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Malikappuram: Another divine movie from South based on Sabarimala

Author: Viswaraj

Malikappuram – a Malayalam movie based on Sabarimala, starring Unni Mukundan hit the screens on 30 December 2022.

As per “Bhootanatha Upakhyanam”, a hindu epic that tells us the story of Lord Ayyappa, Malikapurathamma is none other than Lalita Tripurasundari Devi herself.  

The Goddess who is described as “Manja Mata” in the book, was consecrated next to Shri Bhutanathan (Ayyappan) by an acharya from Salapura. This divine act was witnessed by Rishi Agastya and Maharshi Parashu Ram, as mentioned in the 15th chapter of the same book.

The movie Malikappuram portrays the innocent yet true devotion of a young kid for her beloved God Ayyappa.

Malikapurathamma who is considered and worshipped with equal importance and devotion as Ayyappa Swamy, leaves us with a ray of hope that the Malayalam film industry is slowly but surely coming out of the eclipse that had affected and subdued them for long now.

Big salute and thanks to the honesty and uprightness of a single man, Unni Mukundan who always stood for what he felt as right. The theme of the film is a mesmerising one and nobody should forget that lakhs and lakhs of devotees of Lord Ayyappa came to streets to extend their support and defend the traditions of Lord Ayyappa when the same was challenged by the ruling Kerala Govt.

Do catch the magical moments and glimpses of Sabarimala on the big screen. This wonderful movie by Unni Mukundan may turn out to another Kanthaara from the south.

वीर गुरुपुत्रों के बलिदान और मुगलिया दहशतगर्दी

Author : Narendra Sehgal 

क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की मजहबी दरिंदगी और दहशतगर्दी को खुली चेतावनी देने वाले श्रीगुरु पुत्रों के महान बलिदान का संबंध किसी एक क्षेत्र, प्रांत, कौम और साम्प्रदाय के साथ नहीं है। यह बलिदान भारतराष्ट्र की वीरव्रती सनातन धरोहर की एक सशस्त्र कड़ी है। उल्लेखनीय है कि दशमेश पिता श्रीगुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज द्वारा सृजित ‘खालसा पंथ’ ने औरंगजेब की आततायी मानसिकता और उसकी गैरइंसानी हरकतों को सदैव के लिए दफन कर दिया था।

त्याग और शौर्य की अनूठी मिसाल श्रीगुरु पुत्रों के बलिदान की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “न भूतो न भविष्ति” कह कर अपनी श्रद्धांजलि दी है। वास्तव में चारों साहिबजादों के बलिदान वीर अभिमन्यु, प्रह्लाद, ध्रुव, नचिकेता एवं भरत जैसे वीर भारतीय पुत्रों की विरासत को जीवित रखने का महान उपकर्म है।

श्रीगुरु पुत्रों ने अपने बलिदानों से सारे भारत राष्ट्र के स्वाभिमान को पुनः जीवित कर दिया। अतः इस ‘वीर बाल दिवस’ पर सभी भारतवासियों को जाति, बिरादरी, कौम, प्रांत, और भाषा की संकीर्णता को छोड़कर एक राष्ट्रपुरुष होने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए और उन लोगों के नापाक इरादों को चुनौती देनी चाहिए जो भारत रक्षक खालसा पंथ और इसके बलिदानों पर अलगाववाद का रंग चढ़ाते हैं।

अपनी आत्मकथा बचित्र नाटक में श्रीगुरु गोबिन्द सिंह जी ने कहा है- “सकल जगत में खालसा पंथ गाजे, जागे धर्म हिन्दू तुर्क द्वंद भाजै” अपने इस ध्येय वाक्य को इस महान संत योद्धा ने अपने समस्त परिवार की आहुति देकर साकार कर दिया। आज देश और विदेश में ‘वीर बाल दिवस’ मनाकर समस्त धर्म एवं मानवता प्रेमी गुरुपुत्रों के महान बलिदान को श्रद्धापूर्वक नमन कर रहे हैं।

अनादि कल से आज तक विश्व के इतिहास में एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता जब किसी योद्धा ने युद्ध के मैदान में अपना समस्त परिवार ही कुर्बान कर दिया हो। हमारे धर्मरक्षक खालसा पंथ की सृजना करने वाले दशमेश पिता श्रीगुरु गोबिन्द सिंह जी महाराज ने भारतीय संस्कृति, धर्म और स्वतंत्रता के लिए अपने पिता, चारों पुत्रों और अपनी माता को भी राष्ट्र की बलिवेदी पर बलिदान देने की न केवल प्रेरणा दी अपितु अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए देखा भी।

खालसा पंथ की सृजना के समय श्रीगुरु गोबिन्द सिंह ने अपने पांचों सिंघ शिष्यों से प्रतिज्ञा की थी- “आपने मुझे अपना सर दिया है मैं आपको अपना सरवंश दूंगा” जब एक गुरु सिंघ भाई दयासिंह ने कहा- “सच्चे पातशाह हमने तो अपने शीश देकर अमृतपान किया है। आप खालसा को क्या भेंट करोगे?” तुरंत दशमेश पिता ने उत्तर दिया- “मैं अपने सभी सुत खालसा (धर्मरक्षकों) की भेंट चढ़ाऊँगा। मैं स्वयं भी अपने सिंघों के बीच उपस्थित रहूँगा।“ इतिहास साक्षी है कि दशमेश पिता ने अपनी घोषणा अथवा प्रतिज्ञा को अक्षरश: निभाया।

यहाँ हम दशमेश पिता के चारों पुत्रों के महान बलिदान का संक्षिप्त वर्णन ही करेंगे। साहिबजादा अजीत सिंह (18 वर्ष), साहिबजादा जुझार सिंह (16 वर्ष), जोरावर सिंह (8 वर्ष) और साहिबजादा फतेह सिंह (6 वर्ष) इन चारों पुत्रों को श्रीगुरु ने अपनी देखरेख में शस्त्र विद्या एवं आध्यात्मिक शिक्षा प्रदान की। देश और धर्म की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व त्याग करने के संस्कारों से ओतप्रोत थे चारों वीर पुत्र।

दशमेश पिता ने अपने मात्र 42 वर्ष के जीवन काल में मुगलों की दहशतगर्दी के विरुद्ध अनेकों युद्ध लड़े। परंतु ‘चमकौर की गढ़ी’ नामक स्थान पर लड़ा गया भयंकर युद्ध अपना विशेष महत्व रखता है। इस युद्ध में मात्र 40 सिख योद्धाओं ने हजारों मुगल सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे। श्रीगुरु और उनके सिख सैनिकों ने किले के अंदर से तीरों की बौछार करके सैंकड़ों मुगल सैनिकों को यमलोक पहुंचा दिया। अंत में श्रीगुरु ने अपने बड़े पुत्र बाबा अजीत सिंह को मात्र पांच सिख सैनिकों के साथ किले के बाहर जाकर युद्ध करने का आदेश दिया।

इस मात्र 18 वर्षीय तरुण योद्धा ने शत्रुओं के घेरे को तोड़ा और शत्रुओं के बीच में जाकर अपनी तलवार के भीषण वारों से सैंकड़ों मुगलों को काट डाला। महाभारत के युद्ध में 18 वर्षीय अभिमन्यु ने भी इसी तरह हजारों कौरव सैनिकों की घेराबंदी को तोड़कर चक्रव्यूह को भेद डाला था। इसी वीरव्रती इतिहास को बाबा अजीत सिंह ने चमकौर के युद्ध में दोहरा दिया था।

बाबा अजीत सिंह के बलिदान के बाद श्रीगुरु ने अपने दूसरे पुत्र 16 वर्षीय बाबा जुझार सिंह को युद्ध के मैदान में जाने का आदेश दिया। इस तरुण योद्धा ने भी अपनी तलवार के जौहर दिखाए और शत्रु सेना के बहुत बड़े हिस्से को यमलोक का रास्ता दिखा दिया। इस तरह दोनों वीर पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए। धन्य है ऐसा महान पिता जिसने अपने कलेजे के दोनों दुकड़ों को धर्म हेतु बलिदान कर दिया।

इस युद्ध के पश्चात श्रीगुरु का सारा परिवार बिखर गया। इनके दोनों छोटे बेटों को इनकी दादी गुरुमाता गुजरी जी सुरक्षित लेकर एक गाँव में पहुंची। इस समय दोनों बेटों जोरावर सिंह और फतेह सिंह 8 वर्ष और 6 वर्ष के थे। इस गाँव में गुरु परिवार का एक भक्त गंगू रहता था। इस गुरुभक्त ने पहले तो गुरु माता के सोने के जेवर और सिक्के चुराए और फिर शहर के कोतवाल को गुरुपुत्रों और माता की जानकारी दे दी। सरहिन्द के नवाब बजीर खान ने इन तीनों को गिरफ्तार करके एक अति ठंडे बुर्ज में कैद कर दिया। इस परिस्तिथि की गंभीरता को भांप कर गुरुमाता दादी ने दोनों बच्चों को अपने धर्म पर अड़िग रहने की शिक्षा दी।

अगले दिन प्रातः नवाब बजीर खान ने दोनों बच्चों को दरबार में आने का आदेश दिया। दरबार का दरवाजा इतना छोटा था कि आने वालों को झुक कर अंदर जाना पड़ता था। इन दोनों वीरपुत्रों ने झुकने के बजाए पहले अपने पांव दरवाजे के अंदर किए और फिर भीतर गए। नवाब को सलाम तक नहीं किया। “बोले सो निहाल-सतश्री अकाल” से दरबार की दीवारों को हिला दिया।

इन्हें जब इस्लाम कबूल करने के लिए कहा गया तो दोनों ने गरजते हुए कहा- “हम दशमेश पिता कलगीधर गुरु गोबिन्द सिंह के पुत्र हैं और धर्म और मानवता के लिए शहीद होने वाले श्रीगुरु तेग बहादुर के पौत्र हैं। हम अपने प्राण दे देंगे, परंतु धर्म नहीं छोड़ेंगे।“

इन दोनों वीर पुत्रों को जिंदा ही दीवारों में चिन देने का आदेश दिया गया। दोनों वीर पुत्रों ने ऊंची आवाज में उद्घोष किया- “वाहिगुरु जी का खालसा, वाहिगुरु जी की फतेह” जैसे-जैसे दीवार ऊंची होती चली गई, दोनों बालक उद्घोष करते रहे। स्वधर्म, मानवता और स्वतंत्रता के लिए शहीद हुए गुरुपुत्रों ने बलिदान का अनूठा इतिहास रच डाला।

उधर जब इन दोनों वीरपुत्रों के इस तरह बेदर्दी से शहीद कर दिए जाने का समाचार दादी माता गुजरी ने सुना तो उन्होंने भी प्राण त्याग दिए। हिन्दू राजा टोडरमल ने लाखों स्वर्ण मुद्राएं देकर कुछ भूमि खरीदी और दोनों वीर पुत्रों के अंतिम संस्कार की व्यवस्था की। इस स्थान पर ही गुरुद्वारा ज्योतिस्वरूप मौजूद हैं। गुरु पुत्रों के शहीदी स्थान पर गुरुद्वारा फतेह सिंह है। इस तरह एक पूरा परिवार स्वधर्म और स्वतंत्रता के लिए शहीद हो गया।

शत्- शत् प्रणाम।

नरेंद्र सहगल

वरिष्ठ पत्रकार व लेखक

The role of Swayamsevaks in Ending Portugese Rule

Just because the Britishers left India, it didn’t mean our fight for Independence was over. On 2nd August 1954, about 100 Sangh Swayamsevaks attacked the remaining Portugese bases in Dadra Nagar and Haveli. This attack was led by Pune Sanghchalak Shri Vinayak Rao Apte. There were a lot of prominent Sangh members in this attack. Adopting guerella tactics, they first attacked the Main police station in Selvesa and made all the 175 soldiers present there surrender unconditionally and hoisted the Tri-colored National Flag atop. On the same day, they handed over the region to the Central Government. In recognition of that historical day, the people of Selvesa invited the 100 brave fighters to celebrate the 25th anniversary of that day on 02nd August, 1979 and honored them. They were recognised as freedom fighters by the Maharashtra government in 1987.

The Portugese still had control over Goa during that time. For the first time in 1955, the first person to hoist the tri-colored National Flag atop the Panaji Municipal building was a teacher from Goa and a swayamsevak. Depite Goa getting freed in 1961, he was still in Lisbon jail for another 17 years. In 1955, in the united fight for freedom of Goa, organised by all the political parties, it was the swayamsevaks, who took the primary responsibility. The Swayamsevaks took it upon their shoulders to ensure food for all the Satyagrahis camped at the borders of Goa. The various Satyagraha groups were led by the prominent leaders from the Sangh and Jansangh. A lot of them took bullets and suffered various atrocities in Portugese jails.

One of the prominent swayamsevaks, who led the Satyagraha groups, was the leader from Ujjain, leading the Madhya Bharat Satyagraha group, Shri Rajabhavu Mahankal. The Portugese were ready to welcome these Satyagrahis with Guns and Bullets on the borders of Goa. As Bhavuji was about to cross the border, the first three lines were shot at by the Portugese and were injured and fellow down. In the third line was brave Sahodaridevi, who also fell. Seeing her fall, Bhavuji took the tri-colored National Flag and charged at the Portugese shouting Bharat Mata ki Jai. A bullet ripped through his neck during his charge and he fell to the Ground. In the few seconds that he was still conscious, he instructed others to take care of the National Flag and the injured amongst them. And after a few minutes, he joined all those bravehearts, who sacrificed their lives for freedom of their motherland.

Excerpts from R.S.S. – Akruthi Dalchina Adarsham.

Diwali celebration in Punjab and fake narrative of “Bandi Chhor Diwas”

Tweet thread by : Puneet Sahani

There was nothing like #BandiChorrDivas. You engineered it to further divide Hindu & Sikhs for your cynical politics —not caring damn about what’ll be the spiritual costs of weaning Sikhs from their roots and larger culture and festivities. Here’s a thread, Hallelujah!

Here’s handwritten letter by Guru Tegh Bahadur, asking the congregation of Pak Pattan to visit him for DIWALI! He was the son of Guru Hargobind. So you know, but 9th Guru didn’t, that there was some Bandi Chorr Divas regarding his father. Really?!

Then here’s letter by Guru Hargobind’s grandson, Guru Gobind Singh Ji himself. Dated 5 Oct 1699, or AFTER formation of Khalsa. He too is asking congregation of Naushera Pannuan to visit him for DIWALI

🪔

. NOT some #BandiChorrDivas. You know better than Dashmesh Pita, again?

Then here’s youngest consort of Guru Gobind Singh & “Mother of Khalsa”, Mata Sahib Devi, guiding celebration in HariMandir 2 decades after Guru’s death. Clearly our 2 biggest festivals were Baisakhi, DIWALI. PS: interesting, man as imp as incharge of Treasury, managing Gaushala!

Then here’s Guru Gobind Singh’s oldest closest disciple, Bhai Mani Singh, who in his 90s was mμrdered in manner so gruesome that we remember him daily (बंद बंद कटवाए) He suffered the fate for he wanted to celebrate Diwali in HariMandir when it was still so precarious in Punjab..

Then here’s when Ahmad Shah #Abdali had completely blown up & desecrated HarMandir. While reconstruction was still not over & there was danger of further attacks, Diwali was so imp to Sikhs that large number still gathered at Amritsar (then Ramdaspur). Attack did come year later.

I can go further back or ahead in history to find many more examples but I think I’ve more than made my case. Please stop misleading people who innocently trust you. Be TRUTHFUL. Man needs his roots reach deep for him to fly high in sky. May your darkness lessen this Diwali

To #Sikhs who still insist our Ram isn’t son of Dashratha – here #GuruGobindSingh’s BEAUTIFUL Bhakti composition on Sri Rama’s return to Ayodhya in exquisite Awadhi-Persian patois. Verify on P226 DasamGranth https://sridasam.org/0226.html Makes our most attractive heritage. Why disown?

Social Media modus operandi of commie cabal

3 attempts in 3 hours by NDTV. Hope they get it right in the 4th.

First 2 tweets deleted after achieving the goal.

Alleged News Channel deliberately misquotes him. Usual suspects pick it up and circulate widely. Channel silently deletes the tweets. Job done. Perfectly executed.

NDTV deleted this cropped video but the propaganda goes on using the same.

4th and final attempt it seems.

Thread By: Darshan Pathak