्धति आदि विषयों पर पूज्य श्री गुरूजी से वे रात के कई घंटों तक विस्तृत चर्चा किया करते थे। (शून्य से सृष्टि तक पृ. स. 14-15)

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना –

इस प्रकार पूज्य लोकमान्य तिलक की 99वीं जयन्ती के अवसर पर, देश के अन्यान्य प्रान्तों से आये हुए 35 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में, 23 जुलाई 1955 को, भोपाल में, भारतीय मजदूर संघ की, एक अखिल भारतीय केन्द्रीय कामगार संगठन के रूप में स्थापना की गई।

सनातन धर्म के वैचारिक अधिष्ठान, आलौकिक संगठन कौशल्य, परिश्रम की पराकाष्ठा, अचल धयेयनिष्ठा, विजयी विश्वास, और पूज्य श्री गुरूजी के सतत मार्गदर्शन के बल पर, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, मात्र तीन दशक में ही, उस समय के सबसे बड़े, और कांग्रेस से सम्बन्ध मजदूर संगठन इण्डियन नेशनल ट्रेड युनियन कॉग्रेस INTUC को पीछे छोड़ दिया। सन् 1989 में, भारतीय मजदूर संघ की सदस्य संख्या 31 लाख थी, जो कम्युनिस्ट पार्टियों से सम्बन्ध, एटक AITUC तथा सीटू CITU की सम्मलित सदस्यता के भी अधिक थी। सन् 2002 में, भारतीय मजदूर संघ 81 लाख सदस्यता के साथ भारत का विशालतम श्रम संगठन बन गया, देश के सभी अन्यान्य केन्द्रीय श्रम संगठनों की कुल सदस्यता से कहीं अधिक थी। आज 2012 की गणना के अनुसार भारतीय मजदूर संघ की सदस्य संख्या 1 करोड़ 71 लाख से अधिक है।

हिन्दू जीवन मूल्यों के आधार पर, प्रकृति से गै़र–राजनैतिक और वैचारिक दृष्टि से प्रखर राष्ट्रवादी, स्वायत और स्वयंशासी भारतीय मजदूर संघ नामक जन संगठन खड़ा किया। पूज्य श्री गुरूजी ने, एक नवम्बर 1972 को ठाणे बैठक में कहा, ‘‘ जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने सोचा कि मजदूर क्षेत्र में भारतीय मजदूर संघ स्वंतत्र रूप से काम करें और इसका संगठन दत्तोपंत ठेंगड़ी खड़ा करें तो यह काम उन पर सौंप दिया गया। उन्होंने बड़े परिश्रम किए, अपने कार्यकर्ताओं की सहानुभूति और सहायता थोड़ी बहुत होगी ही, परन्तु उन्होंने अकेले यह कार्य किया,जिसको अंग्रेजी में ‘सिंगल हैंडिड’ कहते है। अब भारतीय मजदूर संघ का बोलबाला भी काफी हो गया है और श्रमिक क्षैत्र में यह एक शक्ति के रूप में खड़ा हो गया है। इसका प्रभाव बढता ही जा रहा है। अभी ऐसी स्थिति है कि मजदूर क्षैत्र में काम करने वाले जो अन्यान्य संगठन है, उनके पास, ठोस विचार देने वाले व्यक्ति कम है, वे केवल आंदोलन के भरोसे, ‘हो हल्ला’ मचाकर अपनी लोकप्रियता बढाने का प्रयत्न करते है। मजदूर क्षैत्र के लिए ठोस, योग्य विचार देने की क्षमता अभी इस भारतीय मजदूर संघ में ही हमें अधिक मात्रा में दीखती है।’’ (शून्य से सृष्टि तक पृष्ठ संख्या -14)

महामानव का प्रादुर्भाव –

पूज्य श्री गुरूजी और दत्तोपंत जी के सम्बन्ध कैसे थे? मैं माननीय पी.परमेश्वरन जी की साहित्यक भाषा का उपयोग करना चाहता हूं। श्री परमेश्वरन जी लिखते है, ‘‘श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी, उन थौड़े लोगों में से थे, जो परम पूज्य श्री गुरूजी की मनोरचना (Mind) को समझने में समर्थ थे। अगर परम पूज्य श्री गुरूजी, सनातन धर्म के हिमालय से निकलने वाली गंगोत्री थे, तो दत्तोपंत जी, को उस पवित्र जल में, गहरी डुबकियां लगाने का सुअवसर प्राप्त हुआ था।’’

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के कालखंड में भी श्रद्धेय दत्तोपंत जी,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्षेत्र के अनेक समानान्तर दायित्वों का, साथ–साथ निर्वहन कर रहे थे। इसी कालखंड में, 1949 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य, हिन्दुस्तान समाचार के संगठन मंत्री, 1951से 53, संगठन मंत्री, भारतीय जनसंघ, मध्यप्रदेश 1956 से 57 संगठन मंत्री, भारतीय जनसंघ, दक्षिणांचल।

दत्तोपंत जी के व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए भानुप्रताप शुक्ल लिखते है, ’’रहन–सहन की सरलता, अध्ययन की व्यापकता, चिन्तन की गहराई, ध्येय के प्रति समर्पण, लक्ष्य की स्पष्टता, साधना का सातत्य और कार्य की सफलता का विश्वास, श्री ठेंगड़ी का व्यक्तित्व रूपायित करते है।’’

1964 से 1976 तक दो बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गये। राज्यसभा में जाने का निर्णय हुआ तो दत्तोपंत जी कहते है, ‘‘मैंने पूज्य श्री गुरूजी से पूछा कि मुझे राज्यसभा में काहे के लिए भेज रहे हो? श्री गुरूजी विनोद करते हुए बोले, ‘‘जाओ, भाषण दो, विश्राम करो, बहुत परिश्रम किया है।’’, क्षणभर में ही गम्भीर स्वर में बोले, ‘‘एक और भी काम हो सकता है, राज्य सभा में अनेक दलों और अनेक विचारधाराओं के वरिष्ठ लोग आते है, उनके साथ व्यक्तिगत चर्चा, व्यक्तिगत सम्बन्ध,व्यक्तिगत मित्रता स्थापित करने का अवसर भी, है, जो आगे चलकर अपने कार्य के लिए उपयोगी हो सकता है।’’ परमपूज्य श्री गुरूजी, कितना आगे का सोचते थे, यह बात आपातकाल के विरूद्ध चलाये गये देश व्यापी आन्दोलन के समय अनुभव में आई। राज्यसभा के कार्यकाल के दौरान,देश के सभी प्रमुख राजनैतिक नेताओं से, समाजवादियों से लेकर साम्यवादियों तक, श्रद्धेय दत्तोपंत जी के अत्यन्त व्यक्तिगत सम्बन्ध होने के कारण, आपातकाल विरोधी आन्दोलन में सभी का सहयोग और विश्वास सम्पादित करना सहज सम्भव हुआ। 1964 से 1976 तक राज्य सभा के सदस्य रहते हुऐ, आपने राज्यसभा के अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। 1968 से70 तक आप राज्य सभा के उपाध्यक्ष मंडल के माननीय सदस्य रहे। 1965 से  66 तक, संसद की हाऊस कमेटी के सदस्य रहे। 1968 से 70 तक सार्वजनिक उद्योग समिति के सदस्य रहे।

सोवियत रूस की यात्रा और कम्युनिज्म से साक्षात्कार –

1969 में लोकसभा अध्यक्ष श्री नीलम संजीव रेड्डी की अध्यक्षता में, तथा राज्यसभा के सेक्रेटरी जनरल श्री बी. के. बेनर्जी के मंत्रीत्व में, भारतीय संसद के शिष्ट मंडल का सोवियत रूस जाने का कार्यक्रम तय हुआ। उस समय श्री वी. वी. गिरी राष्ट्रपति थे। श्री वी. वी. गिरी ने, इस संसदीय प्रतिनिधि मंडल में जाने के लिए श्रद्धेय दत्तोपंत जी का नाम प्रस्तावित किया। श्री वी. वी. गिरी, जो स्वयं मजदूर क्षैत्र से संबंध रहे थे, चाहते थे कि, सोवियत रूस में औद्योगिक सम्बन्धों का स्वरूप क्या है? इसका बारीकी से और निरपेक्ष भाव से अध्ययन करके, सम्यक जानकारी प्राप्त हो, क्योंकि कुछ समय बाद श्री वी. वी. गिरी भी रूस दौरे पर जाने वाले थे। 16 दिनों की सोवियत रूस की यात्रा में, उनके साथ, कम्यूनिष्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता, श्री हीरेन मुखर्जी तथा फारवर्ड ब्लॉक के श्री शिलभद्रयाजी प्रमुख थे। इस प्रतिनिधि मंडल के साथ, 16 दिनों तक सोवियत रूस तथा हंगरी की यात्रा की।

रूस यात्रा, श्रद्धेय दत्तोपंत जी के लिऐ, साम्यवाद के वास्तविक स्वरूप का बारीकी से अध्ययन करने का अपूर्व अवसर था। साम्यवादी विचारधारा का खोखलापन तथा, साम्यवादी विचारधारा के अन्तर्विरोधों का प्रत्यक्ष अनुभव करने के बाद श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, अथाह आत्म–विश्वासपूर्वक राष्ट्र को आश्वस्त करते हुए कहा था कि, ‘‘साम्यवाद अपने अन्तर्विरोधों के कारण, स्वतः समाप्त होने वाला है, साम्यवाद को समाप्त करने के लिए किसी को प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है।’’ देश भर में, अपने उद्बोधनों में, श्री दत्तोपंत जी ने यह उद्घोष किया, उस समय दुनियां के आधे देशों पर लाल झंडा लहरा रहा था। कोई भी जानकार व्यक्ति ऐसी बात मानना तो दूर, सोचना भी, समझदारी नहीं मानता था, ऐसे, सटीक विश्लेषक थे दत्तोपंत जी, आज, परिणाम हम सभी के सामने है।

दत्तोपंत जी की चीन यात्रा –

3 अप्रेल से 19 अप्रेल 1985 को, ऑल चायना फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स के निमंत्रण पर, श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी के नेतृत्व में, भारतीय मजदूर संघ का प्रतिनिधि मंडल चीन यात्रा पर गया। प्रतिनिधि मंडल में,श्री मनहर भाई मेहता, श्री रास बिहारी मैत्र, श्री वेणुगोपाल, और श्री ओम प्रकाश अग्धी शामिल थे। 17 दिवसीय चीन यात्रा के दौरान, दत्तोपंत जी ने, चीन, के समाज जीवन, औद्योगिक सम्बन्धों, मजदूर संगठनों, राज्य व्यवस्था का अत्यन्त बारीकी से अध्ययन किया। यात्रा के दौरान, चीन के मजदूर नेताओं, प्रसासनिक अधिकारियों, कम्यूनिष्ट पार्टी के नेताओं से विस्तार से चर्चा हुई। प्रतिनिधि मंडल के विदाई के अवसर पर, चीन रेडियो द्वारा, श्रद्धेय दत्तोपंत जी का विदाई संदेश रिकार्ड किया गया, जो 28अप्रेल 1985 को सार्वजनिक रूप से प्रसारित चीन यात्रा के पश्चात, अपने देश व्यापी प्रवास के दौरान, अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि, ‘‘चीन में, केवल नाम मात्र के लिए कम्यूनिज्म है, चीन, कम्यूनिज्म छोड़ चुका है।’’ उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता प्रकट की , कि, चीन के ट्रेड यूनियन्स ने, बी. एम. एस. की कार्यप्रणाली का व्यापक अध्ययन करने के बाद, हमें निमंत्रित किया था। उन्होंने कहा कि, बी. एम. एस. की त्रिसूत्री, ‘‘राष्ट्र का औद्यौगिकिकरण, उद्यौगों का श्रमिकीकरण, और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण, ’’ की सभी ने प्रसंशा की।

भारतीय किसान संघ की स्थापना  –

3-4 मार्च 1979 में, कोटा, राजस्थान में भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय अधिवेशन का आयोजन कर, किसानों के अखिल भारतीय संगठन की स्थापना की। देश के बहुत बड़े, शौषित–पीड़ित और असंगठित जन समुदाय में आत्म विश्वास जाग्रत करते हुए उन्होंने आव्हान किया कि, ‘‘हर किसान हमारा नेता है’’ और नारा दिया कि, ‘‘देश के हम भंडार भरेंगे, लेकिन कीमत पूरी लेगें।’’ महापुरूषों के संकल्प सत् संकल्प होते है, और सत् संकल्प, भगवान को पूरे करने होते है। सनातन हिन्दू धर्म के अधिष्ठान पर, पूर्णतः गैर–राजनैतिक, और प्रखर राष्ट्रवाद से प्रेरित, देश का सबसे बड़ा, सबसे सक्षम, जन संगठन खड़ा हुआ। सामुहिक चर्चा, सामुहिक निर्णय और सामुहिक नेतृत्व के सिद्धान्त और व्यवहार की सफलता की स्थापना की। आज भारतीय किसान संघ, किसानों और राष्ट्र के हितों का सबल, सजग प्रहरी के नाते सभी को ध्यान में आता है।

सामाजिक समरसता मंच और सर्वपंथ समादर मंच की स्थापना –

बाबा साहेब अम्बेडकर जन्म शताब्दी के अवसर पर पुणे में, दिनांक 14 अप्रेल 1983 को सामाजिक समरसता मंच की स्थापना की। यह सुखद संयोग था कि इसी दिन प. पू. डॉक्टर जी का जन्मदिन वर्ष-प्रतिपदा भी था। ‘‘सामाजिक समरसता के बिना सामाजिक समता असम्भव है।’’ इस ध्येय वाक्य का उद्घोष कर, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, हिन्दु समाज की अत्यन्त पीड़ादयक व्याधि के उपचार का मार्ग प्रस्सत किया। श्रद्धेय ठेंगड़ी जी को, पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर के निकट सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। पूज्य बाबा साहब के हृदय की पीड़ा को समझने का महान अवसर प्राप्त हुआ था। सर्वसमावेशी सनातन हिन्दू धर्म के अधिष्ठान पर हिन्दू समाज की एकात्मता के महान कार्य को सम्पादित करने के लिए,सामाजिक समरसता मंच के माध्यम से मार्गदर्शन प्रारम्भ किया। इसी कड़ी में, दिनांक 16 अप्रेल 1991 को नागपुर में, सर्वपंथ समादर मंच की स्थापना की।

आर्थिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष –  स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना

सन् 1980 के आस-पास श्रद्धेय ठेंगड़ी जी, ने विकसित गौरे देशों के,साम्राज्यवादी षडयंत्रों से राष्ट्र को सावधान करना प्रारम्भ कर दिया था। अपने सार्वजनिक भाषणों, कार्यकर्ता बैठकों, अर्थशास्त्रज्ञों की गोष्ठींयों तथा व्यक्तिगत बातचीत में राष्ट्र पर आसन्न संकट की स्पष्ट सम्भावना प्रकट करते थे। श्री ठेंगड़ी जी ने सावधान किया कि, ‘‘विश्व बैंक, अर्न्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष और, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, पश्चिमी गौरे देशों के, शौषण करने के नये हथियार है, जिनके माध्यम से, साम–दाम–दंड–भेद का उपयोग करते हुऐ गौरे देश, विकसनशील तथा अविकसित देशों का शौषण कर रहे है।’’ जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एण्ड ट्रेड (गेट) जिसकी स्थापना 1 जनवरी 1948 में की गई थी, इसमें केवल एक ही विषय था, माल का अन्तराष्ट्रीय व्यापार। 1986 में, गेट समझौते की उरूग्वै वार्ताओ के दौर में, कुख्यात डंकेल प्रस्तावों का मसविदा, सामने आया। अभी तक गैट वार्ताओं में, केवल माल पर लगने वाले सीमा शुल्क को कम करने के बारे में बातचीत होती थी। लेकिन, 1986 में, गैट के अध्यक्ष आर्थर डंकेल ने, गैट का दायरा विस्तृत करते हुऐ, ‘‘वस्तुओं के व्यापार के साथ, सेवाओं के व्यापार को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा और तीन नये विषय गैट वार्ता की टेबल पर लाये:-

  1. बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का व्यापार(TRIPS)
  2. निवेश सम्बन्धी उपक्रमों का व्यापार(TRIMS)
  3. तथा कृषि(Agreement on Agriculture)

डंकेल प्रस्तावों का व्यापक अध्ययन करने के पश्चात् श्रद्धेय दत्तोपंत जी,ने देश को आव्हान किया कि, ‘‘डंकेल प्रस्ताव गुलामी का दस्तावेज है।’’ उन्होंने आगाह किया कि, भारत सरकार देश विरोधी डंकेल प्रस्तावों को अस्वीकार करें। क्योंकि डंकेल प्रस्ताव, आर्थिक साम्राज्यवाद लाने वाला है। राष्ट्र की सम्प्रभुता संकट में पड़ जाएगी। उन्होंने केवल सरकार को चेतावनी ही नहीं दी वरन् डंकेल प्रस्तावों के विरोध में व्यापक जन–आंदोलन खड़ा करने के लिए, सरकार पर भारी जन दबाव लाने के लिए देश भर में जन-जागरण का आव्हान भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ तथा अनेक देश भक्त संगठनों की विशाल-रेलियों तथा प्रदर्शनों के माध्यम से, आर्थिक साम्राज्यवाद के कारण, आसन्न आर्थिक गुलामी के विरोध में,राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का आव्हान किया। उन्होंने इसे, स्वतंत्रता का दूसरा संग्राम कहा और इस दूसरे स्वतंत्रता संग्राम को चलाने के लिए 22 नवम्बर 1991 को नागपुर में स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। उस बैठक में अखिल भारतीय स्वरूप की पांच संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित थे। जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सहकार भारती, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय किसान संघ तथा भारतीय मजदूर संघ शामिल थे।

नागपुर बैठक में, स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक के नाते, डॉ. मा. गो.बोकरे को दायित्व दिया गया, डॉ. बोकरे सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा नागपुर विश्वविद्यालय के उप- कुलपति रहे। आप पूर्व में कट्टर मार्क्सवादी रहे, और कम्यूनिष्ट पार्टी के एक चोटी के विचारक, यह मान्यता उन्हें प्राप्त हुई थी, परन्तु कालान्तर में उनके विचारों में परिवर्तन हुआ और उन्होंने विख्यात पुस्तक ‘हिन्दू अर्थशास्त्र’ लिखा। इसके साथ ही, मा. मदनदास जी देवी को राष्ट्रीय सह संयोजक का दायित्व दिया गया। स्वदेशी जागरण मंच,भारतीय मजदूर संघ तथा भारतीय किसान संघ तथा अनेक देशभक्त संगठनों द्वारा व्यापक जन जागरण तथा जन दबाव के अभियानों के बावजूद, केन्द्र सरकार ने, संसद को भी अंधेरे में रखकर, डंकेल प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करके विश्व व्यापार संगठन समझौते को स्वीकार कर लिया।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, इस चुनौती को स्वीकार करते हुए स्वदेशी जागरण मंच के हैदराबाद अधिवेशन में, सम्मेलन को “युद्ध परिषद्” की बैठक संबोधित करते हुये विदेशी ताकतों के साथ “प्रत्यक्ष युद्ध” की घोषणा की, और सभी देशभक्तों को, स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई में भाग लेने का आव्हान किया। उनके आव्हान की ताकत थी की, देश की सारी मनीषा स्वदेशी जागरण मंच की संचालन समिति में भर गई थी। श्री मुरलीधर राव, श्री एस. गुरुमूर्ति, श्री गोविन्दाचार्य, श्री रविन्द्र महाजन, डॉ. महेशचन्द्र शर्मा, डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा, श्री योगानंद काले, श्री अब्राहम वर्गीज, श्री अरूण ओझा, श्री बी. एस. कुमार स्वामी, श्री बी. के. केला, डॉ. महेश शर्मा आदि केवल कुछ नाम है।

स्वतंत्रता के दूसरे संघर्ष के आव्हान की गूंज दलों और वैचारिक सीमाओं को लांघते हुए सर्वदूर सुनाई देने लगी। विख्यात वामपंथी नेता श्रीपाद् अमृतडांगे की पुत्री श्रीमति रोजा देशपांडे, सोशलिस्ट नेता श्री एस. आर. कुलकर्णी, पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर, विख्यात मजदूर नेता श्री जॉर्ज फर्नाडीज, विख्यात वामपंथी विचारक और सर्वोच न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर, विख्यात अर्थशास्त्री श्री रुद्रदत्त, विख्यात पर्यावरणविद् श्रीमति वंदना शिवा, आदि सभी, लोकमान्य नेताओं ने स्वदेशी के आव्हान को समर्थन और ताकत प्रदान की। यह दत्तोपंत जी के आव्हान की ताकत थी।

स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ और सभी देशभक्त संगठनों  को ओर व्यापक स्तर पर जन जागरण का आव्हान किया। देश भर में, स्थान स्थान पर, सभा संगोष्ठी, धरना प्रदर्शन, के माध्यम व्यापक जन जागरण और जन दबाव उत्पन्न किया। संघर्ष यात्राओं के माध्यम से देश भर में, जन जागरण यात्राओं का अभियान लिया गया। अनेक देश भक्त संगठनों ने अपने अपने प्रकार से शौध अध्ययन, समाचार पत्रों में, प्रचार प्रसार और विश्व व्यापार संगठन से देश पर होने वाले व्यापक दुष्परिणामों का व्यापक अध्ययन और शोध करके स्वदेशी आन्दोलन को ताकत प्रदान की। ऐसे महापुरूषों में डॉ. बी. के. केला अग्रिम पंक्ति में आते है जिन्होंने पेटेन्ट कानूनों के दुष्परिणामों का व्यापक अध्ययन किया।

वैश्विक आन्दोलन का नेतृत्व –

श्रद्धेय दत्तोपंत जी के स्पष्ट और कालजयी मार्गदर्शन से स्वदेशी आन्दोलन, कम समय में ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया। विश्व व्यापार संघ की द्विवार्षिक मंत्रीस्तरीय बैठकों से पूर्व देश भर में व्यापक जन जागरण और जन दबाव के कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार पर लगातार दबाव बनाये रखने में मंच ने सफलता प्राप्त की। पहली सफलता सियेटल में मिली। सियेटल में आयोजित डब्लयु. टी. ओ. की मंत्रीस्तरीय बैठक, में भारत के वाणिज्य मंत्री, श्री मुरासोली मारन ने हिम्मत के साथ, भारत की जनता का पक्ष रखा। उन्होंने स्वदेशी जागरण मंच के लोकप्रिय स्लोगन ‘‘ नो न्यू नेगोशियेसन बट री–नेगोशियेसन’’ पर स्थिर रहे और वार्ता आगे नहीं बढ सकी। सभी देशभक्तों ने उसकी सराहना की। W.T.O. की अगली मंत्रीस्तरीय बैठक ‘‘दोहा’’ में आयोजित की गई। वह भी सफल नहीं हो सकी। उसके बाद अगली मंत्रीस्तरीय बैठक कानकुन में आयोजित की गई। कानकुन बैठक से पूर्व देश भर में, W.T.O. के विरोध में व्यापक प्रदर्शन किये गये। दिल्ली में एक लाख लोगों का विशाल प्रदर्शन हुआ। इस सबका सरकार पर दबाव उत्पन्न हुआ। कानकुन सम्मेलन में भारत के वाणिज्य मंत्री श्री अरूण जेटली ने, भारत का पक्ष व्यापकता से रखा। कानकुन बैठक में अनेक अफ्रिकी देशों तथा कैरेबियन देशों ने भी भारत का साथ दिया तथा कानकुन बैठक असफल रही।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, विश्व व्यापार संगठन के समझौते पर स्पष्ट मार्गदर्शन करते हुए कहा था कि, ‘‘वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन इज ए मिसनोमर, इट इज ए, वैस्टर्न वर्ल्ड, ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन’’ इतना कहने से सारा विषय समझ में आ जाता था। W.T.O. के विरोध में उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था कि, ‘‘डब्ल्यु.टी.ओ., तोड़ो, छोड़ो या मोड़ो’’। वास्तव में स्वदेशी आन्दोलन के माध्यम से श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने वैश्विक आन्दोलन का सफल नेतृत्व किया।

देश और धर्म पर आई हर चुनोती  स्वीकार –

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेगड़ी ने सम्पुर्ण जीवन में , समय – समय पर सनातन हिन्दू विचार की प्रासंगिकता को स्थापित करने का महान कार्य सम्पादित किया। 1948 से 49 में, जब, कम्युनिज्म बड़ी चुनौती के रूप में विश्व पटल पर छाया हुआ था उस समय, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने प. पू. श्री गुरूजी के मार्गदर्शन से, मजदूर क्षैत्र में, भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करके और सनातन हिन्दू दर्शन के प्रतिष्ठान पर देश का सबसे बड़ा मजदूर संगठन खड़ा कर, साम्यवादियों को उनके ही क्षैत्र में, परास्त किया। साम्यवाद और पूंजीवाद की दोनों विचारधाराओं को, भौतिकवादी विचार दर्शन कह कर अस्वीकार करते हुए श्रद्धेय ठेंगड़ी जी ने हिन्दू विचार दर्शन के आधार पर ‘‘थर्ड वे’’ का प्रवर्तन किया, अर्थात हिन्दू जीवन मूल्यों के आधार पर विश्व व्यवस्था का प्रवर्तन भारत में पाश्चात्य लोकतंत्र की प्रणाली के अनेक महापुरूषों यथा, लोकमान्य तिलक, पू. महात्मा गांधी, श्री चक्रवर्ती राजगोपालचारी, श्री मानवेन्द्र नाथ राय, पू. श्री गुरूजी तथा पंडीत दीन दयाल जी ने पाश्चात्य लोकतांत्रिक प्रणाली को भारतीय समाज जीवन के अनुपयुक्त बताया था। श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी, हिन्दू परम्परा का मंडन करते हुए कहते थे कि, देश भक्ति से प्रेरित, स्वायत और स्वयंशासी जन संगठन राज सत्ता पर, धर्मदंड की भूमिका सफलतापूर्वक निभाएगें, तभी राजसत्ता राजधर्म का पालन करेगी। 1986 से डंकेल प्रस्तावों के विषय में और उसके बाद बने विश्व व्यापार संगठन के विषय में, राष्ट्र पर आसन्न आर्थिक साम्राज्यवाद और विदेशी गुलामी के विरूद्ध पुनः उन्होंने हिन्दू अर्थव्यवस्था की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए व्यापक जन आंदोलन तथा गंभीर वैचारिक आंदोलन का सूत्रपात किया। और ‘‘देशभक्ति की साकार अभिव्यक्ति है, स्वदेशी का सूत्र दिया।

परम पूज्य गुरूजी, और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की परम्परा में श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी ने सनातन धर्म के अधिष्ठान पर राष्ट्रवादी विचार प्रवाह को सुपरिभाषित करने का महान कार्य सम्पन्न किया। समकालीन विभाजनकारी राजनीति के संशौधन हेतु,वैकल्पिक राजनैतिक प्रक्रिया को वैचारिक तथा व्यवहारिक अधिष्ठान प्रदान करने का महान कार्य आपने सम्पादित किया। श्रद्धेय ठेंगड़ी जी ने, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, तथा स्वदेशी जागरण मंच जैसे राष्ट्रवादी संगठनों का निर्माण केवल परिवर्तन के वाहक के रूप में ही नहीं, तो राष्ट्र के समक्ष और समर्थ प्रहरी संगठनों के रूप में किया। ये केवल एक ओर आन्दोलन मात्र नहीं होकर आधुनिक राजनीति की अपर्याप्तता को संशोधित करने का सशक्त माध्यम बने। इसीलिए कृतज्ञ राष्ट्र ने श्रद्धेय ठेंगड़ी जी को राष्ट्र ऋषि कहकर संबोधित किया।

महानिर्वाण –

दिनांक 14 अक्टुबर (अमावस्या) 2004 को पुणे में, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी को महानिर्वाण हुआ। आपका विचार–धन, हजारों वर्षों तक देशभक्तों को मार्गदर्शन करता रहेगा। आपने लगभग 200 से अधिक छोटी–बड़ी पुस्तके लिखी, सेकड़ों प्रतिवेदन प्रकाशित किये तथा हजारों की संख्या में आलेख पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित है।

–डॉ रणजीत सिंह

Integral Humanism – A Study

एकात्म मानव दर्शन : एक अध्ययन

Panditji’s most valuable contribution to mankind was his enunciation of the concept of Integral Humanism. Those deeply involved in the make-and-break politics may mistake Panditji’s Integral Humanism as a new ‘ism’ or doctrine or dogma propounded by him inorder to counter all other prevailing ‘isms’ or to add a new one. It is all too well-known that prophets of an ‘ism’ or a new political thought claim originality. It is more so in the West. A slight deviation or difference with the current thought entitles one to proclaim himself the founder of a new doctrine. But no such thought ever crossed Panditji’s mind. As a true votary of culture, he was not given to this narrowness. He believed in what Bhagwan Sri Krishna said in the Gita that true knowledge is timeless. One may observe some variation in its expressed form owing to varied situations and conditions but that does not mean the creation of new knowledge. Panditji, through his creative ability and positive outlook put a new gloss on the true and eternal thought current and reinterpreted it to suit the changed and contemporary world. It would be clear, therefore, that integral humanism was conceived only to perfect ‘isms’ so that they could meet the challenges posed to them. It was farthest from his thought to add to the ideological bitterness obtaining in the society by outright rejection or repudiation of any of the contemporary ideas, ism or viewpoints while expressing his own.

Why this ‘ism’ or that

Pandiji was opposed to all ‘isms’. He only believed that which was truthful and timeless, could face the challenges of change and, therefore, could hardly fit into the steel-frame of any ‘ism’. In other words, no ‘ism’ can ever suit all countries and conditions and for all times. He precisely thought so. But in the modern age, people cannot think without an ‘ism’, and he too adopted the usage only as a compromise for the convenience of his audience.

But to dispel any doubts in this behalf, he used to explain that as one cannot easily concentrate his mind in निर्गुण (“Nirgun” or attribute-less) (or) निराकार (“Niraakar” or formless) ब्रह्मा (Brahma), he needs in the beginning, to fix his mind on सगुन (Sagun or of attributes) or साकार (Sakar or of forms) ब्रह्मा (Brahma). Once one gets accustomed to this form of concentration it becomes easier for him later to do so in respect of the “Nirguna” or “Nirakar” Brahma also. So to grasp easily the real and eternal truth which is above all ‘isms’, first one has to comprehend fully the reality that exists in this world through the medium of integral humanism.

Seer not a Philosopher

To engage oneself in constant debate, discourse or a controversy is the function of a philosopher. Panditji was not a philosopher in that sense of the term. To call him so is to belittle him. In the tradition of Bharatiya sages of yore, he was in fact a seer. Therefore, whatever he has seen and perceived, may be called दर्शन, “Darshan”. The word philosophy hardly conveys what we Bharatiyas mean by the term. This kind of “Darshan” is neither new nor unfamiliar to us. It has flourished in our soil. It will be worthwhile to understand this basic point before we proceed further so that there is no confusion because of the use of this suffix.

Why at all we needed the term and the concept of Integral Humanism at this juncture, specially when many many ‘isms’ and thoughts were born, spread and are regarded as progressive in the west. Many of our people wonder whether it is worth its while to strain our brains unnecessarily when our problems could be solved by borrowing wholesale the ‘isms’ or theories of the west. Similarly, it is also unreasonable to reject everything of western origin. It would therefore be useful to briefly review the currents and cross-currents of western thought in the last three or four centuries.

Western Thought

Let us, first of all, deal with ‘sect’, or religion. It can be stated briefly that when this drama of religion was being enacted on the European stage, the entire system or order was centrifugal. The Pope was the central point and the entire Christian world revolved around him. Later on, two revolts challenged the centralized authority of the Pope.

In the second phase of religion, the idea that there was no need of an intermediary like the Pope between the seeker and the sought became very powerful. This gave rise to sects like the Protestants. The people thought that interference by an external authority which may be confined to religious matters, should not be permitted in the affairs of the state. Thus was born the concept of Nationalism.

In the third phase, we find that the existence of religion was attacked and it was decried as meaningless as an ‘opiate’. To think of a supernatural power beyond perceptible human power came to be regarded as devoid of truth and mere flight of imagination. The origin, middle and the end of the universe was nothing but godless physical matter. Religion was nothing but an illusion. As physical elements and matter were believed to be origin of nature, mind too was considered a superstructure on matter. I other words, religion, culture, ethics, etc., has no independent existence and were mere reflections of social and economic conditions. Thus in the third phase, matter became fundamental and religion was totally rejected.

Reaction against Atheism

The next phase of development in Europe witnessed a reaction against materialistic atheism. Scholars and thinkers began to realize that whatever views Marx might have formed on degeneration of religion and the Church and howsoever relevant they might have been to the situation then prevailing there, it would be wrong to regard them universal or global. Instead, emphasis shifted to re-evaluation of the place of religion in the different countries in different periods. Thinkers began saying that even if religion was not to be regarded as fundamental to human life, they would have to concede, it had a distinct place and it would be wrong to think that religion was an opiate or its form was determined by social and economic condition.

Change in Marxists’ Thinking

Such ideas started gathering momentum. Further, even the staunchest of Marxists who, very loudly denounced God in favour of materialism and who condemned religion as opiate, started doubting Marx as crude materialist. His thesis in 1842, on the freedom of the individual and the freedom of the press, and his Economic and Philosophical Manuscripts published in 1844, prompted his followers to declare that he was not a mere materialistic thinker. They thought that just as inanimate and material things influenced abstract thought, abstract thinking too influenced insentient material objects. Similarly, if, on the one hand, social and economic situation played an important role in shaping religion, culture and ethics, on the other, socio-economic conditions were also influenced by religion, culture and ethics. In other words, they act and interact on each other.

Four Centuries of European Thought

Let us discuss what does European history of four centuries reveal? We find that in the early period individual is the primary unit. But when the curtain is raised, we do not find the free individual anywhere on the scene. He is merely a puppet in the hands of the Pope or of the Monarch with no free will of his own.

In the next stage, we see that the individuality of man asserts itself through defiance of the oppressors. This led to open revolt against the Pope and the Monarch, which liquidated the authority of the Papal state and monarchy. Later, the thought that individual freedom should remain unrestrained gained ground. Institutions like the Parliament, or other democratic systems which ensured individual freedom came into existence and people were happy that those agencies could protect individual liberty.

With the passage of time, individual liberty led to freedom for exploitation; the democratic institutions turned into means of exploitation of the weak by the strong, of the poor by the rich and of the less intelligent by the more intelligent. We thus witness in Europe emergence of two classes – the exploiting minority and the exploited majority. Those oppressed to any kind of exploitation were up against freedom of exploitation while those opposed to it wanted to do away with individual freedom. In other words, extinction of individuality of the individual was demanded. The situation, then, warranted a totalitarian apparatus. And what could it be?

All intents to establish a totalitarian state in the name of individual freedom and all institutions wanting freedom of exploitation met with strong opposition. Thus arose the need of a revolution, a bloody revolution, since democratic institutions were found to be incapable of ending exploitation. It is how the idea of a bloody revolution aimed at establishing a dictatorship of the proletariat gained popular support. Incidentally, a bloody revolution did take place in Russia. But experience proved that it was not the dictatorship of the entire exploited masses but of a coterie, a ruling coterie. People tolerated the order in the hope that, that was a transitory phase and that as soon as the dictatorship of the have-nots was established, the situation would change. But their hopes were belied and they began to realize that the dictatorship of an individual or a small clique has come to stay. That, perhaps, is the reason why we witness signs of revolt against this order, the one under which they are groaning.

Urge for Individual Freedom

It appears that rumblings against the communist state and the urge and efforts to restore individual freedom have set in. In the countries which are not directly ruled by communists but have communist parties, party leaders are hotly debating why could not democratic institutions and agencies be used to end exploitation. An influential section of such leaders argue that, may be the idea of bloody revolution was relevant and inescapable in the timers of Marx, but in the changed circumstances, parliamentary institutions could be utilized for founding dictatorship of the proletariat. On the other hand, in countries where Communism had not gained any foothold and where parliamentary democracy and other democratic institutions were welcomed as alternative to monarchy and as weapon to defend the individual, people seem to be losing faith in these very institutions. This section believes in complete freedom and is not prepared to bear with even such restraints and discipline as the western democracy prescribes for the individual. It makes no distinction between freedom and licence. Hippies, in the western world, belong to this section. They are not only opposed to democratic institutions but to any order that be. This, in short, is what has been going on in the West during the last three or four centuries; that is individual dominated as the central entity.

Revolt against ‘Family’

Now after the individual, we will discuss the institution and the system of family which remained intertwined in all societies through the ages. Hindu Shastras, Confucianism, Islam and Christianity all alike, accepted it as indispensable.   But in the west, this too was attacked for two reasons. The Communist condemned the family as being artificial system. They asked ‘why as entity like family should be allowed to stand between the individual and the society?’ – So – ‘break the family and set up communes’, they exhorted. In another direction a strong dislike was expressed against family discipline which each individual had to undergo. This, according to the dissenters, is a negation of individual freedom. The family, therefore, deserves to be destroyed and the young men or women should bid good-bye to their parents after marriage. The smaller the ones’ family, the better for unrestrained actions and doings.The deficiencies and faults of the two schools came to the fore sooner than later. The experiment of communes, in Soviet Russia flopped and as a reaction the desire for family life grew stronger. Even under communist state demand for extending legal recognition to parenthood and fatherhood became so forceful that ultimately the rulers had to yield. Similarly, in democratic countries, more especially in the U.S.A, eminent thinkers raised their voice against Hippie cult of licentious way of life and suggested reintroduction of the joint family, without which, a stable society was a far cry. Such views are now being widely accepted in USA.

Nationalism

The unit next to family is nation, society or national society. Somehow, it appears that owing, perhaps, to the overwhelming influence of the Pope over European masses, the awareness of nation or nationalism could not develop. But the same grew out of the reaction against the Pope’s interference in religion and against foreign and imperialist aggression. This background gave birth to a reactionary type of nationalism in Europe, which reinforced the view that if nationalism and the authority of the Pope could not go together, nationalism and internationalism were also opposed to each other. Consequently, a crude and extremist form of nationalism was born in every country of Europe.  Later a reaction to this extremist nationalism was natural, which led to the emergence of another extremist ideology – Communism.

Communism discarded the concept of religion nation or nationalism etc., as being redundant and meaningless and required everyone to think in terms of internationalism which alone was considered relevant. When in 1914 during the First World War, workers in several countries supported their respective national governments; Lenin could not help expressing his anguish over their stance. He suggested that the workers, instead of co-operating with their governments, should have turned traitors and strengthened the wave of internationalism.

Before long the communists took over in a number of countries. But in the process the charisma of internationalism began fading and nationalism again started reasserting as a force so much so that even under the state wedded to internationalism a thinker like Morris Hindos in his book ‘Mother Russia’ makes a strong advocacy of nationalism. In this context the two chapters of the book, “Rediscovery of the Past” and “Russia for Russians” are quite significant. And how the two internationalist powers (Russia and China) are set on a collision course at present is too well-known for comment.

Progress Stunted

The present conflict between nationalism and internationalism leaves little or no scope for the west to think of mankind as a whole. The reason behind this is that their entire thinking is homocentric – which means, that the center of the universe is the human race and the western realm of thought has kept revolving around it. Let us not take sides in the ideological strife of the west as to which one is right and which is wrong. But one cannot help concluding that whenever an ideology was imported into this country from the west, it was acclaimed as progressive and all other were branded reactionary. In spite of this, we find that none of the so-called progressive ideologies lasted long. They continued to change and vacillate from one extreme to another. This makes it very clear that the western thought has yet to attain durability and finality.

Product of Reaction

In short, the western though instead of being positive is an outcome of reactionLet us put it like this: Suppose there is a particular situation prevailing in a country, it is bound to give rise to an idea or thought. It also needs revision when the situation changes. Therefore, the entire western thinking being based on reaction, we notice a serious ideological conflict in that part of the world. We reckon it as their second trait. The third one is that no western though is all embracing, is valid for all times. Moreover, it is very much segmented. The fourth being their failure to synthesize the essence of varied thoughts put forth from time to time, with the result that they remained diverse and incompatible. The French Revolution is an instance point.

Life Values

The subject for today’s discussion has in the present circumstances assumed great relevance and is a lesson for our country. It would, therefore, be essential to comprehend it well.

For the sake of equality, the difference in the minimum and maximum income is sought to be reduced (we too want it). It would then be argued that in the meantime inspiration for one’s development will go. If the live values were to be purely economic, one is apt to think as to why he should work hard. In spite of one’s sweating labour and becoming an Einstein or a Radhakrishnan if he for reasons of equality received no more than Rs.2000, his enthusiasm is dampened. On the other hand, if he is a damned idler and remains a peon he cannot be paid less than Rs.100. Why then one should be up and doing to become Einstein or Radhakrishnan.

Therefore, if the source of inspiration were purely material, the will to individual improvement or enterprise will die and if the same were to be encouraged with material gain as the end, the object of equality will have to be given good-bye. The present-day problem of brain-drain in our country has its roots in that the life values have become purely materialistic with the result that if a higher material development is not attainable in this land, it should be sought elsewhere.

In order to change this unhappy and unhealthy situation, we need a life system with different values. The system should be an amalgam of material as well as non-material life values of universal nature. I am deliberately avoiding the term ‘spiritual’ nature. One is as much inspired by material motives as by the desire of social prestige or status. Let there be a system embracing both. Ancient Bharat did evolve such a system. The system ordained an inverse ratio for acquisition of social prestige and material gains.

That is, if one aims at highest social prestige, he should be prepared to forego personal material benefits in the same ratio to further elaborate the point, highest prestige or reverence could be commanded against lowest intake of society’s material resources. If, on the contrary, one wanted maximum benefit from the society, he was free to do so, but he won’t be entitled to social prestige in the same measure. This, an order based on careful balance of the two human incentives was achieved and maintained.

West lacks Balance

But the west lacked this balance. In the early days, after Communist Revolution in Soviet Russia, people were forced to work under the overseer’s whip. And today there exists 1 to 80 disparity in the minimum and maximum incomes which completely negates their avowed equality. Even existence of classes is being tolerated. The former Yugoslavia Prime Minster Djilas in his book, ‘The New Class’ confirms this disparity. Not only that, special amenities and benefits are being offered to some, as social incentives. I would recall here, when Russia shot its first Sputnik, Khrushchev proudly proclaimed it as a victory of communism. But soon came a rebuff from the well-known philosophers Bertrand Russell, “that was not the victory but the defeat of communism – that it was because of special treatment given to the scientists which was a privileged class, which enabled them to make the Sputnik”.

I also endorse it as a defeat of communism because they could not reconcile materialist way of life with equality. This is true of Russia, Yugoslavia and all other communist countries. To be precise, all incompatibilities obtaining in democracies are equally discernible in communist countries. To be precise, all incompatibilities obtaining in democracies are equally discernible in communist countries. In other words, western ideologies lack eternality, finality and durability. They are used to thinking in bits and grooves, with the result that the ideologies of the west instead of being positive are reactionary in nature. They lacked the capacity to harmonize the various desirable goals relating to a society and to a period of time.

No Blind Imitation

Against this backdrop, we are forced to recapitulate, whether we in this country, can afford a blind imitation of the west. Swami Vivekananda was told by western thinkers, “we would accept your ideas of spiritualism and in return you should accept our ideology of socialism. You agree with us in the sphere of economics, while we do so in the area of spiritualism”.

But, Swamiji replied,Brothers, you are right, but your new ideology is in experimental stage while ours is an ancient nation. We are no fanatics. Before we accept your ideology, let us see that it has stabilized. We should like to see the evidence whether it has sustained the society for some five hundred years. We cannot accept an ideology which has not yet been tired and is still in a state of experimentation”.

Communism – its plus and minus

Communism is acknowledged in the west as the most progressive ideology of the day! Let us scrutinize it in the context of Swamiji’s statement. Fifty years has hardly elapsed since the Russian Revolution when cracks appeared in communism. The very definition of communism is being disputed in its own camps. While Russia decries China as deviationist and revisionist, China hurls back the same invective at Russia and both use these accusations against Yugoslavia. Dange is revisionist in the eyes of Namboodiripad and vice versa. The two are agreed that Charu Mazumdar was a deviationist and revisionist and in the reckoning of the latter Dange and Namboodiripad are “misguided Marxists“.  If one were to compile the epithets used by one communist camp against the other, word communism, would be reduced to, word deviationism. There is nothing in communism which has not been found faultless. No rationalist can comfort himself over this situation. If within a short span of fifty years, the entire camp of the so-called progressive nations can come to such a degree of deviation, to quote Swamiji, “what is the guarantee that the ideology has the strength to sustain the society for five hundred years”?

Reconstruction

When we deice to review various ideologies we will have to examine their merits and demerits without following them blindly. We should not object to adopting whatever is worthy. One reconstruction, the late Sarsanghchalak of RSS, once said of our old order, “There may be many withering leaves and branches of trees which have already decayed. Let them decay and fall. Let us not be sorry over this. Similarly, if fresh sprouts grow, we should welcome them. All that has to be watched is that they do form an organic while with the mother tree, they are one with the tree. The dried leaves and the dead wood will fall and new offshoots will issue in their place with the passage of time. This is a natural process. So let there be no hesitation, rather we should welcome new thoughts. The only condition is that they should help us in reaching our goals”. But it appears that west can hardly ensure this.

Bharatiya Way of Life

Now we are set on reviewing the western thought. Likewise they are doing the same about out thought. And about our socio-economic structure they hold views contrary to ours. They do not find anything congruous and consistent in any area of thought of system. Instead, they see chaos everywhere. Let us take such areas one by one and religion first.

In the eyes of westerners, a complete anarchy prevails in the sphere of religion. For them, there is no single or uniform faith in Bharat. While one is a theist the other is an atheist, the third a monoist and the fourth a dualist. Some worship idols, some formless God and other reject God in all forms. Even the believers do not have a common God. Gods abound, perhaps they number as many as their worshipers – some 333 million. This number was arrived at perhaps to match the Indian population of yore. Every individual is free to choose his or her own path to suit his nature, psyche, physique, and need of the soul. The paths are bound to differ. But this is unthinkable in the west, firstly because, there is regimentation in thinking and secondly because, they are used to an exclusive thinking that ‘I or my path alone is right’. It is not very unnatural for them to deduce that India is full of diversities and contradictions and they are indeed baffled by them. Similarly, the places of family, nation, society, internationalism vis-à-vis the individual also appear to them to be fraught with inner contradictions.

We believe that the individual must have the fullest scope of development and is entitled to utmost happiness. Therefore, the social and economic system should be so fashioned that the individual has full scope for happiness and development. Along with individual we have also recognized family. Mother and father have been regarded as gods (मातृ देवो भवः, पितृ देवो भवः matru devo bhav, pitru devo bhav). It was never suggested that because the entity of the individual has been recognized, he is free to abandon his parents and live away with his wife after marriage. Not only that the role of the individuals as well as that of the family has been defined and delimited, it has up for been further laid down that the individual should be given the sake of family. He can even be sacrificed. It has further been ordained that give up the whole world for the sake of the self (आत्मार्थ पृथिवीं त्यजेत atmarthe prithivim tyajet). Those influenced by western thought will apparently find these thoughts as inconsistent and incompatible. But we all know it is not so.

Individual and Society

The relationship of the individual with the nation-society has been similarly defined. But in the west, there appears a conflict between the two. A fierce controversy rages there over the question of the border between the individual and the society. If the individual is permitted bigger latitude the society is curtailed in the same ratio and if the society is allowed a wider range of control, the individual’s liberty is abridged in the same measure. Therefore, we witness a tug of war between the individual and society in the west.

But in Bharat, both have their due place. Neither is at loggerheads with the other. While the principle of individual’s right to complete happiness and development and also the society’s obligation to social discipline is demanded of the individual on the other. The individual is expected to strive for his contentment and development and simultaneously required to surrender to the will of the society, i.e to do his duty to the society unhesitatingly and voluntarily. The ultimate lies in his readiness to offer his happy and developed self at the feet of the society. Thus, we can infer that there exists a complete identification between individual freedom and social discipline to the great astonishment of the west.

Nationalism and Internationalism

What has been said above about man and society relationship is true of nationalism and internationalism. In the west, nationalism is a product of reaction. This is why there has been inherent disharmony between nationalism of two nations and between nationalism and internationalism. We have a nationalistic prayer saying “I am born in this good nation, give me happiness and glory”, (प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे – श्री सूक्त pradur bhuvan surashtre asmin kirtim riddhim dadatu me). We find more similar prayers for the good of the world.

I recall here an occasion during the deliberations of the Vishwa Hindu Parishad (World Hindu Conference), when a question was posed ‘how to define Hindu’. I cannot deal with the question here in depth but will touch upon one aspect of it where Hindu connotes nationalism, internationalism or even something beyond or more. The answer, however, was that when the whole world was uncivilized, world civilization was invariably identified with Hindu nationalism. But even that supreme position we never thought of exploiting other nations in the interests of our own. Our motto was कृण्वन्तो विश्वमार्यम्Krinvanto Vishwamaryam”, i.e  we are Aryans and will make the world Aryan – we are cultured and will strive to share our culture and refinement with others and raise their level. This thought forms the base of our positive nationalism, which is a historical fact and which instead of creating clash between nationalism and internationalism, provides rudiments of internationalism. We have been averse to the idea that one who claims to be a nationalist cannot be an internationalist and conversely one who is an internationalist cannot be a nationalist. Again the westerners are amazed at it. They fail to grasp how one can be a nationalist and an internationalist both at the same time. But we see no contradiction in it.

Beyond Humanity

What lies next, is beyond the west’s comprehension. They, at best, can think of internationalism or humanity and not beyond. But our thought has transgressed this limit and dwells upon still further – the entire life. Only we have conceived life other than human life. There are some among Hindus who feed fish, ants and cows with sugar and flour. Why so? Because they believe all life is like their own. Not only that, even inanimate objects are regarded as part of creation of the ParamAtma like their own selves, and worship even stones for they see the creator in them, as God is omnipresent. Further, our people inquired of themselves ‘what is man’, ‘what are other beings’, ‘what all this animate, inanimate, sentient, insentient creation is’ and themselves realized later that all creation is one. But they, nevertheless, discovered that unity was different from the uniformity. We never believed that all must be uniform but did think that all are one and how strong this unity is, has been best expressed in, सर्वं खल्विदं ब्रह्मSarvam Khalvidam Brahma” (Chandogya Upanishad), meaning, all this world is one.

Our religion and our country has the capacity to sustain the universe, the creation. Certain principles and ideals are eternal an ever-lasting and, therefore, immutable. Our religion with the force of these truthful and eternal principles has churned our best thoughts and ideas to suit changing situations and conditions. All apparent contradictions and discord have been harmonized to a great extent. If we think of one point or one thing alone many things appear conflicting. Sometimes we talk of Karma (action) and sometimes of sanyas. One one hand, we believe in Moksha and on the other in ‘all is worthless’. Sometimes, we declare धर्मस्य मूलं अर्थाम Dharmasyamulam arthah” (money is the root of Dharma). But all these apparently different and divergent views have converged into one coordinated system sometimes is unintelligible to an ordinary mind. Relying on Swami Vivekananda it can be safely said that our religion has the capacity to sustain the society and it has done so for hundreds of years. It is true that sufficient thought could not be given to what changes are warranted in the social set up over the last twelve or thirteen hundred years. Again, I would caution that there is no need to be alarmed at the word ‘change’ as changes have been effected in the society with the sanction of Dharma and philosophy from time to time. It has been said, तर्को प्रतिस्टा श्रुतियों विभिन्न रैको मुनीर यस्य वाचः प्रमाणंTarkoprathista shruthayom vibhinna, raiko munir yasya vachah pramanam”, i.e., Vedas differ, Smritis differ and words of no Muni should be treated as last word. Unfortunately, the lasting peaceful conditions which are required to this effect changes eluded us for these twelve or thirteen hundred years and some distortions and flaws crept into the system. Some surgery is undoubtedly need, but to quote Gandhiji ‘operate the diseased part but do not kill the patient;, Remove the defect but let the system work. Our society is sustaining itself for the last several centuries. We always had ageless and unchanging laws and changing provisions going hand in hand.

Now the question arises, should we accept different western ideologies as progressive, modern and better just because they are new. It would be fair to make comparative study of the two and take what is best in them. On comparison, we find that our Sanatan Dharma stands superior to western thought. It has many characteristics but in the present-day context the late Pt. Deendayal Upadhaya had said, “We stand for Integral Humanism“.

Modern Dharma

The difference in the two pictures is probably clear now. The principal feature of our धर्म,  (Dharma), as related to contemporary situation, has been termed, “Integral Humanism” by late Panditji. Sanatan Dharma more or less has the same take. It is this make which can ensure happiness and prosperity for the mankind through the ages.

A Clear Direction

Now we should also bear in mind that our way of thinking in this country is unique. The reason is that there lies fundamental difference in the basic concepts of Indian philosophy and the thoughts of non-Indian thinkers. Panditji very clearly pointed out that in the West, though has been given to various points, institutions and concepts in a compartmentalized manner. They have thought of the individual, family society and humanity as separate and non-interacting entities. When dealing with the individual, they lost sight of other organs of the society. The same applies to their thinking on family, society and humanity. This is inherent in their contemplation. They confine themselves to one organism. Let us take religion for instance. They have various faiths and sects, but one believes itself to be only right and others wrong. Now let us look at our own country. We too have numerous faiths and beliefs but here we say, “my path is right and so is yours too”. The west asserts “my religion alone leads to God”. This is the western metaphysics while Bharat says, “your religion also leads to God”. The same approach is found in socio-economic matters. They have concentrated on one entity as it has no correlation or inter-action with the other. For the sake of clearer understanding, I would add that in their system, the individual forms the center and around it are concentric circles representing family, community, nation and humanity respectively. As I have stated, this is a concentric arrangement in which individual is the center. The circles though surrounded the center, yet to have no independent existence and function and without interplay.Against this, our arrangement, which is not new but ancient, is an ever expanding spiral. It begins with the individual but goes on enlarging to family, family to society, society to nation, nation to humanity and ultimately to the universe or Srishti without ever de-linking with the center i.e, the individual.

Difference

The difference of the two systems is worthy of note. We dwelt upon the individual, family, community, society, nation and mankind. And so did they. But as I have submitted these two systems widely differ. They treated all as distinct though concentric entities with no inter-relation but we did not. So their though remained exclusive.In our system, on the other hand, one entity originates from the other and expands into the next and thus forming an infinite spiral with no inner conflicts and no tensions. Individual nowhere comes into clash with family and family with community and so on and so forth. Not only that one is not opposed to the other, we have gone a step further, we believe one is complementary to the other. I would further illustrate my point. An infant knows little about anything but himself. As he grows he recognizes his parents, his brothers, sisters and the people around him and thus develops the awareness of family, but this awareness does not negate his ‘I’. To him, ‘I’ and the family both are a reality. He grows and develops his mind and becomes capable of action. He then forms a community with people of like mind and like action and becomes indistinguishable and inseparable from his community. By and by he develops an identity with the nation and becomes one with it. And at last comes the state f Sanyas, सन्यास (renunciation) when he realizes that all humanity is one, nay, entire cosmos is one and he is not only the citizen of the world but of the universe.

So from an infact ‘I’ (aham), to the highest attainment, rather renunciation as a sanyasin – is a long journey in the realm of self-cum-social consciousness of man. As his consciousness grows, his attachment with the old (small) entity, though a reality, starts wearing and that with the new one – the bigger one – becomes stronger. The last and the ultimate, i.e., “all this universe is Brahma (God)” is reached when one discards everything material (takes to Sanyas).

No Chaos

In other words, all units or entities are realities of life. As our consciousness grows, our vision widens. As all are realities, one is not at cross purpose with the other. None can be denied and none discarded. This is like the seed, sprouting into plant, plant growing into a tree and tree blossoming and bearing fruits. The seed, the plant, the flowers and the fruit all look different. None appears to have any relation with the other. To some, it may appear that there is chaos in the nature. But is it so? Not at all. All this is the process of evolution, growth and development. There is no conflict between the seed and the tree. The tiniest and the tallest entities, though have their independent existence, together form a single integrated whole. Bharatiya way of thinking is akin to this.

Why Integrated Life

We have laid enough emphasis on individual, the smallest unit, and rightly so. We conceive of an individual so organized and integrated as is unknown to the west. There the stress is on material progress. As you know, the U.S.A is considered to be the most advanced nation and country. They have attained a high level of prosperity but is it not surprising that common people there should be deprived of happiness and contentment? Their life seems plagued with contradictions, strife, unrest highest crime incidence, suicides and things like that. There appears tremendous increase in high blood pressure, heart ailments and criminal tendencies. The country which has the capacity to buy the whole world could not buy mental peace. So we are constrained to think, “What after all is our goal?” – Happiness which is enduring and real.

Europe, in spite of limitless acquisition is groping for happiness. Christ rightly said that, even if one has the whole world and yet loses his soul he is the loser. The west has reached the moon but has lost its happiness. On the contrary, our smallest unit, the individual is more organized and integrated. He is not divided or torn. An American psychologist has said of American society, ‘our roads are full of crowds of isolated, solitary and self alienated humans’. When they are so isolated within themselves, what use they can be to the world? There is no harmony between the individual and the society. The ill lies in considering man a physical and economic being. They think that once man is given money and material, comfort, happiness and peace will follow. But this expectation is belied. This is why highest standards of living failed to bring in its wake the much sought after happiness. This flows from the defect that they always thought in isolation, in bits, so to say, and never, thought of  various facets of human nature and its needs except that man is an economic being.

Limited

We admit that man is also an economic being and there be no doubt about it. His needs of food, sleep (aahaar, nidra, bhaya, maithunam cha), fear and sex must be satisfied. But this was not enough and we did not stop here. We thought that man was something more than economic being. He is a physical, psychological, political, social, and religious being too.

आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेष: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥

(आहार, निद्रा, भय और मैथुन – ये तो इन्सान और पशु में समान है;  
इन्सान में विशेष केवल धर्म है, अर्थात् बिना धर्म के लोग पशुतुल्य है)

As I have said, his individuality has many facets. Therefore, if all aspects of human nature are not attended to in entirety, he will be deprived of the state of real happiness and contentment. In our wholesome thinking while we did not neglect man’s needs and desires and conceded that they should be satisfied, we also imposed reasonable restraints. It is not true that only Freud gave serious thought to sex. In this country, sex has been treated in all seriousness, an indispensible force. In Chapter 3, Sloka 42 of the Gita, it has been said:

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः ।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥

( इन्द्रियोंको स्थूल शरीरसे पर (श्रेष्ठ) कहते हैं; इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ मन है;
मनसे भी पर बुद्धि है और जो बुद्धिसे भी पर है वह (आत्मा) है )

… which means senses are above desires, mind is above sense, intellect above mind and soul (आत्मन, atman) is indescribable and above all. Some scholars have interpreted सः this sloka as Kama, the sexual desire. But even if this is agreed, sex has not been left unbridled and unrestrained. It has been subjected to restriction. Bhagwan Sri Krishna himself claims, “I am Kama”, but at the same time he also says, “I am Kama and Kama should be satisfied but not against Dharma”.

Life based on Dharma

Like sex we admit money has a place in life. All should be able to satisfy their material needs. One need not have to worry night and day about how to fill his belly. He should have enough leisure to devote it to literary, artistic and cultural pursuits and also to God if he so desires. Thus, while taking full cognizance of money and sex, man has been cautioned against their use beyond a reasonable limit, lest it may spell his doom and disintegrate the society. Our ancient seers were very conscious of the possible pitfalls and evolved a philosophy which incorporated some eternal laws and some universal laws. They also perceived and tested them. They did not merely search, codify or compile such laws. The sum total of the perceived laws – eternal and universal – made to prevent the individual from falling, the society from degeneration and for the highest development and progress of the individual is known as Dharma. But Dharma alone is not enough. Money and sex were not ignored. They were, however, sandwiched between Dharma on one end and Moksha (‘salvation’) on the other. Thus was evolved a quartet of Dharma, Artha, Kama and Moksha for guiding the human endeavor and enterprise. This being coordinated, organized and integrated system did not divide or split the individual but gave free choice of his life’s goals and ideals best suited to his physical, mental, intellectual and spiritual capacities and capabilities, keeping his individuality intact.

What is Integrated Humanism?

It must always be remembered that unless various ingredients of the individual and individuality are organized, an organized society remains a far cry. In fact this organized state is our starting point where from we march towards the individual, family, nation, humanity and the entire universe, i.e., all animate and inanimate creation. And this is integral humanism, we will find that it not only obviates conflict between various entities, but establishes that one emanates from the other as part of a process of development in which the smaller entity though autonomous in its area, merges into the bigger one. So far as the human society is concerned, its sequence can be from individual to family and family to nation and nation-state and then to one world state on the basis of integral humanism. In the realm of thought the highest level would be the principle of non-dualism Advait.

Goals of Integral Humanism

The world state or government as conceived under integral humanism will be quite different from the once conceived by the communists. Their world will be mono-centric and monolithic, while ours will be multi-centric and multilithic. The communist system will be sustained by regimented thinking and will display uniformity, but in our world system no such uniformity is foreseen. Every nation will be free to develop according to its own genius. Every nation will consider itself an organ of the body – the world government – in the same way as an individual subordinates himself of his own free will his entire acquisitions and achievements to the society at large. We will be one with the whole mankind and whatever material progress we attain through our best efforts, its ripe and sweet fruits will be offered at the feet of the Humanity. This is how a nation while remaining free and sovereign, will progress and will be bound with others by good-will and cooperation, flowing from its commitment to the spirit of universality. A world government on this model will be after Pt. Deendayalji’s dream of Integral Humanism, followed by non-dualism Advait, in the world of thought which is logical consequence. In the end, I would reassure that if we hold fast to the thoughts and ideals, propounded by him, we should be able to dispel the confusion in the midst of which the present generation finds itself confounded.

(Translation of a Speech by Shri Dattopant Bapurao Thengadi, organised by Deendayal Upadhyaya Smarak Siksha Samiti at Kanpur in February, 1970).

(Courtesy: Deendayal Upadhyaya’s Integral Humanism: documents, interpretations, comparisons, New Delhi: Deendayal Research Institute, 1992, Integral Humanism – A Study, pg:70-84, Edited by Sri.Devendra Swarup). 

(Courtesy: Sri.Raghunandan, Dakshina Madhya Kshetriya Samyojak, Pragnya Pravah).

For further reading, please refer the link : Deendayal Upadhyaya – The Seer of Integral Humanism

A Tapasvi dies. Unnoticed

Tuesday, 30 September 2008

This article is about Shri Dattopant Thengadi, tireless intellectual – activist – founder of the BMS written by Shri Gurumurthy.

A Tapasvi dies. Unnoticed
31-10-2004

He built the largest trade union in India, the Bharatiya Mazdoor Sangh. Formed in 1955 it over took INTUC, the largest trade union, in just three decades. In 1989, strength of BMS was 31 lacs plus. That was more than the combined strength of CITU and AITUC, the monopolists of trade union movement. Today its membership is over 83 lacs, more than the collective of most other trade unions. Yes, he built the most powerful trade union. Yet, he was not a communist. He actually opposed the communists, stormed their citadel and captured it. Never a Socialist, but, he defeated them in their own territory. He waged an open war, an ideological war, against them, and defeated them in a straight war, not in guerrilla warfare. Also he never used his strength, never called for a bandh, the normal weapon of large trade unions, and never brought any city to stand still. His unions never indulged in violence. He never made his unions the wing of any political party.

Though a trade union leader, he was not an urbanite like most trade unionists. He also built the largest union of agriculturists in India, the Bharatiya Kisan Sangh. Still he was not a village versus town man, or agriculture versus industry man. For him nationalism was the melting pot of all sectional views and interests. He never believed in the distinction between classes, between the rich and the poor, but, actually stood for collective national interests. Thus he carried nationalism to territories monopolised by class hatred and class war and rendered class idea almost irrelevant. When globalisation challenged India in early nineties and every one helplessly just opposed it or blindly welcomed it, he recalled the spirit of the freedom movement, the Swadeshi idea. He formed the Swadeshi Jagaran Manch [SJM] which articulated an alternative indigenous economic model, not just opposition to globalisation. It emerged as the bulwark against mindless globalisation and succeeded in creating a vision for India as a global power. His creations, the BMS, the Kisan Sangh, and the SJM, are known and powerful in thought and action, but he, the creator himself, is not known.

Who is he? Dattopant Thengadi, unknown to most, founded institutions known and powerful but himself not known. He passed away at 84, with energies that one would see in a man of 48. He was of course a resounding success as a trade unionist. But this does not exhaust Thengadi. He was more. He was an astounding intellectual with remarkable grasp of history and economics, sociology and politics. Yet he rarely appeared in public or even rarely allowed himself to be photographed or interviewed by mass media. In his view nation builders do better things than stand before cameras. Yet he was in politics, in the Rajya Sabha for two terms. But that did not make any difference to his definition of himself. He was an activist, who did what was doable in ten lives in one. Yet massive activity did not interfere with his contemplative genius. He found time amid chaotic activity to think, read and write. He authored innumerable books of originality and high intellectual content — some 50 books in all, 27 in Hindi, 12 in English and 10 in Marathi. He has presented innumerable papers on profound subjects in national and international conferences. He learnt five languages apart from Marathi and English. He founded, inspired, managed and advised over a hundred organisations! And found time for all activities, yet time to talk and chit chat with thousands of ordinary workers! He could discover the 25th hour in the day and the thirteenth month in the year.

What inspired him to such unbelievable mental, physical and intellectual activity beyond all known reserves of human energy? What drove him to attempt and accomplish the un-attempted impossible? The RSS. The much misunderstood and much maligned open air university that trains patriots of high commitment in this country even today. He became the full time pracharak of the RSS at the age of 22 and continued to work full time till he breathed his last. No office attracted him. He could have occupied any position in public life. But for people like him positions added nothing.

He was a dhrista, a seer. Decades before, he saw and theorised the collapse of communism as, he perceived, it went against human nature. It has happened. He has also theorised that capitalism too will collapse as that too is against human spirit and nature. This is waiting to happen. Even in philosophising the resistance to globalisation he foresaw national spirit as the greatest defence against global forces. He unveiled the hidden element of globalisation as the competition between nations. Result, not just in India but, all over the world today the real resistance to globalisation comes from perceived national interest, that is, Swadeshi at individual national level.

Thengadi was understudy of Babasaheb Ambedkar. ‘Gurumurthy, I do not agree with what Arun Shourie’s conclusions on Babasaheb Ambedkar’, he once told me. I pointed out to him that Arun’s book was fully completely documented. He asked me ‘do you mean to say that the lives of people who had had to face the greatest of challenges can be captured in records and documents?’ He added that the complex times and the challenges that ‘Baba’ – this is how he called Babasaheb Ambedkar – faced could not be read from records. ‘In fact most of the recordings cosmetise the real facts, more bluntly, they conceal, not bring out, the truth. So records cannot present the challenging life of Babasaheb Ambedkar’. Tengadi could talk with authority about Babasaheb Ambedkar because he was full time with Ambedkar in the last four years of Babasaheb’s life.

What Thengadi told me further was stunning. He said ‘I was eye witness to Babasaheb’s tensions and problems’. He recalled ‘Babasaheb wanted the Hindu sants and religious heads to declare openly that untouchability did not have the sanction of Hindu religious scripts’. RSS efforts in this direction were not bearing fruit. But Babasaheb told Thengadi that time was running out. His health was deteriorating fast in 1954. Baba Saheb told Thengadi that ‘I have faith in the process of the RSS in removing untouchability. But that is too slow. I cannot wait because I will not live to see the end of the problem’. Thengadi also recalled what made Babasaheb embrace Buddhism, in Babasaheb’s own words thus: ‘if I did not show the way for this helpless community they would be hunted down by Christian church and the communists”. What Babasaheb wanted the Hindu religious leaders to do in 1954, RSS could persuade them to do only a decade later, in 1965, in a conference of Hindu religious leaders in Udipi organised by the Vishwa Hindu Parishad. This made many, me included, insist that Thengadi wrote on his days with Babasaheb. A couple of months before Thengadi died he did this too, and his book on Babasaheb Ambedkar was also released.

He owned nothing, not a house or a car, no cell phone or else. He lived in a small room in Delhi provided by the BMS and in other’s houses elsewhere. His needs, a few kurtas and dhotis, were accommodated in a suit case. He travelled in over night buses and mostly second class in trains. Never thought of marriage as his time was exhausted by the cause he had taken up in life. A rishi, a tapasvi, he was. Like most tapasvis, he is also little known. National newspapers which waste thousands of tons of newsprint on what retired or topless cine stars do in the morning and evening never even reported on this great man’s work, much less on his greatness. Having seen him closely and known him intimately and learnt from him immensely, the only thing I could do is to let a few others know that a tapasvi died on October 14, 2004 unnoticed by the media.

source: www.gurumurthy.net

Bio-Sketch on Dattopant ji in Hindi