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RSS Swayamsevak Helped De-Tangle 80 Ft Congress Tricolour Flag ..But then …

During the flag-raising ceremony at the Congress Faizpur session of 1937 , the Congress tricolor was stuck midway on a mast eighty feet high.

Many tried unsuccessfully to de-tangle the flag, after which a representative Sri Kishan Singh Pardesi courageously climbed up the mast-pole and freed the fabric.  Loud cheers rang out for as the flag fluttered atop the mast.  The Congress session also accepted a proposal to felicitate Pardesi.  But no sooner had he revealed that he had mustered courage because of the nationalist spirit of the RSS, the Congressmen developed cold feet.  How could they felicitate any Swayamsevak of the Sangh ? The Congress’ discriminatory attitude against Hindutva-oriented organizations came to the fore.

Dr. Hedgewar’s joy knew no bounds when he heard about this contribution of a swayamsevak.  He departed from the Sangh’s tradition of eschewing publicity and called Kishan Singh Pardesi to the Devpur Shakha, and publicly felicitated him.  Presenting a small goblet of Chanda as a token to him, Dr. Hedgewar said,

“It is a swayamsevak’s natural duty to stake his very life if necessary, to remove any obstacle to the nation’s work.  This is our national dharma”.

While on one hand Dr Hedgewar driven by the spirit of anti-imperialism demonstrated his affection towards the Congress, the latter harboured hatred for the Sangh.  Dr. Kakasaheb Tembhe, a Congressman who sympathized with the Sangh, was perturbed by this.  He wrote to Hedgewar, requesting the latter to criticize the Congress’ style of functioning and ideological orientation.  Tembhe believed that this would pacify the growing discontent among the Sangh’s swayamsevaks.

Dr.Hedgewar Dr. Hedgewar’s reply to Tembhe reveals not only his own evaluation of the Congress organization, but also his philosophical side.  Hedgewar did not wish to allow any disaffection towards the Congress in the minds of swayamsevaks.  To him, there were only two options.  The RSS would have to rapidly enhance its own strength as to be able to evict the British from India through a revolution; else, the anti-imperialist struggle would have to continue under the aegis of the Congress.  Hedgewar did not wish to create multiple centres of the anti-imperialist struggle.  It was this line of reasoning that prompted him to reply to Tembhe thus,

“Each individual in this world behaves and talks according to this nature.  It is not mandatory to regard him as representing any party or ideology.  In my opinion, it is erroneous to praise or condemn any party or its ideology owing to the utterances of any member who is supposed to represent it.  A true gentleman of lofty character belonging to any political party does not wish ill of any other party”.

Source : “Builders of Modern India” – Dr.Keshav Baliram Hedgewar by Publications Division;

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संघ विचार के महान भाष्यकार श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी – डॉ. श्रीपति शास्त्री

संघ विचार के महान भाष्यकार श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी

डॉ. श्रीपति शास्त्री

श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी से सम्बन्ध सिर्फ संघ के सम्बन्ध में ही मेरा ज्यादा है, अपवादात्मक रुप से कई बार उनसे मिलने के लिये गया हूँ। दत्तोपंत जी का जीवन देखकर, उनके चाल-चलन, रहन-सहन, बोलने का ढ़ंग, ये सारा और इसका अनुभव लेकर, प्रश्नों के संबंध में उत्तर देने का उनका जो अद्भुत बौद्धिक सामर्थ्य था, उससे  प्रभावित होकर, संघ में जो अनेक कार्यकर्ता, अपने सम्भ्रम को त्यागकर, जो संघ कार्य में रत हुये, जिनके कारण से जो हजारों कार्यकर्ता खड़े हुये, उसमें से मैं भी एक साधारण स्वयंसेवक हूँ। संघ प्रारम्भ तो हुआ पच्चीस (25) में, सारी जो पहली पीढ़ी थी संघ की, वह तो, जो प्राथमिक संकल्पना  है, यह एक देश है, एक राष्ट्र है, और वह हिन्दू राष्ट्र है। इस बात को समाज में बिठाने के लिए एक पीढ़ी चली गई। वैचारिक दृष्टी से उस समय हिन्दू शब्द के साथ ही एलर्जी, स्वातन्त्र्य संग्राम चल रहा था, उसके जो आशय है तात्विक उससे कुछ भिन्न और हिन्दू समाज की  विचित्र परिस्थिति है, यह  संगठित होने वाला समाज है क्या? इन सारी बातों के बीच में संघ की बात को वहाँ पर बिठाना  एक पीढ़ी का काम हो गया। बाद में जैसे-जैसे समय बदलता गया, अनेक प्रकार के प्रश्न खड़े होते चले, जो प्रारम्भिक काल में नहीं थे और केवल समय नहीं था इतना ही नहीं तो उसको दूर रखा गया था। डॉ. हेडगेवार को कई प्रश्न पूछते तो वो कहते थे मुझे क्या मालूम उनसे पूछो, वो इतिहासकारों से पूछो, तत्व-ज्ञानी से पूछो वह टालते थे, उत्तर नहीं देते थे। हिन्दू शब्द को डिफाईन करने से भी उन्होंने इंकार किया जो अत्यन्त प्राथमिक बात है। क्योंकि वह जानबूझकर किया था वैसा।

लेकिन जैसे-जैसे दिन चले, काम का विस्तार होता चला गया। परिस्थितियों में बदलाव आया, इसलिए अनेक प्रकार के जो प्रश्न, खड़े होते गये, इन प्रश्नों को शास्त्रीय ढ़ंग से, संघ की अत्यन्त बुनियादी बातों से सुसंगत, अत्यन्त वैज्ञानिक दृष्टि से सम्मत ऐसी उसकी व्याख्या करना, उसको प्रस्तूत करना, दुनिया के सामने प्रस्तूत करना, समर्थ भाषा में प्रस्तूत करना, ऐसे एक महान भाष्यकार थे, श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी। (the greatest commentator of Sangh Ideological dimensions) “द ग्रेटेस्ट कॉमेन्टेटर ओफ संघ आयडियोलोजिकल डायमेन्सनस्”, संघ के सारे विचार-विश्व को विकसित करना, विकसित हुए आयाम का विश्षलेण करना और सबके सामने उसको प्रस्तुत कर, उसको सर्व-स्वीकार्य बनाना। यह जो कई लोगों ने काम किया, बड़े महत्व का काम, बड़ा बुनियादी काम, इसमें दत्तोपंत जी का बहुत बड़ा स्थान है। मेरा खुद का एक अनुभव है। मैंने पूछा कि भाषण में वो कई बार बोलते थे, संघ अलग, समाज अलग ऐसा नहीं होना चाहिये और संघ समाज एक ही है। ऐसा कुछ बोलते थे। बोलने में सुनने में तो ठीक ही लगता था, लेकिन इसका व्यावहारिक अर्थ क्या है? तो उनका जो उत्तर देने का जो ढ़ंग था, “नहीं ऐसा नहीं, कल का इतिहासकार अगर लिखता है, संघ के बारे में, टुमारोज हिस्टोरियन, की ऐसा एक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम का संगठन था उसने हिन्दू समाज के उपर जितनी-जितनी आपत्तियां थी, उसको दूर करने के लिए बहुत बड़ा परिश्रम किया “एण्ड संघ डिफेन्डेड हिन्दू सोसाइटी, प्रोटेक्टेड हिन्दू सोसाइटी” ऐसा यदि लिखने की नोबत आ जाये तो हमारे लिये यह हमारे विचार का पराभव हो गया। और  कल का इतिहासकार ऐसा लिखता है कि हिन्दू समाज में ऐसे प्रश्न तैयार हो गये, ऐसी-ऐसी समस्याएं, चुनौतियां खड़ी हो गयी, और उनसे निपटने के लिये हिन्दू समाज के अन्तर्गत विचार हुआ, औ हिन्दू समाज के विचारवान्-विवेकवान् लोगों ने अपनी बुद्धी लगायी और उन्होंने अपने सामर्थ्य से इसके उत्तर को ढूंढ़ निकाला और हिन्दू समाज स्व-संरक्षण-क्षम बना । हिन्दू समाज ने अपनी समस्याओं को स्वयं हल किया, ऐसा अगर इतिहासकार ने लिखा तो संघ के विचार की विजय होगी, नहीं तो संघ ने प्रोटेक्ट किया ऐसा हो गया, ऐसा नहीं आना चाहिये इसलिये हमारा जो संघ का जो एचीवमेंट है उसका रिकार्ड मत मेन्टेन करो, बैंक खाते में सारा रिकार्ड हिन्दू सोसाइटी के क्रेडिट पर करना, “ओल दी अचीवमेंट ओफ संघ सुड बी क्रेडिटेड इन दी नेम ओफ हिन्दू सोसाइटी” ऐसे इसको रखना चाहिये। और इसके योग्य शब्द वे गढ़ते चले, संघ और समाज समव्याप्त है, संघ और समाज ‘को-एक्सटेन्सिव’।

नये-नये संगठन, नये-नये आन्दोलन जो कभी-कभी प्रारम्भ किये गये, होते चले गये  और अभी भी हो रहे है, उसको उन्होंने, यह नई बात आ गई है, ऐसा नहीं बोलते थे। कहते थे यह पहले से संघ विचार में है, डॉ. साहब के समय का एकाध उदाहरण भी देकर, कलकत्ता में जब गड़बड़ हो गई तब डॉ. हेडगेवार ने क्या-क्या किया था उसका उदाहरण देकर, यह प्रारम्भिक काल से निहित संघ विचार है। उसको उन्होने एक नया शब्द भी दिया ‘प्रोग्रेसिव अनफोल्डमेंट ओफ संघ आयडियोलोजी” ऐसा उन्होंने एक शब्द प्रयोग किया। ऐसे वैचारिक दृष्टी से एक संकल्पना के साथ उसको शुरु करना इतना ही नहीं तो सबको समझ में आ सके ऐसे शब्दों में रखकर, संघ के विचार की जो पूञ्जी है, उसको समृद्ध बनाने वाले ऐक बहुत बड़े भाष्यकार श्रीमान दत्तोपंत जी ठेंगड़ी हमारे बीच में, अपनी आंखों के सामने ही जीवन जीकर, वो चले गये। इसलिए संघ की वैचारिक भूमिका का जब हम विश्लेषण करने बैठते है, तो कौनसा  भी विषय लो, वहाँ पर दत्तोपंत जी का प्रवास आता है। वो आते है, उनका क्या कहना था, बोलने के लिए आते है।

कैसे-कैसे प्रश्न आते चले गये ? परिस्थिति जैसे बदलती चली गई, नये-नये प्रश्न आते गये। नये-नये प्रश्न जो संघ के लोगों को भी शायद हजम नहीं हो ऐसे है। दत्तोपंत जी ने एक घटना बतायी थी, 1960 की बात है, 1960 में अपने देश में गृहमंत्री श्री गुलजारी लाल नन्दा थे, उस समय एक बहुत बड़ा स्ट्राइक हो गया, वामपंथी लोगों से प्रेरित स्टम्प ऐसे होते थे वो बहुत बड़ा स्ट्राइक हो गया और स्ट्राइक होने के बाद नुकसान इत्यादि होते है वो हो गया, इसलिए नन्दा जी बहुत नाराज हो गये और  उन्होंने एक डिक्लेयर किया कि एक नया बिल लायेंगे, जिसमें यह स्टम्प करने का माने स्ट्राइक करने का यह जो राइट है, इसको हम ले लेंगे। समस्या समाधान के लिये नया मेकेनिज्म ढूंढेंगे। राइट टू स्ट्राइक यह नहीं रहना चाहिये ऐसा उनका स्टेटमेंट था उस समय। यह स्टेटमेंट आने के बाद 60-61 की बात होगी उस समय एक दो दिन नागपुर में होने के कारण श्रीगुरुजी से मुलाकात हो गई, गुरुजी ने दत्तोपंत जी को पूछा कि यह जो नन्दा जी का स्टेटमेंट है, इसके बारे में बी.एम.एस. की क्या भूमिका है? तुम्हारा क्या स्टैण्ड है? दत्तोपंत जी ने कहा हमारा स्टैण्ड तो कुछ नहीं है, गुरुजी ने पूछा की वृतपत्र में तुमने तुम्हारा स्टैण्ड विस्तृत नहीं किया ? दत्तोपंत जी ने कहा कि हमको कौन पूछेगा हम इतने छोटे है, कि नगण्य है, इसलिये हम दें तो क्या, नहीं दें तो क्या ? दें तो छापें भी नहीं पेपर वाले हमको, हम इतने छोटे है, ऐसा दत्तोपंत जी ने कहा। गुरुजी ने कहा कि वे छापे या न छापे कम से कम अपने पत्र तो छापेंगे, अपनी जो साप्ताहिक है वह तो जरुर छापेंगे, शायद हेडलाईन में भी छापे लेकिन तुम्हारी भूमिका क्या है, यह तो स्पष्ट होनी चाहिये, स्वयंसेवकों को समझना चाहिये, तुम्हारे विचार की दिशा तो समझनी चाहिये, दत्तोपंत जी ने कहा कि मैंने तो ऐसा सोचा ही नहीं। गुरुजी ने कहा कि शाखा होने के बाद शाम को फिर मिलेंगे। शाम को चाय के समय मिले, गुरुजी ने पूछा क्या तुम्हारा स्टेटमेंट तैयार हो गया? इन्होंने कहा नहीं, शब्द सूझते नहीं है, क्या कहना। गुरुजी ने कहा अच्छा पेपर और पेन लाओ और गुरुजी ने डिटेक्ट किया उनका जो स्टेटमेंट है बी.एम.एस. का, स्ट्राइक के बारे में, वो उन्होंने डिक्टेट किया, और दत्तोपंत जी ने वो लिख लिया, लिखने के बाद पेपर में भेजा, वो छपकर भी आ गया बी.एम.एस का स्टेण्ड क्या है? वो छपकर आ गया सारा, अर्थात् दत्तोपंत जी के नाम से आ गया, वो ही उसके प्रमुख थे, बाकि लोगों को कुछ मालूम नहीं है। बाद में जो बैठक हुई उस बैठक में अपने ही, अनेक संघ के जो प्रमुख थे, जिनमें कई लोग  जिनका कारखानों के साथ संबंध भी था, कई लोग एक्जीट्यूव भी होगें, उन्होंने गुरुजी से शिकायत की, कि हमारे संघ के बहुत बड़े अच्छे प्रचारको को हम अन्य क्षैत्र में काम करने को कहते है, देखा ठेंगड़ी जी जैसे ऐसे बड़े कार्यकर्ता क्या स्टेटमेंट देते है, स्ट्राइक पर।

माने स्ट्राइक करना यह कम्युनिस्टों का धन्धा, और उसको रोकना हमारे कार्यकर्ता का देशभक्तिपूर्ण कार्य है, ऐसा एक इक्वेशन है अनेक  लोगों के दिमाग में, उन्होंने गुरुजी से शिकायत की। देखीये गुरुजी क्या स्टेटमेंट दिया है, दत्तोपंत जी ने, वही स्टेटमेंट उन्होंने गुरुजी को सुनाया । स्टेटमेंट क्या था ? स्टेटमेंट यह था कि “राइट टू वर्क इज अ फन्डामेंटल राइट, देट मीन्स राइट नोट टू वर्क्स इज आलसो ए फन्डामेंटल राइट” इसलिये स्ट्राइक करना यह कामगारों का जो मूलभूत अधिकार है उसको खींच लेने का अधिकार सरकार को नहीं है। “दे मस्ट हेव देट राइट” यह मैंने सक्षिप्त में कहा लम्बा स्टेटमेंट है, उसका कॉपी है मेरे पास, मैंने दत्तोपंत जी से पूछा, उस समय गुरुजी ने क्या कहा ? गुरुजी ने कुछ कहा नहीं, आंखों के ऊपर ऐसा हाथ रखकर बैठे थे, सबकी सुनते थे, उस समय भी नहीं कहा, बाद में भी नहीं कहा, फिर आपने क्या किया ? उन्होंने कहा कि मैं क्या, कुछ न कुछ बोलना ही चाहिये वो तो बोल रहे है इतना बोल रहे है यह कुछ भी नहीं बोल रहे है तो मैंने कहा देखो भाई यह काम करने के लिये आपने मुझे कहा है, मैं काम कर रहा हूं और इस प्रश्न के ऊपर उचित ऐसा समझा  मैंने वह स्टेटमेंट दे दिया, मुझे जो ठीक लगा, आप सब लोग विचार करके अगर ऐसा कहते है कि यह उचित नहीं है, ऐसा यदि निश्चय हो गया तो मैं मेरी गलती हो गई ऐसा मानकर उसको वापिस ले लूगां। इतना कहकर वो भी छूट गये, सब छूट गये उस समय, इस अवस्था से अपने लेबर मूव्हमेंट का काम दत्तोपंत जी कर रहे थे, उस समय यह अपने ही कार्यकर्ताओं की स्थिति थी।

गुरुजी के साथ दत्तोपंत जी का निकट का सम्बन्ध भी था लेकिन मजदूर क्षैत्र में कार्य और विचार की दृष्टी से नई-नई जो बातें आती थी, ये उनको प्रस्तूत करके सर्वमान्य होना चाहिये ऐसा देखने का भी एक काम दत्तोपंत करते थे। वैसे उस क्षैत्र के सभी लोगों के साथ उनका सम्बन्ध भी था, मैं खुद उनके साथ, पूना में आते थे, मुम्बई में आते थे उस समय के जो ट्रेड युनियन लीडर थे एस.एम. जोशी के साथ उनको लेकर गया था, मधुलिमये के साथ उनके साथ गया था, ट्रेड युनियन के कम्युनिस्ट भी उनके निकट के मित्र थे, दत्तोपंत जी के। अनेक घटना जो बोलते है प्रो. हिरेन मुखर्जी उनके निकट के मित्र थे, आन्ध्र के जो पी. राममूर्ती जो कम्युनिस्ट लीडर रहे उनके मित्र थे, उनके संबंध में जो कुछ बातें हुई वे बोलते थे, वो अजातशत्रु थे यह तो एक बात है लेकिन जगन्न मित्र थे यह दूसरी बात है “फ्रेंड ओफ ओल ऐनेमी टू नन” इतना है उनका। इसलिये सर्वक्षैत्र में अत्यन्त आसानी से उनका प्रवास चलता था जिसका चित्र मैंने इमरजेन्सी के समय सभी पक्ष के लोगों को एकत्र लाने के लिए जो उनका हलचल चला था उस समय मुझे देखने को और उसको अनुभव करने का समय मिला, इतना ही नहीं बड़े-बड़े लोगों के साथ जब उनके  तरूणाई के समय के सम्बन्ध में बोलते बोलते संघ के संबंध में बोलते थे डी.पी. मिश्रा  के साथ जैसे जाते थे और आते थे कैसा सम्बन्ध था? पिता पुत्र के जैसा अपना संबंध था ऐसा वो बोलते थे। मध्यप्रदेश के उस समय के जो स्ट्रोंग मेन थे, उनके साथ संबंध के बारे में बोलते थे, बाबा साहब के बारे में तो अधिक उल्लेख किया यहां पर  तो उनका निकट का संबंध था।

और एक घटना वे बताते थे जिसका गुरुजी के साथ संबंध है। यहीं दिल्ली में गुरुजी आये थे। गुरुजी से मिलने के लिये नागपुर के बहुत बड़े कार्यकर्ता जो अपने संघचालक मान्यवर श्रीमन्त बाबा साहेब घटाटे, डॉ. हेडगेवार जी के समय से लेकर आखिर के दम तक नागपुर के संघचालक रहे, उनका घर माने अपने सर्व संघचालकों का देखभाल करने का एक “ही वाज दी केयरटेकर” ऐसा उनका स्थान था, वो बड़े थे, वो यहां पर आये थे, ये यहां क्यों आये ? दिल्ली में गुरुजी से मिलने के लिये आये, कार्य के लिये गुरुजी से मिलने के लिये आये थे, वह जो वर्ष था, पिछले जमाने के स्वातंत्र्य संग्राम जब चल रहा था इस देश में उस समय हिन्दू समाज का देखभाल करने वाले एक “वॉच डॉग ओफ हिन्दू सोसायटि”  ऐसा रोल अदा करने वाले एक नागपुर के डॉ. बी. एस. मुञ्जे उनकी जन्म शताब्दी का वर्ष था। बहुत बड़े आदमी थे वो अपने ढ़ंग से बहुत बड़ी लड़ाईयां भी लड़ी उन्होंने अकेले, तो अनेक लोगों को प्रिय थे विशेषत: महाराष्ट्र और विदर्भ में ज्यादा प्रिय थे और घटाटे जी के मन में उनके बारे में बड़ा आदर था। उनकी जन्म शताब्दी समारोह समिति करके कुछ कार्यक्रम करना चाहिये ऐसा वह सोचकर उस समिति के अध्यक्ष श्री गुरुजी रहे यह विनती करने के लिये वे यहाँ पर आये थे। गुरुजी से मिले और विषय रखा, लेकिन व्यक्तिश: गुरुजी ऐसी बातों में रुचि तो नहीं लेते और लेकिन उस समय मांग करने वाले जो थे बहुत बड़े आदमी थे, डॉ. हेडगेवार जी के आखिर के दिनों में उनकी जो अत्यन्त तत्परता से देखभाल की वह बाबा साहब घटाटे थे, उनका सारा घर “आल हिज असेटस ओन द डिसपोजल ओफ द ओर्गेनाइजेशन”, यह व्यक्ति जब वहाँ यह मांग करने के लिये आते है और खुद डॉ. बी.एस. मुञ्जे और डॉ. हेडगेवार जी का संबंध, संघ के अनेक प्रमुख कार्यकर्ताओं का निकट का संबंध ये होने के कारण गुरुजी, उनकी इच्छा रहे न रहे स्वीकार करना पड़ा, मुञ्जे जन्म शताब्दी समिति के अध्यक्ष बने, और उसमें कौन-कौन रहना चाहिये और समिति सदस्य इस नाते विचार हुआ, बी.एस. मुञ्जे से आदर रखने वाले कौन-कौन है इस देश में, वह थोड़ा गुरुजी ने याद किया और कहा केन्द्र के जो मंत्री थे  बहुत प्रतिष्ठित मंत्री बाबू जगजीवन राम उसके सदस्य रहना चाहिये ऐसा गुरुजी को लगा, और इसलिये उन्होंने कहा कि बाबू जगजीवन राम जी को सदस्य होने के लिये विनती करेंगे, वहां जो ओर कार्यकर्ता थे उन्होंने कहा कि वह कैसे बनेंगे, वे तो इसका सारा विरोध करेंगे, जन्म-शताब्दी तो मूञ्जे की है, और अध्यक्ष तो आप है और इसके साथ कैसे अपने आप को जोड़ लेंगे, ऐसा उन्होंने गुरुजी से कहा, गुरुजी ने कुछ नहीं कहा तो वो चुप हो गये। बाद में सब जाने के बाद उन्होंने दत्तोपंत ठेंगड़ी जी को बुलाया, बुलाकर उनसे कहा अपनी और से बाबू जगजीवनराम से मिलकर आओगे क्या? यह विनती है कि सदस्य हो ऐसा जमता है तो जरा देखकर आना। वैसे दत्तोपंत जी गये, जगजीवन राम के पास गये पुराना परिचय भी था आसानी से मुलाकात भी हुई, वहाँ पर उन्होंने यह सारी बातें जग जीवन राम जी से कही। यह समिति है, आप सदस्य बने, अध्यक्ष तो गुरुजी रहने वाले है, बाबू जगजीवन राम ने एक प्रश्न पूछा, तुमको लगता है कि मैं सदस्य रहूँ इसलिये आये हो, या गुरुजी का संदेश लेकर तुम आये हो ये प्रश्न बोले। उन्होंने कहा गुरुजी की विनती लेकर मैं आया हूँ, “हिज  रिक्वेस्ट, आई ऐम केरिंग” हिज रिक्वेस्ट यह उन्होंने कहा। उन्होंने एक मिनट विचार किया, बाद में कहा अच्छी बात है, मैं बनूगां, तुम जाकर पेपर-वेपर तैयार करके भेज दो, उसके ऊपर जहाँ-जहाँ साइन करना है, मैं करके दूंगा, वापिस आ गये, गुरुजी से कहा,  गुरुजी ने कहा अभी किसी से आऊट मत करो, पहले सारा पक्का करके पेपर में छापने का बाद ही वे सारा आऊट हो जाये, पेपर तैयार किया, नेक्स्ट डे, उनके ओफिस में भेजा, दूसरे दिन प्रात: काल कार्यालय में वो साइन होकर आ गया। जब उनका नाम उसके साथ आ गया, इस समिति के यह सदस्य है, तो सबको बड़े आश्चर्य की बात हुई, तो उस समय कितना आश्चर्य लोगों को हुआ, जितनी आसानी से जगजीवन राम ने उसको स्वीकार किया। गुरुजी ने जैसे “हाऊ ही हेड रीड द माइण्ड ओफ जगजीवन राम” यह एक बात, गुरु शब्द का कीमत उसके पास क्या था ये बात, ये दत्तोपंत जी बहुत अच्छे ढ़ंग से वर्णन करके कहते थे, यह सब लोगों का उनका एक-एक, दो-दो, चार-चार, उदाहरण हम बता सकते है। जहाँ तक देश का संबंध है, संघ का संबंध है, एनेकडोट जिसको बोलते है तो बहुत स्टॉक है उसका,   विशेषकर श्री गुरुजी के सम्बन्ध में, बाला साहेब देवरस जी के संबंध में यह सारी घटनाओं और बाहर के लोगों के साथ के संबंध में यह वो बोलते है।

लेकिन देश से संबंध में उनका कुछ विशिष्ट रोल था, वो यह था जिसका उल्लेख रमन भाई ने किया है । देश में ट्रेड युनियन मुव्हमेंट जो है ये सारा लेफ्टिस्ट लोगों की मोनोपोली थी उस समय उनकी जो अनेक प्रकार की जो कॉम्पलेक्सिटी है उसको ग्रास्प करने में भी तकलीफ होती थी, वहाँ के लोगों को ऐसी एक विचित्र परिस्थिति में, उस क्षैत्र में प्रवेश करके, उनसे ही सारी बातें सीखकर और बाद में जो लेबर एक मूव्हमेंट जो अपने देश में अत्यन्त आवश्यक थी, ऐसा एक लेबर मूव्हमेंट उन्होंने खड़ा किया जो”विच इज इफेक्टिव अलटरनेटिव टू द लेफ्टिस्ट मूव्हमेंट ओफ ट्रेड यूनियन” उन्होंने इस देश के लिये, उसका एक पर्याय तैयार किया, जो लोकतंत्र की दृष्टी से आवश्यक था, जो राष्ट्रवाद की दृष्टी से आवश्यक था, राष्ट्रवाद की चौखट में ट्रेड यूनियन मूवमेंट हो सकता है ऐसा प्रत्यक्ष उदाहरण प्रस्थापित करना आवश्यक था, ये सारी जो बातों को अत्यन्त आसानी से, अपने सम्बन्ध के बलबूते पर, अपने बौद्धिक सामर्थ्य के बलबूते पर, राष्ट्रनिष्ठा के बलबूते पर, संघ में जो उनका स्थान था उसके बलबूते पर, एसा एक अल्टरनेटिव टू बी लेफटीस्ट ओरियेन्टेड लेबर मूवमेन्ट ट्रेड युनियन मूवमेन्ट, उसको किया और जिसका आज “दी बिगेस्ट लेबर मूव्मेन्ट एन दिस कंट्री” ऐसा उसका स्थान आज है। एक व्यक्ति अपने जीवन में कितनी बाते कर सकता है, इतना ही नहीं, अनेक क्षैत्रों में प्रवाह है छोटा सा पुस्तक है, उसको मैंने पढ़ते पढ़ते पढ़ा था  “वक्तृत्व की तैयारी” एक पुस्तक है छोटा सा , पच्चीस तीस पन्नो का “टू ट्रेन वन सेल्फ फॉर दी स्किल ओफ आरेटरी” ऐसा है उसमें जो छोटे छोटे उदाहरण है सारे यूरोप के इतिहास को लाया है, बड़ा मोह होता है, यूनियन के पार्लियामेंट की एक चर्चा को उन्होंने कोट किया है, ओरेटरी का कैसे इफेक्ट होता है। जार्ज थर्ड था, वार ओफ अमेरिकन इनडिपेन्डेन्स का कारण बना जार्ज थर्ड, ये राजा था उसके बारे में बहुत नाराजगी थी देश में, पार्लियामेंट में उसके उपर टीका होने लगी, टीका होने लगी उसमें एक आदमी ने  ऐसी टीका की जार्ज के ऊपर वह क्या है ऐसा है, ये ऐसा देश के लिये खतरा है राजा, तो इससे देश को छुटकारा कब मिलेगा कौन जाने, ऐसा कुछ वाक्य है। बाद में कहा “सीजर हेड हिज ब्रूटस” (Caesar had his brutus) यह पहला वाक्य है सीजर की हत्या करने वाला एक ब्रूटस था याद करो “सीजर हेड हिज ब्रूटस” (Caesar had his brutus), “चार्ल्स हेड हिज क्रोमवेल” (Charles had his Cromwell) इंग्लेंड का राजा था चार्ल्स फस्ट नाम का ही “हेड हिज क्रोमवेल” जिन्होंने उनको फांसी पर, फांसी नहीं “बिहेडिंग” उस समय सिर काटते थे। ही वाज “बिहेडिट” (Beheadit) ये दोनों हो गया, दो राजाओं को याद करो, सीजर हेड हिज ब्रूटस, चार्ल्स हेड हिज क्रोमवेल, अब तीसरा यह जार्ज के नाम पर क्या बोलता है डर हो गया, लोगों ने चिल्लाया “इट इज अ ट्रीजन” लेकिन वक्ता क्या था एक मिनट रुका फिर रिपिट किया सीजर हेड हिज ब्रूटस, चार्ल्स हेड हिज क्रोमवेल एण्ड जॉर्ज द थर्ड मेय  प्रोफिट बाय देयर एग्जाम्पल” ऐसा उन्होंने एंड किया उसका। माने राजद्रोह से बचा जो सजेस्ट करना था, वो किया, ये उस छोटी पुस्तक में है ऐक पेरा में वो है, ऐसे दस उदाहरण आपको मिलेंगे,  सारा यूरोप का इतिहास वक्तृत्व की तैयारी के लिए छोटी पुस्तक, मैंने उनसे पूछा कि इसके लिए आपको टाईम कहाँ है ? उन्होंने कहा  इसके लिये ज्यादा टाईम नहीं निकालना पड़ता, जब थोड़ा करने को कुछ धन्धा नहीं रहता है न, उस समय करते है यह काम, बड़ी आसानी से कहा उन्होंने, ऐसा हर क्षैत्र में उनको कुछ कहना है, और मूलत: उनका पिण्ड अध्यात्मवादी था वो और देव, भगवान, प्रभू-कृपा, ईश्वर कृपा, इश्वरेच्छा यह सारी बातें विशेष प्रसंग में उसका उल्लेख करते थे। दत्त उपासक थे और महाराष्ट्र में एक दत्त उपासना का क्षैत्र है और वहाँ पर तो वर्ष में एक बार दो बार तो वे जाते थे ऐसे आध्यात्मिक पिण्ड के आधार पर जन जहान, राष्ट्रवाद से प्रेरित होकर अत्यन्त विज्ञान निष्ट तर्कबद्ध बौद्धिक आधार पर ऐसा एक संघ का बहुत बड़ा व्याख्याकार, भाष्यकार अपने को ये मिला इसलिये संघ का जो वैचारिक संवृद्धी में बहुत बड़ा कन्ट्रीब्युशन उनका हो गया, अंतिम समय में पूना में ही रहे निकट से जानता हूं कैसे उनका विचार चला था। डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर के संबंध में आखिर का पुस्तक लिखकर पूर्ण होने के बाद वो तुरन्त चले गये, क्योंकि सर संघचालक जी ने उनको कहा था कि अम्बेडकर के साथ का तुम्हारा संबंध के आधार पर एक पुस्तक लिखो। आज वो पुस्तक अवेलेबल है, मूल मराठी में है, हिन्दी मैं भी भाषान्तरीत हो चुका है, अंग्रेजी में करना चल रहा है ऐसे एक बहुत बड़े आदमी के जन्म दिन पर आप सब लोगों के साथ सम्मिलित होने का मुझे एक मोका मिला  इसलिये मैं स्वदेशी जागरण मंच के लोगों का अपनी और से बहुत बड़ा कृतज्ञ हूं इतना कहकर भाषण समाप्त करता हूँ।

 

हमारे बाला साहब – On Sri Balasaheb Deoras by Sri Dattopant Thengadi

हमारे बाला साहब

– दत्तोपंत ठेंगड़ी

प. पू. बालासाहब के साथ कई दशको तक घनिष्ठ संबंध रहा । ऐसे मेरे जैसे व्यक्ति के लिये आज के इस अवसर पर कुछ भी बोलना कितना कठिन है इसकी कल्पना आप कर सकते है । शायद यदि किसी को कल्पना न होगी तो अपनी भावनाओं के बारे में हमारे मान्यवर जगजीत सिंह जी ने जो बताया कि प्रगट करना बहुत कठिन हो जाता है । उसी का अनुभव मैं ले रहा हूँ । जैसा कहा गया कि खामोश गुप्तगूं है “आज बेजुबाँ है जबाँ मेरी” हम में से बहुत सारे लोगों की अवस्था इस समय एसी ही होगी, ऐसा में समझता हूँ । किन्तु एक कर्तव्य के नाते इस समय पर कुछ बोलना है इसी नाते बोलने का साहस कर रहा हूँ ।

यह मासिक स्मृति दिन मनाया जा रहा है । मा. सरकार्यवाह श्री. शेषाद्री जी के आदेश के अनुसार ‘सामाजिक समरसता’ दिन इस नाते इसको हम मना रहे है । बालासाहेब का पूरा जीवन हमारे सामने है । His life was an open book कई नेताओं का जीवन इतना open नही रहता । बालासाहब का जीवन open book जैसा जीवन रहा । जीवन के अंतिम चरण में विकलांग अवस्था के कारण उनको कितनी असुविधा बर्दाश्त करनी पडी, कष्ट बर्दाश्त करने पडे, हममे से बहुत लोगों ने उनका दर्शन करते हुए यह आखों से देखा है । कई वर्ष तक वो विकलांग थे किन्तु इसके कारण एक भ्रांति जिन्होने उनको नजदीक से देखा नही उनको मन में रही कि विकलांग है, अब कुछ काम काम नही कर सकते । निरूपयोगी हो गये ऐसी भ्रांति अपरिचित लोगों के मन में हो सकती थी । वह गलत थी । भीष्म पितामह सरशैय्या पर थे, हलचल नही कर सकते थे किन्तु उस अवस्था में भी युधीष्ठर ने भगवान श्री कृष्ण से पूछा ”धर्म और अधर्म इसका निर्णय कर लेना चाहता हूँ ” तो स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने कहा इसका निर्णय करने के लिए अधिकारी पुरूष भीष्म पितामह ही है । मै तुमको उनके पास ले जाता हूँ । ठीक यही अवस्था जब सरशैय्या पर बालासाहब थे, हलचल नही कर सकते थे तो भी सभी को मार्गदर्शन करना, सलाह देना, सभी की बाते सुनना ये सारा कार्य उनका चल रहा था । शरीर विकल था, बुद्धी विकल नही थी यही विशेषता थी । Intellectual capacity, memory intact थी और इसके कारण कोई भी समस्या लेकर भी जाता था, उसका उचित मार्गदर्शन करते थे । कोई भी मिलने को आया तो उसको ठीक ढंग से पहचानते थे । उसके बारे में, उसके परिवार के बारे में, उसकी शाखा के बारे में पूछते थे । सारे समाचार पत्र, जो भी उपलब्ध थे, हर दिन पढ़वा लेते थे । टी. वी. पर आधुनिक समाचार क्या है यह भी बारीकी से देखते थे । राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्र में क्या हो रहा है, इसका इनका निरीक्षण बराबर चलता था । sharp Intellect, sharp memory आखिर तक थी । बिलकुल अंतिम चरण तक थी । और इसी कारण राजनैतिक क्षेत्र में क्या उथल-पुथल हो रही है, सामाजिक क्षेत्र में क्या गलत बाते हो रही है सभी बातों का उनका निरीक्षण रहता था । और इस दृष्टि से मार्गदर्शक के नाते भीष्म पितामह के समान उनकी भूमिका हमेशा रहती थी ।

संघ के कार्यकर्ता, इतना ही नही तो स्वयंसेवकों द्वारा चलाई जा रही विभिन्न संस्थाएं उनके कार्यकर्त्ता को भी मार्गदर्शन करने का काम उस विकलांग अवस्था में भी उन्होने किया यह एक उल्लेखनीय बात है । उनकी सारी उत्कृष्ट भावनाएँ संघ के स्वयंसेवक के नाते, सर संघचालक के नाते , उस विकलांग अवस्था में भी यथापूर्व कायम थी । वे हमेशा स्वयंसेवक की ओर अपने पुत्र के जैसे देखते थे । पितृतुल्य भावना उनके मन में थी । कुछ लोगों ने ऐसा कहा की भई इनकी मृत्यु हुई तो उनको बड़ा शोक हुआ । स्वयंसेवकों पर कोई भी आपति आती है तो उनका दिल दर्द करता था और इसलिये सबको आश्चर्य हुआ की जिस समय कार्यालय के एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना wheel chair पर भी कठिन लगता था, ऐसे समय जब उन्होने पढ़ा की मद्रास में अपने संघ के कार्यालय में  Bomb Blast हुआ है, हमारे कुछ स्वयंसेवक हत और आहत हुए है, उनसे रहा नही गया और आखिर में डॉ. के Advice के विरूद्ध जाते हुए हर तरह की “रिस्क” लेते हुए वो उस अवस्था में भी मद्रास गये । जिनकी मृत्यु हो गयी थी ऐसे लोगों के परिवार जनों को स्वयं व्यक्तिगत रूप से मिले । जो आहत हुए थे, घायल हुए थे, उनको सांत्वना दी और वे फिर वापस आये ऐसी अवस्था में भी एक कमरे से दूसरे कमरे में जाना उनके लिये कठिन था । इतना साहस उन्होने दिखाया इतनी ताकत उन्होने जुटाई तो सभी स्वयंसेवको के बारे मे कितना प्रेम कितनी पितृतुल्य आत्मीयता, एकात्मता उनके मन में थी । यह विकलांग अवस्था में भी उनका दर्शन हम लोगों ने किया ।

जीवित अवस्था में उन्होने जो कार्य किया वह हमारे सामने है । लेकिन विशेष रूप से मैंने इसका उल्लेख इसलिए किया कि बहुत लोगों के मन में भ्रांति देखी थी कि एक बार विकलांग होने के बाद, कार्य के लिए उनका मार्गदर्शन, योगदान नहीं रहा , ऐसी बात नही थी । विकलांग अवस्था में भी उनका योगदान था, आखिर तक यह योगदान रहा यह कहने की प्रमख बात थी ।

वैसे उनके जीवन के बारे में पिछले एक माह में बहुत कुछ कहा गया है, बहुत कुछ लिखा गया है । इसके कारण कोई नई बात बताने की है ऐसा मै नहीं समझता । देवरस परिवार यह आंध्र प्रदेश का है, महाराष्ट्र का नही । आंध्र-प्रदेश में चंद्रपुर के मार्ग से, वाया चंद्रपुर कई तेलगु परिवार नागपुर में आये । हेगडेवार परिवार उसी में था । बापूजी अणे उसमें थे । बाल शास्त्री हरदास का परिवार था । कन्नमवार का परिवार था । कई तेलगू परिवार वाया चंद्रपुर, नागपुर में आये, उसी मे से देवरस जी का परिवार था । उनका पहला नाम देवराजू ऐसा था । नागपुर में स्थायी होने के बाद देवराजू का मराठी करण देवरस हो गया । आचार्य विनोबा भावे जो शाब्दिक श्लेष करने में चतुर थे वह हम लोगों से कहते थे कि देवरस का अर्थ तुम नही समझते । सभी देवताओ का रस निकालकर जो तैयार हुआ वह तुम्हारा देवरस है । विनोबा भावे ऐसा शाब्दिक श्लेष करते थे । उनके पिताजी बहुत धार्मिक थे, कर्मठ थे । नागपुर में मोती बाबा जामदार करके एक श्रेष्ठ संत थे । जिनको दत अवतार कहा जाता था । उनके भक्त थे । उनकी माताजी, वह भी बहुत धार्मिक थी और प्रमुख बात यह थी कि बहुत कर्मठ और एक तरह से व्रती उनको कहना, यह ठीक होगा । ऐसा उनका व्यवहार था । परिवार में गृहिणी के नाते उनको ही सब काम करने पड़ते थे किन्तु किसी शारीरिक न्यून या बीमारी के कारण Medical Advice था कि उन्होने केवल छाछ पर जीवित रहना और कुछ लेना ही नही, केवल छाछ! दिन में, सुबह, रात को केवल छाछ । तो जीवन का आधे से अधिक हिस्सा बालासाहब की माता जी ने केवल छाछ पीकर बिताया और उसी अवस्था में घर का भी तो सब काम करती थी और हम बच्चे थे तो हम लोगों को आश्चर्य होता था कि इधर पूरण पोली, वडा ऐसे सारे भोजन के पदार्थ वह बनाती थी । सब लोगों को परोसती थी और स्वयं केवल छाछ पीकर रहती थी । इसमें उनका जो संयम है, व्रती जीवन है उसका परिचय उस समय भी हम लोगो को होता था । ऐसा उनकी माताजी का स्वभाव था । बालासाहब के मन में माता जी के बारे में बहुत ही प्रेम आदर था । आखिरी बीमारी में उन्होने अपने माताजी का बक्सा, माताजी का फोटो, उनका जो गांव है, आमगांव कारंजा, वहाँ से मंगवाया था और इसका कारण बालासाहब के जीवन में माताजी का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा । सूझबूझ आने के बाद या सूझ बूझ आते ही बालासाहब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में प्रविष्ठ हुए और उन्होनें संघ के वायुमंडल के अनुकूल माताजी से कहा की मेरे साथ भोजन के लिए सभी जाति के लोग आयेंगे । दलित भी आयेंगे । उस समय मै यह नहीं सुनूंगा की ये दलित हैं तो मेरे रसोई घर में रोटी नही खा सकता । मेरे साथ बैठकर खायेगे । रसोई घर में बैठकर रोटी खाएंगे । माता जी ने कहा मेरी ओर से काई आपत्ति नही है । उन दिनों में आप कल्पना कीजिए जब वे बाल स्वयंसेवक थे । उन दिनों में orthodoxy इतनी प्रबल थी की जहाँ माता पिता दोनो बहुत कर्मठ, वहाँ यह बाल स्वयंसेवक आग्रह करता है कि मेरे दलित बंधु भी मेरे साथ आयेंगे और रसोई घर में खाना खायेंगे । बाहर नही । तो माताजी ने यह बात स्वीकार कर ली । यह एक अनोखी बात उन दिनों मानी गयी थी । सामाजिक समता परिषद् सामाजिक मंच आदि बातें तो सब नयी है । मै तो समझता हूँ उनके बाल्य अवस्था से ही यह सामाजिक समरसता का प्रांरभ उनके रसोई घर से उन्होने किया था और माताजी के सहयोग के कारण यह हो सका । इस तरह की माताजी भगवान की दया से उनके लिए उपलब्ध थी वह हमारे लिये भी एक सौभाग्य की बात थी । जब से सूझ-बूझ आयी तब से शाखा में शामिल हुए कुश पथक यह बाल स्वयंसेवकों का पथक उन दिनों में बहुत ही प्रसिद्ध था । प. पू. डॉक्टर जी का विशेष ध्यान कुश पथक के स्वयंसेवकों पर रहता था । बहुत आशाएँ उन्होंने लगायी थी और कुश पथक में से सभी वैसे ही स्वयंसेवक, कार्यकर्ता निर्माण हुए, जिन्होने डॉक्टर साहब की आशा फलीभूत करने का प्रयास किया । वहाँ से धीरे-धीरे संघ के कार्य में उनकी प्रगति हुई । संघ के बारे में आप जानते है कि संघ में हर एक को रगड़ में से जाना पड़ता है ऐसा नहीं होता की अच्छा भाषण देता है तो उसको अधिकारी बना दो, ऐसा नहीं होता । जो संघ की रगड़ है, स्वयंसेवक, गटनायक, शिक्षक, मुख्य शिक्षक, प्रचारक, जिला-प्रचारक, विभाग-प्रचारक, या कार्यवाह, जि. कार्यवाह, विभाग-कार्यवाह, एक रगड़ मे से हर एक को जाना पड़ता हैं । तो सभी तरह के काम करते करते उन्होने संघ कार्य में प्रगति की । जिस विभाग में उनका जन्म हुआ, उनका मकान जिस विभाग में था वह विभाग पुराने नागपुर में था । नागपुर के हम दो हिस्से उन दिनों में मानते थे । जो ब्रीज है, ब्रीज के उधर का नागपुर, याने Modern इधर का याने पुराना । तो पुराने नागपुर में उनका मकान था और इसके कारण तथा कथित पिछड़ी जातीयों, तथा कथित दलित जातीयाँ, ऐसे लोग उनके अगल बगल में रहते थे । तो सारा वायुमंडल ऐसा था । शाखा पर भी दलित और पिछड़े लोगों की संख्या अच्छी रहती थी । उन सब को लेना, संम्भालना, संस्कार देना यह काम करना पड़ता था और वह भाषण से नहीं करते थे ।

संघ कार्य के बारे में आप जानते है कि संघस्थान पर आना पड़ता है । संघस्थान कहाँ मिलेगा? पहला ही संघस्थान बालासाहब को ऐसा मिला की एक टूटा हुआ मकान, खंडहर, उसके सामने मैदान ऐसा ही पड़ा था । कोई उपयोग नही लेता था जो केवल खंडहर था, तो सुबह शाम को लोग प्रातविधी के लिये उसका उपयोग करते थे । इसके कारण वहा गंदगी रहती थी । वहाँ शाखा लगाने का सोचा तो वह गंदगी दूर करने का काम पहले करना पड़ा और दूसरे लोगों को कहने के पहले स्वयं बालासाहब सामने हो गये । उन्होने वह गंदगी अपने हाथ से उठायी, बाकी फिर स्वयंसेवकों ने यह काम पूरा किया । तो यहाँ ऐसे छोटे छोटे कामों से लेकर सबके साथ खेलना कबड्‌डी बहुत अच्छा खेलते थे- सबके साथ खेलना एक Sprit सभी लोगो में रह सके इस तरह से शाखा चलाना, होते होते नागपूर कार्यवाह तक उनकी प्रगती हुई और नागपूर कार्यवाह के नाते जितने भी कार्य आवश्यक थे वो बहुत ही उत्कृष्ट ढंग से उन्होने किये । विभिन्न शाखाओं से संबंध, हर एक कार्यकर्ता को बराबर देखना, कौन कार्यकर्ता है, कैसा है? उसका स्वभाव कैसा है? दोनो के बारे मे Equations कैसे है ये सारा देखना, कार्यकर्ताओं को संस्कारित करना और विशेष बात कि सारे जो कार्यक्रम होते है, जैसे संघ शिक्षा वर्ग है उसकी व्यवस्था । शीत शिविर है उसकी व्यवस्था । उन दिनों शीत शिविर की व्यवस्था याने सारे शारीरिक कार्य स्वयंसेवक को ही करने है इस तरह की व्यवस्था थी । बिल्कुल तंबू ठोकने से लेकर सभी काम स्वयंसेवक करते थे । उसमें पहल करने का काम स्वयं बालासाहब करते थे । जिसके कारण बाकी लोगों को प्रेरणा और प्रोत्साहन मिलता था । इस तरह के सभी कार्य नागपुर कार्यवाहक के नाते उन्होने किये । इतना ही नहीं तो कार्यवाह तो नागपुर के थे लेकिन नागपुर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का केन्द्र है, उसका एक विशेष जिम्मेदारी है ऐसा प. पू. डॉक्टर जी कहते थे । उसके अनुसार नागपुर में रहते हुए बाकी देश मे प्रचार कार्य करने के लिए कार्यकर्ताओं को, प्रचारकों को निकालना ये महत्वपूर्ण कार्य अच्छी संख्या में बालासाहब ने किया और नागपुर के बाहर भी जब संघ शिक्षा वर्ग शुरू हुए तब वहाँ प्रारंभिक दिनों में मुख्य शिक्षक भेजना, वह भी नागपुर से ही भेजे जाते थे । तो संघ शिक्षा वर्ग में मुख्य शिक्षक, शिक्षकों को भेजना और प्रचारक के रूप में काम करने के लिये लोगों को Motivate करना इस तरह, नागपुर में रहते हुए संपूर्ण देश में कैसे यह कार्य का वटवृक्ष किस तरह से फैलेगा उसके लिए परिश्रम करना उनका काम रहा ।

प. पू. डॉक्टर जी के समय ही प. पू.  श्रीगुरूजी का संघ में प्रवेश हुआ और ऐसा दिखता है कि डॉक्टर जी के मन में श्रीगुरूजी और बालासाहब इनके बारे में कुछ विशेष Equation होगा । जैसे सन् 1939 में कलकता में संघ कार्य शुरू करने के लिए श्रीगुरूजी को भेजा गया और थोडे ही दिन के बाद उनके सहायक के नाते बालासाहब को भेजा गया । तो दोनो के विषय में कुछ विशेष भावना डॉक्टर जी के मन में थी ऐसा स्पष्ट दिखता है और यह भावना का अनुभव दोनों करते थे । इसके कारण दोनों की जो परस्पर विषयक भावनाएँ थी ये बहुत ध्यान में रखने लायक थी ।

श्रीगुरूजी सर संघचालक हो गये बालासाहब कभी नागपुर कार्यवाह थे, कभी सह-सरकार्यवाह थे । बाद में सर-कार्यवाह बने लेकिन पहले नागपुर कार्यवाह और सह-सरकार्यवाह ही थे । उस समय भी बालासाहेब का जब उल्लेख होता था – तब श्रीगुरूजी कहते थे जिन्होंने डॉ. हेडगेवार जी को देखा नही ,उन्हे बालासाहब को देख लेना चाहिए, तो फिर उनके ख्याल में आयेगा की डॉक्टर जी कैसे थे । एक समय श्री गुरू जी तांगे में जा रहे थे । उनके सामने ही रास्ता दिखाने के लिये बालासाहेब चल रहे थे । तो स्वाभाविक रूप से गुरू जी के मुख से शब्द निकले कि असली सर-संघचालक तो पैदल रास्ते से जा रहे है और नकली सर-संघचालक हम तांगे में बैठकर जा रहे है । मजाक में लेकिन जो स्वाभाविक रूप से शब्द निकला । एक समय उन्होने कहा ‘ संघ के संविधान में एक समय दो सर-संघचालकों की नियुक्ति करने की गुंजाईश नहीं है । यदि होती तो फिर शायद आज की अवस्था नहीं होती । दो सर-संघचालक एकदम नहीं नियुक्त हो सकते इसलिए मै सर-संघचालक हूँ और ये सरकार्यवाह है ।‘ माने कितनी भावना उनके बारे में श्रीगुरूजी के मन में थी यह हम देख सकते है । उनकी भी भावना श्रीगुरूजी के बारे में जो थी वह भी देखने योग्य है । मासिक श्राद्ध के समय सर-संघचालक पद ग्रहण करते समय उनका जो भाषण हुआ उन्होने वर्णन करते हुए कहा उनके वाक्य थे – ‘Under his benign  leadership, I was functioning as a manager’. श्रीगुरूजी उनको कितना उच्च पद देते थे और वे कहते थे , ” Under Guruji’s benign leadership I was functioning as a manager.” के नाते, organizer के नाते उनकी जो क्षमता थी वह विशेष थी ही किन्तु परस्पर संबंध कैसे थे यह एक देखने की बात है । हम जानते है की विविध कार्य स्वयंसेवको द्वारा चलाये गये । प्राय: श्री गुरू जी के कालखंड में ही शुरू हुए । बाद में भी कुछ शुरू हुए और भी कुछ शुरू होंगे । वह क्रम चलेगा क्योंकि यह तो Progressive unfoldment है । 1925 विजय दशमी के पूर्व ही प. पू. डॉक्टर जी ने संपूर्ण राष्ट्र पुनर्निर्माण की योजना बनायी थी, किन्तु जिसको प्रकाशित नहीं किया जो उनकी पद्धति थी । आजकल तो पद्धति नयी है कि एकदम 5 लोग भी पार्टी Form कर लेते है Manifesto Publish कर देते है कि दुनिया की सुर शक्ल कैसे सुधारने वाले है । ब्रह्माण्ड की सुर शक्ल कैसे दुरूस्त करने वाले है । डॉक्टर जी की कार्य शैली दूसरी थी । रघुवंश के राजाओं के बारे में कहा गया है की फलानुमेय: प्रारंभ: । माने किसी भी बडे काम का प्रारंभ करते थे तो पहले शोरगुल नही मचाते थे । उसकी Advertisement propaganda नही करते थे । शांत चित्त से कार्य का पारंभ करने देते थे । जब कार्य का फल आता है तो ”फलानुमेय: प्रांरभ:” । लोग अनुमान लगा सकते थे कि जो फल आया है तो इसका बीजारोपण कभी न कभी हुआ होगा । इस तरह से काम करने की डॉक्टर जी की शैली थी । इसके कारण तरह तरह की सारी योजनाएँ उनके मन में रहती थी । तो भी उन्होने इस तरह Manifesto नही दिया । किन्तु आज जितना हम देखते हैं मूल योजना की ही यह Progressive unfoldment है । उत्तरोत्तर होने वाला यह प्रस्फुटीकरण है । तो तरह तरह की संस्थाएं जो निर्माण हुई थी अब इसमें गुरूजी और बालासाहब का ऐसा कुछ Joint था । उदाहरण के लिये दादासाहब आपटे बहुत साल U.P. उस समय United Press करके थी, बाद में उसको U.N.I. बनाया गया । उसमें उन्होने काम किया । पत्रकारिता क्षेत्र में जाना है यह सोचा था, सभी क्षेत्र में जाना है यह पहले से ही सोचा था । संघ कुछ नही करेगा, संघ स्वयंसेवक सब कुछ करेंगे । संघ केवल संपर्क, स्वयंसेवक, संगठन यही तक अपनी सीमा रखेगा । किंतु संघ से प्रेरणा और संस्कार प्राप्त किये हुए स्वयंसेवक व्यक्तिगत रूप से राष्ट्र जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करेंगे और वहाँ संघ के आदर्शों के अनुकूल कार्य की रचना और विकास करेंगे । यह विजय दशमी 1925 में सोचा गया था । उसके अनुसार जैसे जैसे संघ की शक्ति बढ़ती गयी वैसे वैसे अन्य अन्य क्षेत्रों में प्रवेश करना शुरू हो गया । तो दादासाहब आपटे की कुछ Apprenticeship United Press  में हुई थी । उनके साथ श्रीगुरूजी की  बातचीत हुई । अपनी भी देशी भाषाओं को लेकर ‘News agency’ होनी चाहिए । ”हिन्दुस्थान समाचार” का विचार हुआ । जैसे वह विचार तय हुआ तो उसको ठीक ढंग से क्रियान्वित करना, उसके लिए उपयुक्त व्यक्ति कौन है , उनको locate करना motivate करना उनकी team बनाना । दादासाहब आपटे थे, बापूराव महाशब्दे, बापूराव लेले।, जी.आर. माधवराव, नारायणराव तरके, वसंतराव देशपांडे और आखिर तक जिन्होनें यह काम चलाया वह बालेश्वर जी अग्रवाल यह सारी जो team बनी, वह बनाने का काम बालासाहब ने किया । जैसे वनवासी कल्याण आश्रम, प्रेरणा गुरू जी की थी । बालासाहब देशपांडे जसपुर में वकालत करते थे । उनको वनवासियों में काम करने की प्रेरणा दी, किन्तु जैसे वह काम बढा, जो केवल जसपुर तक सीमित था । तो फिर उसको अखिल भारतीय स्वरूप देना चाहिए यह प्रेरणा बालासाहब ने दी और उसका अखिल भारतीय स्वरूप होना चाहिए इसलिए जो -जो सहायता संघ की ओर से होनी चाहिए वह देने की व्यवस्था भी की और उस कार्य से इतनी एकात्मता थी, जैसे मैने मद्रास का उदाहरण दिया, एक बडे सम्मेलन की योजना, वनवासी कल्याण आश्रम की, एक बिहार के गुमला में और एक बस्तर में हो गयी । सम्मेलन की योजना हुई इस समय बालासाहेब की तबीयत ठीक थी । योजना होने के बाद प्रत्यक्ष सम्मेलन के समय उनकी तबीयत बहुत खराब हो गयी उनके लिये चलना फिरना भी असंभव हो गया । फिर भी लोगों का विरोध न मानते हुए आग्रह पूर्वक गुमला में और बस्तर में वो स्वयं गये । वनवासी लोगो ने देखा की कितने कष्ट उठाते हुए सरसंघचालक हमारे बीच में आ रहे है । एक कृतज्ञता का भाव उनके मन में था । तो योजना बनाना, जनरल मार्गदर्शन -क्रियान्वयन करने का काम इसी तरह उनका चलता था । विशेष रूप से हम जानते है कि संघ कार्य में हमेशा एक समस्या रहती है ,आगे भी रहेगी और ये समस्या ये है ,और वह सच भी है कि संघ कार्य परिस्थिति निरपेक्ष है । संघ कार्य परिस्थिति निरपेक्ष है किन्तु स्वयंसेवक का मन यह परिस्थिति सापेक्ष  रहता ही  है । संघ  कार्य परिस्थिति निरपेक्ष है, लेकिन स्वयंसेवक  का मन परिस्थिति सापेक्ष है और इसके कारण बाह्यय परिस्थिति का परिणाम कम अधिक मात्रा में विभिन्न लोगों पर होता है ।

इसके कारण स्वयंसेवको की मानसिकता क्या है, जिसका ज्ञान केंद्र को रहना, केंद्र का विचार क्या है इसकी जानकारी स्वयंसेवको तक पहुंचाना यह  ‘Two way communication ‘ बहुत आवश्यक होता है । यह रास्ता बालासाहब ने खोला । मुझे स्मरण है कि पहला ही प्रयोग 1945 में जब बहुत खलबली स्वयंसेवकों  के मन में थी, कई तरह तरह के विचार मन मे थे -कार्यपद्धति के बारे में खासकर तो उन्होने नागपुर में जो  राजाबाग मारूति मंदिर है, उसके प्रांगण में दिनभर का कार्यक्रम रखा । एक दिन में और कुछ नही , प.पू. गुरूजी ने बैठना ओर नागपुर के सभी कार्यकर्ता एकत्रित थे और उन्होने मुक्तचिंतन करना । जो भी विचार मन में हो वहां संकोच की बात नही थी, आदर के, मर्यादा के कारण कम बोलना ऐसी भी बात नही थी । जो विचार जिसके मन में आयेगा वो बोलेगा । पूरे दिन यह कार्यक्रम चला और कोई बात नही थी और फिर दूसरे सप्ताह में मा. बाबासाहब घटाटे के यहाँ बैठक हुई और वही लोग, और फिर जो जो बोला गया था उसके बारे में सरसंघचालक के नाते क्या प्रतिक्रिया है वह श्री गुरूजी ने उस समय प्रकट किया ।‘Two way communication ‘की प्रकट पद्धति बालासाहब ने शुरू की । उसी का अधिक विस्तृत स्वरूप सिंदी के जिला प्रचारकों के वर्ग में, इंदौर के विभाग प्रचारकों के वर्ग में, ठाणे में नवंबर 1972 मे वर्ग हुआ उसमें इसी का विस्तृत स्वरूप हम देख सके और इसके कारण इस तरह से केंद्र के मानस की जानकारी नीचे के स्वयंसेवक तक और नीचे के स्वयंसेवक की मानसिकता केंद्र तक -पहुंचाने की व्यवस्था भी बालासाहब की कुशलता की योजना के कारण हो सकी ।

हमारे विजय गिरकर जी ने उल्लेख किया था कि तरह तरह से कुछ लोग जानबूझकर गलतफहमी फैलाते है । जैसे श्री गुरू जी के समय कहते थे, कि डॉक्टर जी का संघ अलग था, श्री गुरूजी  का संघ अलग था और आगे कहा की गुरूजी का संघ अलग था, बालासाहब का संघ अलग था । माने समझते दोनो को नहीं । लेकिन जानबूझ कर बुद्धिभेद करने का प्रयास होता है । वो लोग नही जानते कि कितने उनके घनिष्ठ संबंध थे । आखिरी दिनों में  Ban  (प्रतिबंध)  के समय द्वारका प्रसाद जी मिश्र इनको जवाहरलाल जी ने नागपुर भेजा । श्री गुरू जी सिंदी के जेल में थे, बालासाहब आदि बाहर थे । उनके साथ मिश्रा जी की बैठक हुई । मिश्रा जी ने कहा की जवाहरलाल जी ने तय किया है कि  Ban  (प्रतिबंध) उठाना है । केवल उसके लिए श्री गुरू जी ने, केवल नेहरू जी के नाम पत्र देना चाहिये कि Ban  (प्रतिबंध) उठाये । तो बालासाहब ने कहा- नही, इतने दिन का हमारा अनुभव ऐसा है जिसके कारण आपके शब्द पर हमारा विश्वास नही । श्री गुरू जी ऐसा कोई पत्र नही लिखने वाले । मिश्रा जी ने कहा आप केवल पत्र लिखिये, Ban  (प्रतिबंध) उठने वाला है, मैं आश्वासन देता हूँ । बालासाहब ने कहा कि नेहरू जी के नाम श्री गुरू जी यह पत्र नही लिखेगें   । फिर मिश्रा जी ने compromise  निकाला की श्री गुरूजी ने नेहरू जी के नाम पत्र नही लिखें, किंतु मध्यस्थता करने वाले पं. मौलीचंद्र शर्मा इनके नाम Private  पत्र देना । इसके आधार पर Ban (प्रतिबंध) उठाने का काम होगा और ऐसा ही हुआ । आखिरी जो पत्र था  श्री गुरूजी का, नेहरू जी को नही था, Private  letter to  पं. मौलीचंद्र को शर्मा था और उसी के आधार पर Ban (प्रतिबंध) उठाने काम हुआ । किन्तु ये जब मिश्रा जी से बात हुई तब श्री गुरूजी तो सिंदी में थे । लोगो के साथ उनका  Communication  नही था, लोगो का जाना आना नही था । किन्तु जब मौलीचंद्र गये तो पत्र का content सीलबंद करके उनके पास दिया और उन्होन कहा कि इस पर आप को हस्ताक्षर करना चाहिये । बालासाहब का जब यह पत्र देखा कि इस पर आपको हस्ताक्षर करना चाहिये, गुरू जी ने तुरन्त हस्ताक्षर कर दिया वो Private letter to मौलीचंद्र शर्मा , इनके आधार पर बाद में Ban (प्रतिबंध) हटाया गया । माने इतना विश्वास ।

इनके परस्पर संबंधों  के बारे में, खासकर जिन्होने गलतफहमी फैलाना अपना धर्म माना है कितनी बात कही  है । कितनी परस्पर आत्मीयता थी उनकी, इसका केवल एक उदाहरण मै देना चाहता हू । शायद बाहर के लोगो को इतना मालूम नहीं । बहुत ही मार्मिक ऐसा यह प्रसंग है । गांधी हत्या हुई, शासन ने जानबूझकर संघ के बारे में गलतफहमी फैलाई जो राजनैतिक तत्व संघ को बदनाम करना चाहते थे । उन्होने उसका लाभ उठाया । जनता में क्षोभ पैदा किया गया । और फिर यह बात हुई की एक आदमी की हत्या हुई उसका बदला दूसरे आदमी की हत्या से होना चाहिये -खून का बदला खून से, हत्या का बदला हत्या  से, ऐसा कहते हुए और ऐसे जो राजनेता थे बहुत बडे, वो Mob  (भीड़) को लेकर प.पू. गुरूजी के मकान पर हमला करने के लिए आए । मकान छोटा था बालासाहब ने पहले ही व्यवस्था कर दी थी । Mob (भीड़) आ रही देखा तो 40 दंडधारी स्वयंसेवको को अंदर रखा था । किंन्तु Mob (भीड) इतना बडा था कि इतने Mob (भीड) के सामने 40 दंडधारी स्वयंसेवक कुछ नही कर पाते । इसलिये कई लोग गुरूजी से कहते थे आप यहाँ से सुरक्षित बाहर चले जाइये । बडा Mob (भीड़) है, यहा आप रहेंगे तो आपकी हत्या होगी । गुरू जी ने इन्कार कर दिया । उन्होने कहा की मेरी भूमिका ये है कि मै जिस हिंदु समाज के लिये काम करता हूँ वही हिंदु समाज यदि मुझे नही चाहता, मुझे मारना चाहता है, तो मुझे मारे । जो हिंदु समाज की इच्छा होगी वही हो । मै अपनी जान नही बचाऊंगा – अगर हिंदु समाज मेरी जान लेना चाहता है तो । कई लोग गये लेकिन गुरूजी हटने के लिए तैयार नही थे । बाहर Mob (भीड़)  इकट्ठा हुआ था । मकान छोटा था । दरवाजा लकडी का था और वो भी पुरानी लकडी का दरवाजा था । आखिरी में दरवाजे को धक्के लगाना भी उन लोगों ने शुरू किया, गुरूजी मानने को तैयार नही थे । शायद उनके मन मे यही भावना थी की इस समय यहाँ आत्मार्पण करना यही सिद्धान्त के अनुकल है, ऐसा कुछ विचार होगा । आखिर में बालासाहब आये और बालासाहब ने उनको कहा आप हमारे सरसंघचालक है, हम आपके स्वयंसेवक है । सरसंघचालक के नाते आपके आदेश का पालन करना हमारा काम है । किन्तु स्वयंसेवक का भी स्वयंसेवक के नाते आप पर कुछ अधिकार है और उस अधिकार के नाते मै कहता हूँ कि आपको यहाँ से सुरक्षित बाहर जाना चाहिये । बाहर जाने के लिए रास्ता था । गुरू जी तैयार नही थे । मुझे इस समय बिल्कुल समानान्तर घटना का स्मरण हो रहा है, समानान्तर घटना! अपने इतिहास की! गुरू गोविंदसिंह जी चमकौर के दुर्ग में – उसको दुर्ग क्या कहा जाय उसको कच्ची गढी़ कहते है । बहुत थोडे़ लोगों के साथ थे । घेरे गए थे मुगल सेना से । मुगल सेना बहुत बडी़ थी । इतनी बडी सेना के साथ एकदम लड़ना भी संभव नही था किंतु जब घेराव हुआ तो पहले उन्होने अपने बडे पुत्र साहब जादा अजीतसिंह व बाद में पुत्र साहब जादा दूसरा जुझारसिंह दोनो को  10, 15 –  10, 15 लोग देकर लड़ने को गुरू गोविंदसिंह जी ने भेजा । अब लड़ने के लिए क्या भेजना था मरने के लिए ही भेजना था । स्पष्ट था जो जायेगा मरेगा ही । इतना होने के बाद  15-20 लोग गुरू गोविन्दसिंह जी के पास रहे फिर उन्होने कहा अब हम जायेंगे, उस समय शिष्यों ने कहा कि साहबजादा अजीतसिंह, साहबजादा जुझारसिंह उनका आत्मार्पण हुआ है । लेकिन आपकी बात दूसरी है आप हमारे नेता है आपने हमको सिखाया है कि ‘ ‘आप्पे गुरू आप्पे चेला । ” इस युक्ति के अनुसार अब हमारी बात मानना आपके लिए बाध्य हो जाएगा । आपको हमारी बात माननी चाहिये । आप सुरक्षित बाहर निकलिये । यह अपने लिये, देश के लिये आवश्यक है । ठीक यही बात जैसे बालासाहब ने कही स्वयंसेवक के नाते हमारो बात आप को माननी पडेगी । यही शिष्यों ने कहा ”आप्पे गुरू-आप्पे चेला” इसी उक्ति के अनुसार हम आपको कह रहे हैं और हमारी बात आप को माननी पडेगी । अपनी अनिच्छा होते हुए भी गुरू गोविंदसिंह जी ने शिष्यों की बात मान ली । वैसे ही अपनी अनिच्छा होते हुए भी श्री गुरू जी ने बालासाहब की बात मान ली और सुरक्षित बाहर आये, वरना हिंदुस्थान का ओर संघ का इतिहास बदल जाता । यह हम समझ सकते है दोनो में इतना परस्पर संबंध था ।लेकिन लोगों ने उसको तरह तरह के रंग दिये !

जैसे उन्होने कहा  ‘Under his benign  leadership, I was functioning as a manager’.   वारत्तव में “Sceience ofManagement की शिक्षा दीक्षा न लेते हुए जन्मजात वो  Manager थे, जन्मजात । बचपन में शाखा में तो Management करना ही पडता था । एक Philonthrophist डॉ चोलकर उन्होने नागपुर में अनाथ विद्यार्थी गृह निकाला । यह अनाथ विद्यार्थी गृह पुराने नागपुर में था । तो अनाथ विद्यार्थी गृह में स्वाभाविक रूप से उस पुराने नागपुर के दलित और पिछडी जाति के अनाथ विद्यार्थी ही आते थे । उन्होने वसतिगृह तो निकाला था । प.पू.डॉक्टर जी को उन्होने कहा की कोई अच्छा compitent आदमी दीजिये कि वो वसतिगृह की Management कर सकेगा और कैसी Management करना उसकी व्यवस्था लगा देगा । बालासाहब की वहाँ योजना हुई । 2 साल तक उन्होने ठीक ढंग से व्यवस्था की, अनुशासन बद्ध व्यवस्था की । उसी समय उनका बाकी दलित और पिछडे हुए लोगो के साथ संबंध आया । अच्छी Management  इस नाते डॉ. चोलकर जी ने भी उनकी बहुत प्रशंसा की । आपको आश्चर्य होगा, बहुत लोगो को शायद यह पता नही है,१९४५,४६,४७  में उन्होन एक स्टार्स भी चलाया था’ भारत स्टोर्स ‘करके । मा. मनोहरराव ओक उनके सहयोगी रहे । भारत स्टोर्स की व्यवरथा तो business  Management थी, Regular Management वो भी Management बहुत Efficiently वे कर सके ।

वैसे बहुत लोगों को ये पता नही होगा की उनकी पैतृक खेती थी, कृषि थी । बालाघाट जिले में कारंजा के पास आमगाव करके गांव है वहाँ थी । तो उन्होने सोचा कि प्रयोग के नाते मैं स्वय कृषि करूगा । और उस समय का उनका अनुभव है एक आदर्श कृषक  इस नाते उन्होने काम किया और उन्होने उस समय कहा – जब बाकी कृषकों के सामने तो यह बात बहुत बाद में आयी तब उन्होने कहा कि- कृषको को जो कीमते मिलती है वो ठीक नही है । हमारे यहां हर तीन चार साल में एक बार अकाल आता है । माने दो साल में उसको इतनी कमाई करनी पडती है कि तीसरे साल भी इस पर या उस पर गुजारा कर सके । यह ध्यान में रखकर कृषि उपज का मूल्य तय होना चाहिये । यह बात उन्होने उस समय कही कि जिस समय यह बात उस हवा में नही थी और दूसरी बात उनके साथी किसान उनसे नाराज थे । क्योंकि उनके यहाँ काम करने वाले खेतीहर मजदूर और कारीगरों को वे पूरी रोजी देते थे । लोगो ने विरोध किया कि आप पूरी रोजी देते हैं, इसलिए हमारी Position  खराब होती है आप पूरी रोजी देते है तो हमको भी देनी पडेगी । तो बालासाहब ने कहा आप भी दीजिये । ये तो न्याय की बात है । तो वो बोले हम नही दे सकते । बालासाहब ने कहा मत दीजिये मैं मेरा क्रम बंद नही करूंगा । मैं खेतीहर मजदूर और कारीगरो को पूरी रोजी दूँगा । ये उन्होन चलाया । इतना होते हुए भी उनकी कृषि एक आदर्श कृषि के नाते रही । तो वहा की भी Management उन्होन बहुत ही अच्छे ढंग से चलाई थी ।

विशेष रूप से जब तरूण भारत, यह पेपर खरीदा गया तो वह तो उनकी परीक्षा ही थी । उनके ही उपर भरोसा रखकर संघ के लोगो ने तय किया था कि पेपर खरीदेंगे । क्योंकि पेपर के संपादक और Management  के जो लोग थे वो सब कांग्रेस के लिए अनुकूल, ऐसे थे । संघ के लिए कुछ तो विरोधी, कुछ प्रतिकूल, कुछ कम से कम अनुकूल ऐसे लोग थे और सीधा रास्ता जो होता है जो प्राय: होता है जब Management Change  होती है, कि पुराने लोगो को हटाना, नये अपने लोग लाना । वो भी नही करना ऐसा बालासाहब ने तय किया ।और पुराना जो स्टाफ था, संपादकीय जिसमें सामान्य लोग नही थे । भाऊसाहेब माडखोलकर, तात्यासाहेब करकरे, श्री पटवर्धन, गोविंदराव गोखले, यशवंतराव शास्त्री, मानो  Each one of them was great in his own right in field of journalism ऐसे लोग जो संघ के लिए विरोधी या प्रतिकूल थे ऐसे वायुमंडल से वह पेपर लेकर आये, इनको बदला नही लेकिन उनके ऊपर प्रेशर भी नही डाला । जब कभी समय मिलता था, तरूण भारत में जाते थे । इन लोगों के साथ बराबरी के नाते बातचीत करते थे, बार बार जाते थे । सब लोगो के मन में apprehention  था, आशंका थी ,ये संघ का है यहाँ डिक्टेटर शिप होगी । परंतु उनको आश्चर्य हुआ की बालासाहब 2-2, 3-3 घंटे उनके साथ बातचीत चाय पान, नाश्ता करते थे और ऐसे stalwards  में, पुराने लोगों में उन्होने इतना परिवर्तन लाया जिसके कारण तरूण भारत अपने लिए अनुकूल इस ढंग से काम कर सके । इस बीच ”समचार पत्रो की Management” इस विषय को उन्होने पूरी तरह से हस्तगत किया और इसक कारण वो बता भी सकते थे, कि कोई पत्र निकालना है तो कैसे निकालना यह सलाह दे सकते थे ।

उदाहरण के लिये दिल्ली में जब लोगो ने सोचा की र Motherland  ये दैनिक पत्रक निकालना चाहिये । तो पहले उन्होने warning  दी पत्रक निकालिये, आज आपके पास Finance है ठीक है लेकिन पत्र का Model  क्या रहे यह तय करें । उन्होन कहा Model  का मतलब ?  तो बालासाहब ने कहा  Mother land  का Model  नागपुर टाइम्स का होना चाहिये । Indian Express, Times of India या  हिंदुस्थान टाइम्स  ये  Model लेकर आप मत चलिये । किन्तु दिल्ली पंजाब का उत्साह था, उस समय उन्होने दूसरा Model  लिया और Mother land बंद करना पडा ये हम जानते है । तो Science of  Management इस नाते उनकी एक विशेषता हर जगह दिखाई देती है और इस दृष्टि से उन्होन कहा कि “ Under His Benign leadership I was functioning as a manager “ बिलकुल सही है ।

राष्ट्रजीवन के सभी क्षेत्रो पर उनका ध्यान था । सभी क्षेत्रों पर और हर क्षेत्र में जहां जहां आवश्यकता स्वयंसेवको को होती थी वो सहायता करते थे । वो जानते थे की राजनैतिक क्षेत्र का महत्व है और इस दृष्टि से जैसे विद्यार्थी क्षेत्र में, मजदूर क्षेत्र में, किसान क्षेत्र में वैसे राजनैतिक क्षेत्र में भी अपने स्वयंसेवक संघ की नीति-रीति पद्धति, आदर्श लेकर काम करे और एक Model Political  पार्टी बनाकर लोगों के सामने उपस्थित करे । ये उनका प्रयास रहा और खासकर ये सब जानते हैं , कि जब आपातकाल आया उस समय बाकी सारे राजनैतिक दल निष्प्रभ हो गये थे । सारे निष्प्रभ हो गये थे । उस समय RSS had to bear the brunt उस समय जो R S S ने किया इसके कारण कुछ क्षण के लिए सभी राजनेताओं ने संघ की बडी प्रशंसा की, संघ के बारे में कृतज्ञता प्रगट की, किन्तु कृतज्ञता का भाव ज्यादा दिन तक मन में रखना ये राजनैतिक नेतृत्व का स्वभाव नही है इसके कारण वो बात बाद में भूल गये । किन्तु उस समय सभी ने प्रशंसा और कृतज्ञता भाव प्रकट किया था । वो सारा जो आपातकालीन संघर्ष था इसका सारा संचालन येरवडा जेल में रहते हुए बालासाहब करते थे । जो बाहर थे उनके साथ दिन प्रतिदिन उनका संपर्क रहता था । बाहर क्या हो रहा है उसकी खबर उनको जेल में मिलती थी । उनका आदेश क्या है ये लोगो को हर दिन मालूम होता था और इस तरह से सारा संचालन उन्होन किया । येरवडा जेल में बाकी लोगों को भी बालासाहब का परिचय हुआ । विभिन्न दलों के लोग थे, नाम लेने की आवश्यकता नही वो भी व्यक्तिगत संपर्क में आये । मुसलमान लोग भी संपर्क में आये और सभी के मन ने बालासाहब के प्रति इप्ताा?  फादर  फिगर  के नाते श्रद्धा हुई  कि विभिन्न दलो के नेता भी बालासाहब के चरणस्पर्श करने लगे वापस जाते समय और मुसलमान लोग भी बालासाहब के चरणस्पर्श करने लगे और जेल के बाहर आने के बाद भी बालासाहब को मिलने को बहुत लोग आते थे किन्तु हिंदु मुसलमान एकता हो जायेगी तो हमारी मिनिस्टरशिप का क्या होगा ?  ऐसी चिंता जिन लोगों के मन में थी उन लोगो ने यह भी व्यवस्था की, इस तरह का हिन्दू मुसलमानों का मिलन नही होना चाहिये । तो मुसलमानों में फिर से गलत फहमी फैलाने का काम राजनेताओं ने किया । किन्तु उन सब लोगों में बालासाहब के विषय में श्रद्धा का भाव था । यह उल्लेखनीय बात है ।

राजनीति का महत्व वो जानते थे । साथ ही साथ राजनीति की सीमाएं भी जानते थे । खराब लोग राजनीति में रहें उसकी तुलना में अच्छे लोग शासन में रहे तो देश का नुकसान नही होगा, यह भी जानते थे । अच्छे लोगो का शासन में लाना चाहिए यह भी समझते थे किन्तु साथ ही साथ राजसत्ता के द्वारा ही राष्ट्र निर्माण होगा यह उनका विश्वास नही था । राष्ट्र निर्माण जो होगा वह सामाजिक, सांस्कृतिक शक्ति के आधार पर होगा ऐसा वो मानते थे । और इसके कारण जहाँ लोकतंत्र के अस्तित्व का ही सवाल आया, जब लोकतंत्र ही खतरे में था उस समय 1977 के चुनाव में खुलेआम बालासाहब ने घोषणा की, कि लोकतंत्र को बचाने के लिए कांग्रेस के खिलाफ हमारे लोग काम करेंगे । उस समय जो चार्टर ओफ डिमाण्ड बताया गया था, उसमें हम क्यो लडाई लड़ रहे हैं, उसमें ये  Clause नही था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का Ban  (प्रतिबंध) हटना चाहिये । इसके लिए यहClause  नही था । संघ का नाम नही था । संस्थागत अभिनिवेश की बात नही थी ।  Institutional Ego की बात नही थी । एक ही था कि लोकतंत्र को बचाना और लोकतंत्र को बचाया गया । तानाशाही खत्म हो गयी । जिनको शासन चलाना था, उनके हाथ में शासन की बागडौर चली जाये और फिर, फिर से लोगों को चेतावनी के रूप में बालासाहब ने कहा कि राजनीति, राजनैतिक सत्ता, इसका महत्व कितना है और संघ का उससे क्या संबंध है । तो जनता पार्टी शासन में आने के पश्चात् दिल्ली में जो  Rallies हुई उन Rallies में बालासाहब ने स्पष्ट रूप से एक विषय रखा था । तीन बार बालासाहब ने यह विषय दिल्ली की Rallies में रखा । जनता पार्टी शासन में आने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व इन शक्तिओं का मापदंड राजनैतिक नही हो सकता । वह मापदंड सामाजिक और सांस्कृतिक ही होना चाहिए । यह विषय तीन बार उन्होने सामने रखा । तो इस तरह से संतुलन था । राजनीति का महत्व भी जानना, साथ ही साथ उसकी सीमाएं जानना और राष्ट्र निर्माण का कार्य लोकशक्ति के आधार पर होगा राजशक्ति के आधार पर नही, यह सारी बाते संतुलित रीति से उन्होने लोगों के सामने रखी ।

जहाँ तक सामाजिक समरसता का प्रश्न है, यह बताना आवश्यक है कि, संघ की विचारशैली, कार्यशैली इसकी एक विशेषता है । जैसे मैने कहा कि विजय दशमी सन् 1925  को जो संघ की स्थापना हुई वह  Reflex action  नाते नही हुई । एक Reaction  के रूप में नही हुई । सालों तक प.पू. डॉक्टर जी ने सोच विचार किया था । डॉक्टार जी का सभी समकालीन कार्यो से प्रत्यक्ष संबंध था । सभी देशी-विदेशी विचारधाराओं का गहन अध्ययन था । यह सारा करते हुए उनके मन में यह लगता था कि कुछ कमी है और वह क्या है? इसका गहन चिंतन सालो तक उन्होने किया । उसके बाद संघ की स्थापना हुई । उनको Bi-focal Vision   हो गया था । Bi-focal Vision आप जानते है कि नीचे पढने का होता है, और ऊपर का दूर का देखने का होता है । तो उनका Bi-focalVision  हो गया था । नीचे के चश्मे से दिखता था कि तात्कालिक लक्ष्य क्या है? Immediate Object वो स्वराज्य है और ऊपर के चश्मे से दिखता था कि

Ultimate Object क्या है ? अंतिम लक्ष्य क्या है? वो है ”परम् वैभवम् नेतु मेतत् स्वराष्ट्रम्” इस ढंग से कार्य की रचना थी और इस कार्य की रचना में सारी जो योजना थी बहुत लंबी योजना थी । आज एकदम लोग जो संरथाएं खडी करते है ऐसा नही था । गहन चिंतन का परिणाम था और इस दृष्टि से आगे क्या होगा इसका पूरा विचार डॉक्टर जी के सामने था । यहाँ वो सारा विषय लेने की आवश्यकता नही है और इस दृष्टि से जो भी नया नया कार्य बाहर के लोगों ने देखा तो कहा कि अब संघ के लोग राजनीतिक क्षेत्र में भी आए, मजदूर क्षेत्र में आए, और किसी क्षेत्र में आए ऐसा कहा । वास्तव में यह पूर्व योजना थी । जैसे जैसे Capital बढेगा वैसे वैसे दुकानो की संख्या बढेगी ।Capital  के Intrestपर दुकानों की संख्या बढानी है । पहले से ही योजना थी और भी नयी नयी संस्थाएं हमारे स्वयंसेवक निर्माण करेगें, किन्तु पूर्व योजनानुसार यह सारा चला और यह सारा जो पूर्व योजना के अनुसार चल रहा तो इसमें एक शैली इस नाते, जैसे, मैने कहा ”फलानुमेय: प्रारंभ:” यह विचार शैली होने के कारण पहले से  declare  नही हुआ । सभी बाते आरंभ में थी । एकदम सारा Manifesto घोषित नही हुआ । धीरे धीरे प्रस्फुटीकरण हुआ । उसको Progressive unfoldment कहना चाहिए । Progressive unfoldment धीरे धीरे होता गया । उदाहरणार्थ गौ हत्या विरोध संघ के स्थापना के पूर्व ही से डॉक्टर जी  को यह  Article of faith  था । संघ का तो था ही किन्तु उसको समय की आवश्यकता के , अनुसार विशेष आग्रह जिसको thrust कहते है,  इस रूप में प.पू. श्री गुरूजी के कालखंड में आया । जो गौ हत्या विरोध आदोंलन हुआ । ”स्वदेशी” अभी स्वदेशी जागरण मंच के नाम से काम चल रहा है । किन्तु स्वदेशी का आग्रह पहले से ही रहा । यहाँ तक कि नागपुर में  जो स्वदेशी भंडार चलता था वहां Counter पर बहुत समय तक डॉक्टर जी भी बैठते थे । पहले से ही स्वदेशी का आग्रह रहा, किन्तु विशेष आग्रह, thrust के रूप में परिस्थिति की आवश्यकता के अनुकूल इस समय स्वदेशी जागरण मंच के रूप में आया । वैसे, ही सामाजिक समरसता यह आरंभ से ही थी । जब मैने कहा बालासाहब बाल स्वयंसेवक थे उस  समय अपने कर्मठ परिवार के रसोई घर में दलित स्वयंसेवक बंधुओं को ले जाते थे यह सामासिक समरसता छोड़ कर और क्या थी । स्वयं डॉक्टर जी के जीवन मे आता है । मेरे गांव में , आर्वी गांव में एक जरठ युवती का विवाह उस युवती के मामा ने पैसे की लालच में आकर तय  किया था । डॉक्टर जी को पता चला उनको बात बर्दाश्त नही हुई । वो आए, उन्होने देखा कि वो विवाह नही होगा ,उन्होने वो तोडा़ और उसी युवती का विवाह दूसरे अनुरूप वर के साथ ,युवक के साथ उन्होने विवाह करवा दिया । उसकी प्रसिद्धी नही की, आजकल Modern Fashion जो है , Propaganda , Image building  की,  थोडा सा काम करना और बहुत प्रसिद्धी करना ऐसा नही । लेकिन यह जो है सामाजिक कुरीति का विरोध चाहे बाल विवाह रहे ,चाहे दहेज वाली प्रथा रहे, सभी बातों का ये मूल से विरोध है । किन्तु इसका एक Propaganda  कुछ लोगों ने तो ऐसा किया कि  Propagandaकरते जाना, काम कुछ नही करना । अपनी ऐसी पद्धति नही रही । सामाजिक समरसता पहले से ही थी ।. लोगो ने खासकर  के महाराष्ट्र के, एक ऐसा वायुमंडल निर्माण किया और हमारे विजय गिरकर ने उसका उल्लेख भी किया कि गुरूजी और बालासाहब दो ध्रुव के समान एक बिलकुल Orthodox और एक बिलकुल Progressive  गलत बात है । बहुत पहले 7 अक्टुबर 1945 को महाराष्ट्र में एक सुप्रसिद्ध अंतरजातीय विवाह हुआ । नवले- करपे ऐसा विवाह था । अंतरजातीय था । उस अंतरजातीय विवाह के लिए शुभेच्छा और आशीर्वाद भेजेने वालों में महात्मा गांधी  और  सावरकर जी के साथ श्री गुरूजी का भी शुभेच्छा संदेश उस विवाह के लिए था जो उन्होने ही सारा छपवाया था । 7 अक्टुबर 1945 की बात है । इतना है कि Progressive लोगों के समान उसका डिम-डिम बजाना अपनी पद्धति में नही है । तो सिद्धांत मूल से लेकिन परिस्थिति  की आवश्यकता के अनुकूल और thrust के रूप में देना यह काम बालासाहब के समय हुआ और  वो उन्होने बहुत ही सक्षमता के साथ किया यह हम जानते है । हम जानते है कि कठिन परिस्थिति में भी बालासाहब ने इतना संतुलन भी रखा और आग्रह भी छोडा नही । सवर्ण लोगों को बताया कि तुमने दशको तक – शतकों तक दलित बंधुओं के साथ अन्याय किया है । अत्याचार किया है और पहली बार जब वो आरक्षण का सवाल खडा़ हुआ था- अभी तो आरक्षण के सवाल ने केवल Political Character लिया है- पहली बार जब आरक्षण का सवाल खडा़ हुआ था उस समय उन्होने स्पष्ट कहा कि, आरक्षण के बारे में सोचते समय हर एक सवर्ण हिंदु के मन में यह कल्पना करनी चाहिए कि यदि उस दलित जाति में मेरा जन्म होता – जिस दलित जाति पर शतकों तक अन्याय हो रहा है- तो मेरी मन: स्थिति? क्या होती ? मेरी प्रतिक्रिया क्या होती ? यह कल्पना मन में करके फिर आरक्षण के प्रश्न पर विचार करो ऐसा उन्होने उस समय कहा । सभी सामाजिक प्रश्नों के बारे में अभी वसंत व्याख्यान माला का उनका जो भाषण है उसका भी उल्लेख हुआ । राष्ट्र सेविका समिति का अखिल भारतीय सम्मेलन नागपुर में था उस समय अंतरजातीय विवाह का उन्होने प्रतिपादन किया । दहेज वगैरह कुरीतियों के खिलाफ वो हमेशा बोलते रहे और सामाजिक समरसता यह विषय उनके मन में कितना था, सरसंघचालक बने Officially घोषित भी हुआ । प. पू. श्री गुरूजी ने लिखा था कि  ततीय सरसंघचालक पद का ग्रहण करना तो मासिक श्राद्ध के समय वह होने वाला था । Official सरसंघचालक पद ग्रहण करने के लिए जाते समय मंच पर जाने के पहले महात्मा फूले इनकी प्रतिमा को पुष्पहार समर्पण किया, उनको वंदन किया और उनका आशीर्वाद लेकर मंच पर गये और फिर वहाँ उन्होनें सरसंघचालक पद का ग्रहण घोषित किया यह दिखता है कि किस तरह उनके मन में इस विषय में एकात्मता थी । यह एकात्मता ,जो- जो राष्ट्र पुरूष है, सबके मन में रही । अभी जो कहा विजय गिरकर ने डॉ. आम्बेडकर जी के बारे मे। पाश्चात्य देशों  में सिद्धान्त त्रयी  का बोलबाला है । Liberty , Equality, Fraternity  स्वातंय, समता-बंधुता पू. डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने कहा कि मैं इन सिद्धान्त त्रयी को मानता हूँ । किन्तु ऐसा कोई न समझे कि मैनें ये सिद्धान्त त्रयी, फ्रेंच राज्य क्रांति से उठाई है , नही ! मेरी प्रेरणा फ्रेंच  राज्य क्रांति से नही है, ये सिद्धान्त त्रयी मेरे गुरू भगवान बुद्ध से उठायी है और जहाँ तक पाश्चात्य  देशों का सवाल है, पू. डॉ. अंबेडकर जी ने कहा पाश्चात्य देश तो इसको  Implement नही कर सके । घोषणा की स्वातंत्र्य, समता-बंधुता । स्वातंत्र्य की स्थापना की तो समता बिगड गयी । समता की स्थापना करने गये तो स्वातंत्र्य  खत्म हो गया । स्वतंत्रता और समता दोनों एक साथ नही चला सके इसका कारण ? अंबेडकर जी ने इसका कारण यह कहा कि तीसरा जो फैक्टर है बंधुता, इसका तो उदय ही नही हुआ-, इसका निर्माण ही नही हुआ और उन्होन साफ कहा जब तक बंधुता निर्माण नही होती तब तक स्वातंत्र्य और समता दोनो साथ- साथ जिंदा नही रह सकते और फिर उन्होने कहा कि इसी बंधुता को, मै ”धर्म” यह संज्ञा देता हूँ । ऐसा पू. अंबेडकर जी ने कहा । जिसको उन्होने ”धर्म” यह संज्ञा दी, जिसको बंधुता ऐसा उन्होने  कहा, वही अभिप्राय समरसता  इस शब्द का पू. बालासाहब देवरस का है ।

तो यह  संदेश सभी राष्ट्र परूषों ने दिया है । बिलकूल महात्मा फुले हो, अंबेडकर जी हो, साहू छत्रपती हो, राजाराम मोहन राय, केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर हो, स्वामी दयानंद जी, लाला हंसराज जी, स्वामी श्रद्धानंद हो, गुरू देव नारायण गुरूस्वामी  केरला  के हो, सभी लोगो ने यह समरसता का संदेश दिया । लोग भूल जाते है – public memory is short उसको फिर से उज्वल करने के लिये हमारे मा. शषाद्री जी ने कहा कि बालासाहब की स्मृति में यह जो मासिक स्मृति दिन होगा  ”सामाजिक समरसता दिन” इस नाते हमको मनाना चाहिये । तो सभी  लोगों की यह जो परंपरा है । उसी परंपरा में सामाजिक समरसता का संदेश  पू. बालासाहब देवरस का है । इसको हम ध्यान में रखे और यहाँ से जाते समय हम निश्चय करें  कि यह सामाजिक समरसता हम अपने जीवन में लायेंगे और इसका संदेश जहाँ जहाँ हमारा प्रवेश है ,एसे सब लोगों को यह संदेश पहुँचायेगें, उतना हम प्रण करें । इतना ही इस समय कहना पर्याप्त है ।

(16 जुलाई 1996 को मुंबई में श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी  द्वारा दिया गया भाषण ।)

आदर्श आत्मविलोपी मोरोपंत पिंगले -Sri Moropant Pingle by Dattopant ji

आदर्श आत्मविलोपी मोरोपंत पिंगले – दत्तोपंत ठेंगड़ी

मोरोपंत जी के गौरव समारोह में यद्यपि आज मैं सहभागी हो रहा हूँ फिर भी कृपया ऐसा न समझिये कि मैं भी उन्हीं के समान पुराना और अच्छा स्वयंसेवक कार्यकर्ता हूँ । ऐसी अगर कोई कल्पना करता होगा तो मुझे एक दृष्टि से आनंद होगा कि स्वयं असत्य कथन न करने पर भी मेरे विषय में अगर ऐसा संभ्रम फैलता होगा तो वह अच्छा ही है । लेकिन सच बात तो यह है कि मैं इतना पुराना और सच्चा कार्यकर्ता नहीं हूँ । हमारे छोटे से गाँव में दो शाखाएँ चलती थी। लेकिन मैं जब हाईस्कूल में था तब ‘ज्यादा बुद्धिमान्’ था । अत: शाखा में जाने की गलती मैंने कभी नहीं की । हमारे बाबूराव पालधीकर नाम के शिक्षक कभी कभी पास की शाखा में जानबूझकर ले जाते थे, तब मैं शाखा में जाता था । किन्तु स्वयं होकर कभी नहीं गया ।

मुझे स्मरण है कि उस समय मैं और मेरे कई मित्र बाबूराव पालधीकर के आने पर उन्हें कैसे टालते थे, कौन सी चाल चलने से उन्हें टाला जा सकेगा, इसके लिए ही बुद्धि का उपयोग करते थे । उस समय शंकर राव उपासभामा तोल्हारी नाम के एक उत्कृष्ट कार्यकर्ता उस शाखा के लिए मिले थे । वे जब शाखा का उत्कृष्ट कार्य करते थे तब हम पालधीकर जी को टालने हेतु क्या करना है, इस बारे में विचार करते थे । आगे महाविद्यालय की पढ़ाई के लिए मैं नागपुर आया । मेरा और मोरोपंत जी का महाविद्यालय एक ही था । ‘मॉरिस’ नाम का । हमारा मॉरिस कॉलेज उन दिनों का बड़ा प्रगतिशील और रोमांटिक ऐसा माना जाता था । मेरा शाखा  में न जाने का रवैया वहाँ भी मैंने चालू रखा था । हमारे कॉलेज में ऐसे जो शाखा में न जाने वाले रोमांटिक  युवा थे  ? उनका ग्रुप हुआ करता था।

और कभी टहलने जाना, पिक्चर जाना,  ऐसी प्रगतिशील बातें हम करते थे । टहलते समय उन दिनों यदि रास्ते की बाजु  में शाखा चलती दिखाई देती तो हम बड़ा अशिष्ट आचरण करते थे । परसर की और देखकर हम विविध प्रकार के भाव प्रकट करते थे। ‘इन्हें  बुद्धी नहीं इसलिए ये दण्ड (लाठी) चला रहे हैं’, ऐसी बात विभिन्न प्रकार के चेहरे,  हाव भाव (नाट्‌याभिनय) कर हम बताते थे । हम जब ऐसा आचरण करते थे तब उन दिनों में मोरोपंत शाखा चलाते थे । यानि उनमें और मुझमें   कितना अंतर है यह आपके ध्यान में आएगा ।

फिर भी अगर लोग यह समझेंगे कि मोरोपंत जैसा पुराना और अच्छा स्वयंसेवक कार्यकर्ता मैं हूँ, तो मुझे आनंद होना स्वभाविक नहीं होगा क्या?

मोरोपंत और मैं….हम जब कॉलेज में एकत्र थे तब भी वे शाखा के कर्मठ कार्यकर्ता और हम प्रगतिशील, ऐसा ही था । शाखा में जाने वाले हमारे स्वयंसेवकों की मानसिकता की ओर हम बहुत चिकित्सक व क्रिटिकल दृष्टि से देखते थे । उनमें कुछ सदस्य महाकर्मठ थे । हम लोगों से बात करते समय उनके मन में हमारे प्रति एक तुच्छता का भाव रहता था कि ये गैर जिम्मेवार हैं, इन्हें देश के बारे में कोई चिंत्ता नहीं । जिसे अंग्रेजी भाषा में होलिअर-दॅन-दाउ एटिट्यूड (holier than thou attitude) ऐसा कहा जाता है । ऐसी उनकी मनोवृत्ति थी । हम आपसे बहुत अधिक पवित्र हैं । ऐसा भाव जब उनके मन से प्रकट होता था तब उनके बारे में दूरत्व की भावना हमारे मन में तीव्र हो जाती थी ।

उस समय मोरोपंत की विशेषता यह थी कि अन्यों के समान वे कर्मठ थे फिर भी हमारे ग्रुप के लोगों से वे मिलते थे और जब हम लोगों के साथ वे रहते तब हमारे समान ही व्यवहार करते थे । हमारे जो विषय रहते वे ही उनके भी रहते । हमारे समान वे भी हँसी मजाक करते थे । इसलिए हम लोगों से वे कोई अलग हैं ऐसा हमें कभी भी लगा नहीं । यह उनका गुण उस समय प्रकट हुआ और उनके इस प्रकार के आचरण से हमे लगने लगा कि मोरोपंत पिंगले सरीखा व्यक्ति अगर हमारे में पूर्णत: घुलमिल गए तो कोई हरकत नहीं । अनुभव लेकर देखें ऐसा सोचकर शाखा में जाने का विचार मन में आया, अलौकिक नोहावे लोकांप्राते, यही मोरोपंत के स्वभाव की विशेषता है ।

तब से जो हमारे संबंध प्रारंभ हुए थे, वे बहुत दृढ़ हो गये । इतने दृढ हुए कि कॉलेज में हमने एकत्र पढ़ाई की (कंबाइंड स्टडी) । उन्हीं के घर। उन्हीं के खर्चे से हम ‘ब्रेकफास्ट’ लेते थे और इतने निकट संबंधो के कारण हमने कभी भी गंभीरता से चर्चा नहीं की । एक-दूसरे की हँसी-मजाक उड़ाना, चेष्टा-कुचेष्टा, मसखरी इत्यादि मित्र के नाते हम करते आए हैं । अनेक बार मैंने यह देखा है कि हम दोनों एकत्र आए तो सामने के स्वयंसेवकों को ऐसा लगता था कि ये श्रेष्ठ लोग बैठे हैं, कुछ तो भी राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय वार्ता करने में मग्न हैं । किन्तु प्रत्यक्ष में हम आपस में हँसी-मजाक ही करते रहते थे । ऐसी हमारी मित्रता होने के कारण जब मोरोपंत के बारे में मुझे कोई पूछते हैं, तो मुझे भगवद्‌गीता का वह श्लोक याद आता है जो ग्यारहवें अध्याय में विश्वरूपदर्शन होने के बाद अर्जुन ने भगवान से कहा है कि ”तू हमारा मित्र ही है, ऐसा समझकर  हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र, मैंने तुझे तू कहकर बुलाया होगा, तेरी श्रेष्ठता कितनी बड़ी है; यह न जानते हुए शायद मेरी यह भूल हुई होगी अथवा प्रेम के कारण मैं भूल गया हूंगा, इसलिए मुझे माफ करना ।” अर्जुन ने जो उस स्थान पर कहा है, वैसे ही विचार मोरोपंत की ओर देखकर मेरे मन में भी उठते हैं । मोरोपंत का व्यक्तित्व याने एक श्रेष्ठ व्यक्तित्व, लेकिन सदा ही वे श्रेष्ठ है, इसकी सल (तपिश) हमें अनुभव नहीं हुई । चिड़िया के नाखून उसके पिलों को कभी घातक नहीं होते । वैसे ही उनके बड़प्पन की सल (तपिश) कभी भी स्वयंसेवक ने अनुभव नहीं की, यह जो उनकी विशेषता है उस दृष्टि से उनके जीवन का यदि हमने विचार किया तो मुझे ऐसा लगता है कि उसमें से सीखने लायक बहुत है । उनके जीवन के विषय में बहुत सी जानकारी प्रसिद्ध हुई है । मैंने भी भिन्न भिन्न वृत्तपत्रों से, साप्ताहिकों से उनके जीवन के बारे में जानकारी पढी है। मुझे भी थोड़ी जानकारी है । लेकिन बहुत सी बातें ऐसी हैं कि जो शायद बाहर प्रकट होगी भी नहीं । हम आपातकाल के समय एकत्र काम करते थे । उस समय उन्होंने जो कार्य किया वह तीस वर्षों के  बाद ही प्रकट होने लायक हैं । क्योंकि गुत्था-गुत्थी वाली बहुत बातें उसमें थी ।अलग-अलग नेताओं से संबंध, भिन्न भिन्न अधिकारियों से संबन्ध…. .जिनके बारे में आज कहा नहीं जा सकता ऐसी ये अनेक बातें हैं । इंगलैंड में एक ऐसी पद्यति है कि तीस वर्षो के बाद सरकार के पुराने रिकार्डस प्रकाशित किये जाते हैं । मुझे ऐसा लगता है कि तीस सालों के बाद जिन बातों के रिकॉर्डस भविष्य में आ सकेंगे ऐसी बातें उनके हाथों से घटी हैं ।

वैसे तो उनके कर्तृत्व के बारे में बहुत सी बातें सुनी हुई हैं । कब कहाँ संघ की विभिन्न जिम्मेदारियाँ उन्होंने संभाली है यह हम सब जानते हैं । विश्व हिन्दू परिषद् के उनके कार्य भी हमें मालूम हैं । हमें यह भी मालूम है कि हिन्दुत्व का यह जो प्रभाव बढ़ा, हिन्दुत्व के प्रभाव ने जो यह उड़ान ली है उसके मूल में इन्हीं की प्रतिभा है । शिलापूजन हो, कारसेवा हो, जो जो इस प्रकार के उपक्रम हुए उनमें कभी इनका नाम बाहर नहीं आया । इस कार्यक्रम के संयोजक कौन हैं, इसकी रचना, योजना किसने की है उनका नाम बाहर नहीं आया । परन्तु, इन्हीं योजनाओं में से हिन्दुत्व ने लंबी छलाँग लगाई है और ये सारी योजनाएँ मोरोपंत की प्रतिभा में से ही स्फुरित हुई थीं, यह हम सभी को मालूम है ।

विश्व हिन्दू परिषद के माध्यम से उन्होंने किए हुए इन कार्यक्रमों के अलावा उन्होंने अन्यान्य अनेक संस्थाओं को जन्म दिया है, व्यक्तियों को प्रोत्साहित किया है । उनके कार्य की व्याप्ति कल्पनाओं की मर्यादाओं में नहीं सिमट सकती । कोई ऐसा न माने के हमें मोरोपंत के जीवन चरित्र की पूर्णत: जानकारी है । वह संभव नहीं । क्योंकि उनकी प्रतिभा बहुत श्रेष्ठ है । उन्होंने सैकड़ों लोगों को कार्य करने की प्रेरणा दी । हजारों लोगों का मार्गदर्शन किया है । सैकड़ों परिवारों में वे कुटुंब प्रमुख के नाते माने जाते रहे, इसकी जानकारी महाराष्ट्र के लोगों को पहले से ही है और बाहर के लोगों को अभी ज्ञात हुई है । इस प्रकार के व्यक्तित्व के बारे में, चरित्र के विषय में अपने को कभी न कभी पूरी जानकारी मिलेगी ऐसा नहीं मानना चाहिए । क्योंकि वे स्वयं कभी नहीं बताएँगे और प्रत्येक को उनके कर्तृत्व के एक दो या तीन ऐसे कुछ ही आयामों के बारे में जानकारी हो सकती है । उनके कर्तृत्व के सभी आयामों के बारे में संपूर्ण जानकारी रखने वाला एक भी व्यक्ति इस देश में तैयार होना यह एक बड़ी असंभव बात है । इतने आयाम उनके कर्तृत्व के हैं । अंग्रेजी में एक वाक् प्रचार है, ‘स्काय इज द लिमिट’ । मर्यादा (सीमा) कौन सी, आकाश यही मर्यादा (सीमा) है । वे स्वत: होकर कभी किसी को बताएँगे नहीं क्योंकि ऐसा बताना अपनी परंपरा में बैठता नहीं ।

मुझे याद है कि, आपातकाल में अशोक मेहता जी के पास मुझे जाना पड़ता था । भूमिगत होने के कारण त्वरित जाना आना संभव नहीं होता था क्योंकि गुप्तचर लगे रहते थे । इसलिए थोड़ा रुकना पड़ता था । उस समय वे अपनी पुरानी घटनाएँ बताते थे । एक बार मैंने उनको कहा कि, ‘अशोक भाई, आप अपना चरित्र लिखिए । आत्म चरित्र लिखने से नई पीढ़ी को जानकारी मिलेगी, मार्गदर्शन होगा । ‘उन्होंने मेरी ओर तुरन्त कटाक्ष किया और बोले,’मिस्टर ठेंगड़ी यू आर आर.एस.एस. ऑर्गेनाइजर’ मैंने ‘हाँ’ कहा । किन्तु उसका इससे क्या संबंध है? ऐसा मेरे कहने पर वे बोले, ‘संबंध है, अपनी परम्परा में यह बैठता है क्या? वेदों की इतनी ऋचाएँ हैं किन्तु उनके कर्ता ऋषियों का चरित्र कहाँ किसी ने लिखा है? उन्होंने आत्म चरित्र लिखा है क्या? अपनी ऐसी परंपरा है कि हम अपना जो श्रेष्ठ कर्तृत्व होगा वह समाज-चरणों में अर्पण करना और इस जगत् से विदा लेना’ । अशोक मेहता जी से मैंने जब यह सुना तब मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । श्री गुरुजी के मुँह से यदि सुना होता तो आश्चर्य नहीं होता, पर अशोक मेहता ऐसा कुछ बोलेंगे यह सोचा नहीं था । कहने का तात्पर्य यह है कि मोरोपंत अपना चरित्र स्वयं तो नहीं लिखेंगे और उनके सब आयामों के बारे में जानकारी रखनेवाला एक भी मनुष्य मिलेगा नहीं । किन्तु इस व्यक्तित्व के मूल्यांकन के बारे में भिन्न भिन्न लोगों की अलग अलग कल्पनाएँ उभर कर आ सकती हैं । हम दोनों का मित्र जैसा संघ में है वैसा ही संघ के बाहर भी है । इसलिए सबके साथ बोलने का प्रसंग आता है । चर्चा हुई उस समय एकात्मता यात्रा हो चुकी थी । शिलापूजन के निमित्त से विदेशों से भी शिलाएँ आना प्रारंभ हो चुका था और यह कल्पना मोरोपंत की है यद्यपि सबको मालम नहीं हुआ था कि फिर भी निकट के लोगों को यह मालूम था । तब वे मेरे और मोरोपंत के मित्र बोले,’यह कल्पना मोरापंत की है ऐसा कह रहे हैं तो क्या यह सत्य है? मैंने ‘हाँ’ कहा । तब वे बोले, ‘यह तो विश्व हिन्दू, का काम है । हिन्दुत्व और मोरोपंत ने यह कार्य हाथ में लिया याने हमने क्या यह समझ लेना चाहिए कि मोरोपंत धार्मिक व्यक्ति हैं? मैं चुप रहा । वे बोले, ‘मेरे मन में उनका यह कार्य देखकर एक प्रश्न आया, आप उसका सच उत्तर देवें, क्योंकि मोरोपंत स्नान, संध्या, ध्यान, धारणा, पूजा, अनुष्ठान आदि कुछ करते हैं क्या?’ मैंने कहा, ‘ मैंने तो देखा नहीं, करते भी होंगे चुपचाप, पर मैंने देखा नहीं ।’ फिर वे बोले- यह धार्मिक व्यक्ति है ऐसा इन्हें कैसे कहा जाएगा? संघ का प्रचारक, संघ का कार्यकर्ता इस नाते मोरोपंत का व्यक्तित्व उसका मर्म जिसने संघकार्य को समझा, डॉ हेडगेवार का कार्य समझा है, उसी के समझ में आ सकता है । जिसने संघ और परमपूज्य डॉ हेडगेवार का जीवन समझा नहीं है उसे मोरोपंत का जीवन, व्यक्तित्व और प्रचारकों के व्यक्तित्व का आंकलन होना बहुत कठिन है । इसलिए मैंने चुप्पी साधी । मैंने चुप्पी साधी देख वे बोले, आप कछ भी कह लो, आपके मोरोपंत पिंगले इज एन एनिग्मा, एक अनाकलनीय  व्यक्तित्व है ।’ मैंने कहा, ‘ऐसा नहीं।’ हम सब को पता है कि विश्वामित्र और अन्य ऋषियों ने जो यज्ञ किया वह धर्म ही था । किन्तु यज्ञ ध्वस्त करने वाले राक्षसों को रोकने के लिए राम और लक्ष्मण धनुष-बाण लेकर गए । उन्होंने यज्ञ नहीं किया । लेकिन यज्ञ की रक्षा हेतु अगर वे धनुष-बाण लेकर गये तो राम और लक्ष्मण का कार्य उतना ही धार्मिक कार्य है और राम लक्ष्मण को भी उतना ही धार्मिक माना गया है । बाहर के व्यक्ति को यह समझ में आना सहज नहीं है । संघ के बारे में पूर्व में यही प्रश्न थे । यहाँ स्नान, संध्या सिखाते हैं क्या? गायत्री मंत्र सिखाते हैं क्या? ध्यान धारणा करते हैं क्या? कुछ भी करते नहीं होंगे तो इन्हें हिंदू धर्म रक्षक कैसे कहना? यह प्रश्न संघ में भी पहले कुछ लोगों ने उपस्थित किया ।

हमने यह समझ लेना चाहिए कि धर्म का संरक्षण याने धर्म का पालन नहीं । धर्म का पालन श्रेष्ठ तो है ही । इसीलिए शंकराचार्य, अन्यान्य संत, बल्लभाचार्य, महामंडलेश्वर आदि सभी का अपना एक स्थान है । उसी प्रकार से धर्म संरक्षण में ये जो लोग हैं जैसे अशोक सिंहल , मोरोपंत पिंगले हों, इनके भी अपने अपने स्थान हैं, उन्हें उस दृष्टि से धार्मिक पुरुष कहना चाहिए । यदि राम-लक्ष्मण धार्मिक होंगे, यज्ञ का संरक्षण करते होंगे तो ये लोग भी उतने ही धार्मिक हैं । ऐसा यदि हमने कहा तो भी उसे कितना समझा होगा, मान्य हुआ होगा, यह कह नही सकते । किन्तु उसका वाक्य मेरे ध्यान में रह गया कि, ‘मोरोपंत पिगले इज एन एनिग्मेटिक पर्सन (enigmatic person) अनाकलनीय व्यक्तित्व है । वह प्रचारकों की विशेषता ही है । बाहर का व्यक्ति इसे समझ नहीं सकेगा । मा. बाबासाहेब आपटे, मा. दादा साहब परमार्थ… … …. ..प्रचारकों के सबके नाम लेना हो विष्णुसहस्त्रनाम से भी बड़ी मालिका तैयार होगी । उन सभी ने बहुत कार्य किया किन्तु प्रसिद्धि के पीछे वे दौड़े नहीं । संस्था को जो थोड़ी बहुत प्रसिद्धि आवश्यक होती बस उतनी ही । लेकिन प्रसिद्धि की आस न रखते हुए शांति से परदे के पीछे रहकर कार्य करना दूसरों को आगे करना उन्हीं को श्रेय देना यही उन सब की मानसिकता रही है ।

इस बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में हिन्दुत्व का इतिहास यदि लिखा गया तो उसमें मोरोपंत पिंगले यह नाम स्वर्णाक्षरों से लिखा जाएगा । इतनी बड़ी उड़ान उनकी प्रतिभा के कारण संभव हुई है । फिर भी उन्होंने प्रसिद्धि की आस नहीं की । अन्यों को वह मौका दिया । इतना कार्य जहाँ पर किया है, वहाँ अपना कोई अखंड स्थान हो इसका आग्रह नहीं किया । धार्मिक जीवन हो अथवा राजकीय अपने जहाँ-जहाँ काम करेंगे  वह वहाँ तुरन्त अपना एक गुट तैयार करना, अपनी नित्य चापलूसी  करने वालों का एक गुट बनाना ऐसी एक सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति रहती है । किंतु मोरोपंत पिंगले ने ऐसा नहीं किया । विश्व हिंदू परिषद का यह प्रचंड कार्य नि: स्पृहता से छोड़ दिया और दूसरे कार्य की और बढे। यह प्रचारक की विशेषता है । संघ की पद्धति में से यह आई है । पू. डॉक्टर जी के जीवन से आई इस मनोवृत्ति को ही ‘आत्मविलोपी वृति’ कहते हैं ।

लोगों को ऐसा जो लगता है कि शक्ति प्रसिद्धि के कारण निर्मित होती है यह सत्य नहीं है । कुछ क्षेत्रों में प्रसिद्धी आवश्यक होती है । यह यद्यपि सत्य है किन्तु ध्यान में रखना होगा कि प्रसिद्धि के कारण एक माहौल मात्र बनता है । जो स्थायी नहीं रहता । अब क्लिंटन का ही उदाहरण देखिए । चुनाव के समय की उनकी इतनी सुंदर प्रतिभा बनाने का प्रयत्न हुआ कि वे राष्ट्राध्यक्ष पद पर चुनकर आए । लेकिन आज दो वर्ष बीतने पर उनकी लोकप्रियता का स्तर एकदम नीचे आ गया है । राष्ट्रनिर्माण के कार्य के समान कोई एक कार्य खडा करना हो तो प्रसिद्धि यह विश्वास की कसौटी हो नहीं सकती। इसके लिए आवश्यक है, प्रसिद्धि की जरासी भी आस न करते हुए, ध्येय प्राप्ति के लिए सवार होने वाले पागलपन से प्रेरित होकर, सालों साल कार्य में लगे रहने की प्रवृत्ति। श्रीगुरूजी के निर्वाण के बाद उनके जो पत्र प्रसिद्ध हुए उनमें से एक पत्र में उन्होंने कहा कि ‘मेरा स्मारक न बनाएं’ सबको आश्चर्य हुआ। किन्तु यह कोई एक क्षण में मन को सूचित करने वाला विचार था ऐसा नहीं। सम्पूर्ण जीवन भर में उनका यह विचार ओत-प्रोत भरा हुआ था। आपस में होनेवाले घरेलू बातचीत के समय मैंने तीन-चार प्रसंगों पर उन्हे एक अंग्रेजी कविता के माध्यम से आत्मविलोपी वृत्ति का वर्णन करते हुए सुना। अलेक्जेण्डर पोप की कविता है ‘Ode to Solitude’ ऐसा उस कविता का नाम है उसमें एक कड़ी ऐसी है कि,

“Thus let me live unseen, unknown.

Thus unlamented let me die.

Steal from the world,

And not a stone to tell where I lie.”

जगत् की दृष्टि में न आते हुए और जगत् को मालूम न होते हुए मुझे जिंदा रहने दो। मेरी मृत्यु भी ऐसी हो जिस पर कोई शोक न कर सके। यानि लोगों को पता ही न चले। जहाँ मुझे गाड़ दिया जाएगा वहाँ वैसा मालूम करा देने वाला पत्थर भी न रहे। ऐसा अलेक्जेण्डर पोप ने कहा है। यह कविता मैंने पूजनीय गुरुजी को तीन-चार बार बहुत उद्‌धृत करते हुए सुनी है। ऐसी आत्मविलोपी वृत्ति होगी तो ही उसमें से प्रभावी संगठन निर्माण होगा।

मुझे एक प्रसंग याद आता है। बाबा साहेब अम्बेडकर के अन्तिम दिनों में उनके सहवास में रहने का योग आया। जो धर्मांतर हुआ, उसके, पूर्व रात्रि में श्याम हॉटल में अपने कार्यकर्ताओं से वे बात करते थे ,और अनौपचारिक ऐसी बातें चल रही थीं। एक कार्यकर्ता ने पूछा कि, ”बाबा, हमने अपने जीवन में देखा है कि कई संस्थाएँ ऊपर उठती हैं और नीचे  आती हैं ऐसा क्यों होता है। बाबा साहेब बोले कि ‘इस प्रश्न का उत्तर मैं कैसे दूँ? दो हजार साल पहले भगवान बुद्ध ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है । सबको लगा कि यह ‘स्लिप ऑफ टंग’ है । कहीं तो भी बोलने में गलती से यह भूल हुई है । तो उदासीनता जहाँ होगी वहाँ काम बढ़ेगा । उदासीनता नहीं होगी तो काम गिरेगा । कुछ तो भी बोलने में गलती हुई ऐसा सबको लगा । बाबा के ध्यान में यह बात आई । वे बोले, ‘भाई ऐसा  है कि आप के मन की भावना मेरी समझ में आए किन्तु यह ‘स्लिप ऑफ टंग’ नहीं । फिर वह भिन्न अर्थ क्या है? वे बोले, ”एकाध काम नए सिरे से शुरू होता है । उस समय उस ओर कोई ध्यान नहीं देता । कुछ थोड़े लोग उसमें रस लेते हैं । वे काम करने लगते हैं तब अन्य लोग उदासीनता से देखते हैं । तुच्छता से देखते हैं । तब कुछ लोग निराश होकर वह काम करना छोड़ देते हैं । जबरदस्त विरोध होने से कुछ लोग काम छोड़ देते हैं । तथापि कुछ लोग जिद्‌द से तत्वनिष्ठ, ध्येयनिष्ठ होकर काम को आगे चालू रखते हैं और देखते देखते काम इतना बढ़ता है कि यश का शिखर सामने दिखने लगता है । जब तक यह यश का शिखर सामने आया हुआ नहीं दिखता, तब तक सब लोग स्वयं को भूल कर, आत्म केन्द्रितता छोड़ पूर्ण ध्येयनिष्ठा से सतत काम करते रहते हैं । लेकिन जब यश का शिखर सामने दिखने लगता है तब मन विचलित होता है और फिर बहुत लोगों के मन में ऐसी इच्छा निर्माण होती है कि यह जो यश है उसमें मेरा हिस्सा कितना, मेरे श्रेय का भाग कितना है? बाबा साहब ने उसका नाम दिया, ‘क्रायसिस ऑफ क्रेडिट शेयरिंग’ । मिलने वाली सफलता में कितना हिस्सा मेरा है, उस पर से स्पर्धा प्रारंभ होती है । ऐसी स्पर्धा जब शुरू होती है उस समय सगंठन के प्रमुख प्रणेता भी अगर उस स्पर्धा में दौड़ने लगे तो वह संस्था पतित होगी, नीचे आयेगी । किन्तु उन्होंने अगर श्रेय के हिस्से की उपेक्षा की तो फिर वह कार्य, वह संगठन वृद्धि किए बिना नहीं रहेगा । ऐसा बुद्ध के कथन का अर्थ था, इस प्रकार उन्होंने बताया । मुझे ऐसा लगता है कि संघ में जिसे हम आत्मविलोपी वृत्ति कहते हैं । उसका भी अर्थ यही है । इतने बड़े-बड़े काम किये तो भी श्रेय नहीं लेना ।

प.पू. डॉक्टर जी के जीवन में हम क्या देखते हैं? 1925 में संघ प्रारंभ हुआ । संघ के प्रयत्नों के कारण ऐसी एक शक्ति निर्माण हुई, गट निर्माण हुआ, नियुक्लियस निर्माण हुआ । हिन्दू समाज ने कभी न दिखाया होगा इतना साहस, दंगे के समय दिखाया । किन्तु उसकी प्रशंसा जब बाहर होने लगी तो डॉक्टर साहब कहते थे कि कोई भी काम संघ ने नहीं किया, हिन्दू समाज ने किया । संघ याने हिन्दू समाज, हम एक हैं । श्रेय नहीं लेना, यह जो आत्मविलोपी वृत्ति है उसका उत्कट आविष्कार मा. मोरोपंत में देखते आए है । अब उन्होंने लोगों के आग्रह के कारण कहिए अथवा विशेष परिस्थिति के कारण यह सम्मान स्वीकृत किया है । फिर भी उन्हें यह सब अच्छा नहीं लगता है, यह मैं जानता हूँ । यह संघ की कार्यपद्धति में बैठने वाली बात नहीं है । किन्तु कतिपय विशिष्ट कारणों से यदि मोरोपंत ने इसे स्वीकृति दी है तो उसके लिए हमने उनका आभार मानना चाहिए । उनके अनेक गुण हैं । कर्तृत्व के अनेक पहलू हैं । लेकिन सब स्वयंसेवकों ने, कार्यकर्ताओं ने जिन-जिन को राष्ट्र का गठन करना है ऐसे सभी ने सबसे महत्वपूर्ण तथा ध्यान में रखने लायक बहुत महत्व का गुण है । वह याने यह आत्मविलोपी वृत्ति ।

ऐसे आत्मविलोपी वृत्ति के लोग ही इतने लंबे समय तक अडिगता से, जीवटता से कार्य कर सकते हैं । यह आत्मविलोपी गुण हम में से प्रत्येक कार्यकर्ता स्वयं में अंगीकृत करने का निर्धारण करे यही मा. मोरोपंत जी का संदेश है, ऐसा मुझे कहना है । आत्मविलोपी होने से उत्कृष्ट सगंठित शक्ति और उस शक्ति में से हिन्दुत्व का परमवैभवशाली यश यही उनके जीवन का संदेश है । यह संदेश हम सब ध्यान में लाएं।

(‘वीर वाणी ‘ पत्रिका दीपावली अंक २००३ बेलगांव, कर्नाटक)

महामानव श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी – A Life Sketch of Sri Dattopantji Thengadi

महामानव का शब्दचित्र  – डॉ. रणजीत सिंह

प्रारम्भिक प्रसंग –

राष्ट्र ऋषि श्रद्धेय श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी का जन्म 10 नवम्बर, 1920 को, दीपावली के दिन, महाराष्ट्र के वर्धा जिला के आर्वी नामक ग्राम में हुआ। दत्तोपंत जी के पित्ताजी श्री बापूराव दाजीबा ठेंगड़ी, सुप्रसिद्ध अधिवक्ता थे, तथा माताजी, श्रीमति जानकी देवी, गंभीर आध्यात्मिक अभिरूची से सम्पन्न, साक्षात करूणामूर्ति, और भगवान दतात्रेय की परम भक्त थी। परिवार में एक छोटा भाई श्री नारायण ठेंगड़ी और एक छोटी बहन श्रीमति अनुसूया थी।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी की 11वीं तक की शिक्षा, आर्वी म्युनिशिपल हाई स्कूल में सम्पन्न हुई। बाल्यकाल से ही, उनकी मेधावी प्रतिभा तथा नेतृत्व क्षमता की चर्चा सब ओर थी। 15 वर्ष की अल्पायु में ही, आप आर्वी तालुका की ‘‘वानर सेना’’ के अध्यक्ष बने। अगले वर्ष, म्युनिशिपल हाई स्कूल आर्वी के छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गये। 1936 में, नागपुर के ‘‘मौरिस कॉलेज’’ में दाखिला लेकर अपनी स्नातक की पढाई पूरी की और फिर, नागपुर के लॉ कॉलेज से, एल. एल. बी. की उपाधि प्राप्त की। मौरिस कॉलेज में अध्ययन के दौरान, आप सन् 1936-38 तक क्रान्तिकारी संगठन ‘‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन असोसियेसन’’ से सम्बन्ध रहे।

संघ से संपर्क

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी अपने बाल्यकाल से ही, संघ शाखा में जाया करते थे। दिसम्बर, 1934 के वर्धा जिले के शीत शिविर में पहली बार परम पूज्य डॉक्टरजी के दर्शन किये और उनका उद्बोधन सुनने का  सौभाग्य मिला। हालांकी वह अनियमित स्वयंसेवक थे, फिर भी नागपुर आने के बाद अपने सहपाठी और मुख्य शिक्षक श्री मोरोपंत जी पिंगले के सानिध्य में, दत्तोपंत जी ने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संघ शिक्षा वर्गों का तृतीय वर्ष तक का शिक्षण क्रम पूरा किया। 1936 से नागपुर में अध्यनरत रहने तथा माननीय मोरोपंत जी से मित्रता के कारण दत्तोपंत जी को परम पूजनीय डॉक्टर जी को प्रत्यक्ष देखने, सुनने का अनेक बार सौभाग्य प्राप्त हुआ। आगे चलकर परम पूजनीय श्री गुरूजी का अगाध स्नेह और सतत मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

प्रचारक जीवन का प्रारम्भ

दिनांक 22 मार्च 1942 को संघ के प्रचारक का चुनौती भरा दायित्व स्वीकार कर आप सुदूर केरल प्रान्त में संघ का विस्तार करने के लिए ‘‘कालीकट’’  (Kozhikode) पहुंचे। 1942 से 1945 तक रा. स्व. संघ प्रचारक के नाते यशस्वी कार्य खड़ा करने के साथ ही, 1945 से 1947 तक, कलकत्ता में, संघ के प्रचारक के नाते, तथा 1948 से 49 तक बंगाल.असम प्रान्त के प्रान्त प्रचारक का दायित्व सम्पादन किया। इस समय राष्ट्रीय परिदृष्य में,भारत विभाजन, तथा पूज्य महात्मा जी की हत्या से उत्पन्न परिस्थितियों का बहाना बनाकर संघ पर आरोपित प्रतिबंध और देशभक्तों द्वारा अन्यायकारी प्रतिबंध के विरूद्ध देशव्यापी सत्याग्रह, इसी बीच जून माह में,सरकार के साथ बातचीत का घटनाक्रम तेजी से घटा और श्री वेंकटराम शास्त्री की मध्यस्थता में, सरकार ने संघ पर लगाया गया प्रतिबंध वापिस लिया। ऐसे चुनौती पूर्ण समय में, श्रद्धेय दत्तोपंत जी को बंगाल से वापिस नागपुर बुला लिया गया।

विद्यार्थी परिषद् की स्थापना

9 जुलाई, 1949 को अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना की औपचारिक घोषणा हुई। और, दत्तोपंत जी को,विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य तथा नागपुर विदर्भ के प्रदेशाध्यक्ष के नाते जिम्मेदारी दी गई। श्री दत्ताजी डिडोलकर को महामंत्री तथा बबनराव पाठक को संगठन मंत्री का दायित्व दिया गया।

विद्यार्थी परिषद् ने नागपुर-विदर्भ में सरकार के साथ अच्छे संबंध स्थापित किये। मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, अर्थमंत्री, राज्यपाल आदि सभी को  अपने उत्सवों में बुलाने का क्रम विद्यार्थी परिषद् ने जारी रखा। अन्नमंत्री गोपाल राव काले के नेतृत्व में जो अधिक अन्न उपजाओ अभीयान चल रहा था, विद्यार्थी परिषद् ने पूरी शक्ती के साथ उसका समर्थन किया पूरे प्रदेश में जन-जागरण की दृष्टी से कार्यक्रम हुये। बडोदा,  फेटरी और गुमथला में सरकारी योजना के अन्तर्गत कम्पोस्ट खाद तैयार करने के यशस्वी प्रयोग भी हुये। प्रादेशिक सरकार ने भी एक डॉक्युमेन्ट्री के द्वारा विद्यार्थी परिषद् के इन प्रयासों को उचित प्रसिद्धी दी।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी के शब्दों में, “हमारी कार्यकारिणी ने कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर सुयोग्य व्यक्तियों के भाषण विद्यार्थीयों के लिये करवाने का विचार किया। नियमित अभ्यासक्रम में आने वाले महत्वपूर्ण विषयों पर सुयोग्य प्राध्यापकों के भाषण करवाये गये। अभ्यासक्रम के बाहर  भी कुछ महत्वपूर्ण विषयों की जानकारी विद्यार्थीयों को हो यह विचार कार्यकारिणी ने किया। इस हेतु जो विषय चुने गये उनमें एक था “मध्यप्रदेश मजदूर आन्दोलन का इतिहास” इस विषय के संबंध में प्रादेशिक इंटक के अध्यक्ष श्री पी. वाय. देशपाण्डे इनके साथ मैं बात करूं यह तय हुआ। तद्नुसार मैं उनके पास गया, वैसे उनके साथ हमारा पारिवारिक संबंध था। आज हरिजन सेवक संघ की अध्यक्षा और राज्यसभा सदस्य कुमारी निर्मला देशपांडे के वे पिताजी थे। मैंने अपना विषय उनके सामने, उन्होंने गुस्से में आकर कहा कि, “यह सारी फिजूल बातें रहने दो, आज देश के मजदूर क्षैत्र पर सबसे बड़ा संकट कम्युनिस्टों का है। वे मॉस्को के                          पिट्ठू है। मजदूर क्षैत्र में उनके प्रभाव को रोकना आवश्यक है। इस दृष्टी से तुम स्वयं इंटक में आ जाओ, और यहाँ कुछ जिम्मेदारी का वहन करो।“ मैंने कहा कि इस विषय में मैं गम्भीरता से सोचूगाँ।

वापिस आने के बाद परम पूजनीय श्रीगुरुजी को यह बात बताई। मैं तो व्यक्तिगत रूप से इंटक में जाना पसंद नहीं करता था। क्योंकि इंटक के सभी नेता संघ को गांधी हत्यारा, ऐसा कहते हुये निन्दा करते थे। ऐसे लोगों में जाकर मैं कैसे काम कर सकूंगा ?

किन्तु श्रीगुरुजी की प्रतिक्रिया देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि श्री पी. वाय. देशपांडे का निमंत्रण यह हमारे लिये सुवर्ण अवसर है। मैं भी चाहता हूं कि अपने पास ऐसे भी कार्यकर्ता रहे जो मजदूर क्षैत्र में काम करने की पद्धती को जानते हो। इसलिये इस निमंत्रण को तुम स्वीकार कर लो और विद्यार्थी परिषद् के साथ ही इंटक में काम करो।

कुछ दिनों के बाद श्री देशपांडे जी ने मुझे बताया, की मुझे निमंत्रण देने का सुझाव गृहमंत्री श्री द्वारकाप्रसाद जी मिश्र का था। मेरे सभी कार्यों पर उनकी दृष्टी थी। इंटक में उस समय दो गुट हो गये थे। एक मिनिस्टेरियल और दूसरा एंटी मिनिस्टेरियल, एंटी मिनिस्टेरियल गुट के प्रमुख डॉ. डेकाटे थे। वे कुशल संगठक थे।उन्होंने इंटक में अपना प्रभाव बढ़ाया था। उनकी तुलना में दूसरा कोई भी कुशल संगठक  मिनिस्टेरियल गुट में नहीं था। इस कारण मिनिस्टेरियल गुट कमजोर हो गया था। इसके लिये क्या किया जाये यह चर्चा श्री देशपांडे जी और द्वारकाप्रसाद जी इनमे हुई। इस चर्चा में द्वारकाप्रसाद जी ने कहा कि, देशपांडे जी मुझे इंटक में निमंत्रित करे। उन्होंने यह भी विश्वास प्रकट किया कि यह व्यक्ति डॉ. डेकाटे का मुकाबला सफलतापूर्वक कर सकेगा। इस पार्श्वभूमी पर देशपांडे जी ने मुझे आमंत्रित किया।“ (स्मृतिगंध पृष्ठ संख्या – 6) 

 परम पूज्य श्री गुरुजी की इच्छा और मजदूर क्षैत्र में प्रवेश –

1949 में ही परम पूजनीय श्री गुरूजी ने, श्रद्धेय दत्तोपंत जी को, मजदूर क्षेत्र का अध्ययन करने को कहा। इस प्रकार दत्तोपंत जी के जीवन में एक नया अध्याय प्रारम्भ हुआ। ऐसा लगता है, मानो, मजदूर आन्दोलन दत्तोपंत जी के लिये ईश्वर प्रदत कार्य था। विद्यार्थी परिषद के जन-जागरण कार्यक्रमों के दौरान, कांग्रेस से सम्बन्धित, इण्डियन नेशनल ट्रेड युनियन कांग्रेस (इंटक) के प्रदेश अध्यक्ष श्री पी. वाय. देशपाण्डे जी से अच्छा सम्पर्क आया था। उसी का लाभ लेते हुए दत्तोपंत जी ने इंटक में प्रवेश किया। अपनी प्रतिभा और संगठन कौशल के बल पर थोड़े समय में ही इंटक से सम्बधित नो युनियनों ने, श्रद्धेय ठेंगड़ी जी को, अपना पदाधिकारी बना दिया। अक्टुबर 1950 में, श्री दत्तोपंत जी को इंटक की राष्ट्रीय परिषद का सदस्य बनाया गया तथा साथ ही तत्कालीन मध्य प्रदेश के इंटक के प्रदेश संगठन मंत्री चुने गये। श्रद्धेय दत्तोपंत जी, कहते थे – ‘‘पूजनीय श्री गुरूजी का यह आग्रह था कि, केवल इंटक की कार्यपद्धति जानना प्रर्याप्त नहीं है। कम्यूनिस्ट यूनियन्स और सोशलिस्ट यूनियन्स की कार्य पद्धति भी जाननी चाहिये।”

श्रद्धेय दत्तोपन्त जी ने इस दिशा मे प्रयत्न प्रारंभ किये और 1952 से 1955 के कालखंड में श्री दत्तोपंत जी, कम्युनिस्ट प्रभावित ‘‘ऑल इण्डिया बैंक एम्पलाइज एसोशियेशन’’ (AIBEA) नामक मजदूर संगठन के प्रांतीय संगठन मंत्री रहे। 1954 से 55 में आर. एम. एस. एम्पलॉइज युनियन नामक पोस्टल मजदूर संगठन के वे सेन्ट्रल सर्कल (अर्थात् आज का मध्यप्रदेश, विदर्भ, और राजस्थान) के अध्यक्ष इसी कालखंड में (1949 से 1955) श्री ठेंगड़ी जी ने कम्युनिज्म का गहराई से अध्ययन किया। कम्युनिज्म के तत्व ज्ञान और कम्युनिस्टों की कार्य पद्धति आदि विषयों पर पूज्य श्री गुरूजी से वे रात के कई घंटों तक विस्तृत चर्चा किया करते थे। (शून्य से सृष्टि तक पृ. स. 14-15)

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना –

इस प्रकार पूज्य लोकमान्य तिलक की 99वीं जयन्ती के अवसर पर, देश के अन्यान्य प्रान्तों से आये हुए 35 प्रतिनिधियों की उपस्थिति में, 23 जुलाई 1955 को, भोपाल में, भारतीय मजदूर संघ की, एक अखिल भारतीय केन्द्रीय कामगार संगठन के रूप में स्थापना की गई।

सनातन धर्म के वैचारिक अधिष्ठान, आलौकिक संगठन कौशल्य, परिश्रम की पराकाष्ठा, अचल धयेयनिष्ठा, विजयी विश्वास, और पूज्य श्री गुरूजी के सतत मार्गदर्शन के बल पर, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, मात्र तीन दशक में ही, उस समय के सबसे बड़े, और कांग्रेस से सम्बन्ध मजदूर संगठन इण्डियन नेशनल ट्रेड युनियन कॉग्रेस INTUC को पीछे छोड़ दिया। सन् 1989 में, भारतीय मजदूर संघ की सदस्य संख्या 31 लाख थी, जो कम्युनिस्ट पार्टियों से सम्बन्ध, एटक AITUC तथा सीटू CITU की सम्मलित सदस्यता के भी अधिक थी। सन् 2002 में, भारतीय मजदूर संघ 81 लाख सदस्यता के साथ भारत का विशालतम श्रम संगठन बन गया, देश के सभी अन्यान्य केन्द्रीय श्रम संगठनों की कुल सदस्यता से कहीं अधिक थी। आज 2012 की गणना के अनुसार भारतीय मजदूर संघ की सदस्य संख्या 1 करोड़ 71 लाख से अधिक है।

हिन्दू जीवन मूल्यों के आधार पर, प्रकृति से गै़र–राजनैतिक और वैचारिक दृष्टि से प्रखर राष्ट्रवादी, स्वायत और स्वयंशासी भारतीय मजदूर संघ नामक जन संगठन खड़ा किया। पूज्य श्री गुरूजी ने, एक नवम्बर 1972 को ठाणे बैठक में कहा, ‘‘ जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने सोचा कि मजदूर क्षेत्र में भारतीय मजदूर संघ स्वंतत्र रूप से काम करें और इसका संगठन दत्तोपंत ठेंगड़ी खड़ा करें तो यह काम उन पर सौंप दिया गया। उन्होंने बड़े परिश्रम किए, अपने कार्यकर्ताओं की सहानुभूति और सहायता थोड़ी बहुत होगी ही, परन्तु उन्होंने अकेले यह कार्य किया,जिसको अंग्रेजी में ‘सिंगल हैंडिड’ कहते है। अब भारतीय मजदूर संघ का बोलबाला भी काफी हो गया है और श्रमिक क्षैत्र में यह एक शक्ति के रूप में खड़ा हो गया है। इसका प्रभाव बढता ही जा रहा है। अभी ऐसी स्थिति है कि मजदूर क्षैत्र में काम करने वाले जो अन्यान्य संगठन है, उनके पास, ठोस विचार देने वाले व्यक्ति कम है, वे केवल आंदोलन के भरोसे, ‘हो हल्ला’ मचाकर अपनी लोकप्रियता बढाने का प्रयत्न करते है। मजदूर क्षैत्र के लिए ठोस, योग्य विचार देने की क्षमता अभी इस भारतीय मजदूर संघ में ही हमें अधिक मात्रा में दीखती है।’’ (शून्य से सृष्टि तक पृष्ठ संख्या -14)

महामानव का प्रादुर्भाव –

पूज्य श्री गुरूजी और दत्तोपंत जी के सम्बन्ध कैसे थे? मैं माननीय पी.परमेश्वरन जी की साहित्यक भाषा का उपयोग करना चाहता हूं। श्री परमेश्वरन जी लिखते है, ‘‘श्री दत्तोपंत जी ठेंगड़ी, उन थौड़े लोगों में से थे, जो परम पूज्य श्री गुरूजी की मनोरचना (Mind) को समझने में समर्थ थे। अगर परम पूज्य श्री गुरूजी, सनातन धर्म के हिमालय से निकलने वाली गंगोत्री थे, तो दत्तोपंत जी, को उस पवित्र जल में, गहरी डुबकियां लगाने का सुअवसर प्राप्त हुआ था।’’

भारतीय मजदूर संघ की स्थापना के कालखंड में भी श्रद्धेय दत्तोपंत जी,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ क्षेत्र के अनेक समानान्तर दायित्वों का, साथ–साथ निर्वहन कर रहे थे। इसी कालखंड में, 1949 से अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संस्थापक सदस्य, हिन्दुस्तान समाचार के संगठन मंत्री, 1951से 53, संगठन मंत्री, भारतीय जनसंघ, मध्यप्रदेश 1956 से 57 संगठन मंत्री, भारतीय जनसंघ, दक्षिणांचल।

दत्तोपंत जी के व्यक्तित्व का चित्रण करते हुए भानुप्रताप शुक्ल लिखते है, ’’रहन–सहन की सरलता, अध्ययन की व्यापकता, चिन्तन की गहराई, ध्येय के प्रति समर्पण, लक्ष्य की स्पष्टता, साधना का सातत्य और कार्य की सफलता का विश्वास, श्री ठेंगड़ी का व्यक्तित्व रूपायित करते है।’’

1964 से 1976 तक दो बार उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के लिए चुने गये। राज्यसभा में जाने का निर्णय हुआ तो दत्तोपंत जी कहते है, ‘‘मैंने पूज्य श्री गुरूजी से पूछा कि मुझे राज्यसभा में काहे के लिए भेज रहे हो? श्री गुरूजी विनोद करते हुए बोले, ‘‘जाओ, भाषण दो, विश्राम करो, बहुत परिश्रम किया है।’’, क्षणभर में ही गम्भीर स्वर में बोले, ‘‘एक और भी काम हो सकता है, राज्य सभा में अनेक दलों और अनेक विचारधाराओं के वरिष्ठ लोग आते है, उनके साथ व्यक्तिगत चर्चा, व्यक्तिगत सम्बन्ध,व्यक्तिगत मित्रता स्थापित करने का अवसर भी, है, जो आगे चलकर अपने कार्य के लिए उपयोगी हो सकता है।’’ परमपूज्य श्री गुरूजी, कितना आगे का सोचते थे, यह बात आपातकाल के विरूद्ध चलाये गये देश व्यापी आन्दोलन के समय अनुभव में आई। राज्यसभा के कार्यकाल के दौरान,देश के सभी प्रमुख राजनैतिक नेताओं से, समाजवादियों से लेकर साम्यवादियों तक, श्रद्धेय दत्तोपंत जी के अत्यन्त व्यक्तिगत सम्बन्ध होने के कारण, आपातकाल विरोधी आन्दोलन में सभी का सहयोग और विश्वास सम्पादित करना सहज सम्भव हुआ। 1964 से 1976 तक राज्य सभा के सदस्य रहते हुऐ, आपने राज्यसभा के अनेक महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। 1968 से70 तक आप राज्य सभा के उपाध्यक्ष मंडल के माननीय सदस्य रहे। 1965 से  66 तक, संसद की हाऊस कमेटी के सदस्य रहे। 1968 से 70 तक सार्वजनिक उद्योग समिति के सदस्य रहे।

सोवियत रूस की यात्रा और कम्युनिज्म से साक्षात्कार –

1969 में लोकसभा अध्यक्ष श्री नीलम संजीव रेड्डी की अध्यक्षता में, तथा राज्यसभा के सेक्रेटरी जनरल श्री बी. के. बेनर्जी के मंत्रीत्व में, भारतीय संसद के शिष्ट मंडल का सोवियत रूस जाने का कार्यक्रम तय हुआ। उस समय श्री वी. वी. गिरी राष्ट्रपति थे। श्री वी. वी. गिरी ने, इस संसदीय प्रतिनिधि मंडल में जाने के लिए श्रद्धेय दत्तोपंत जी का नाम प्रस्तावित किया। श्री वी. वी. गिरी, जो स्वयं मजदूर क्षैत्र से संबंध रहे थे, चाहते थे कि, सोवियत रूस में औद्योगिक सम्बन्धों का स्वरूप क्या है? इसका बारीकी से और निरपेक्ष भाव से अध्ययन करके, सम्यक जानकारी प्राप्त हो, क्योंकि कुछ समय बाद श्री वी. वी. गिरी भी रूस दौरे पर जाने वाले थे। 16 दिनों की सोवियत रूस की यात्रा में, उनके साथ, कम्यूनिष्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता, श्री हीरेन मुखर्जी तथा फारवर्ड ब्लॉक के श्री शिलभद्रयाजी प्रमुख थे। इस प्रतिनिधि मंडल के साथ, 16 दिनों तक सोवियत रूस तथा हंगरी की यात्रा की।

रूस यात्रा, श्रद्धेय दत्तोपंत जी के लिऐ, साम्यवाद के वास्तविक स्वरूप का बारीकी से अध्ययन करने का अपूर्व अवसर था। साम्यवादी विचारधारा का खोखलापन तथा, साम्यवादी विचारधारा के अन्तर्विरोधों का प्रत्यक्ष अनुभव करने के बाद श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, अथाह आत्म–विश्वासपूर्वक राष्ट्र को आश्वस्त करते हुए कहा था कि, ‘‘साम्यवाद अपने अन्तर्विरोधों के कारण, स्वतः समाप्त होने वाला है, साम्यवाद को समाप्त करने के लिए किसी को प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है।’’ देश भर में, अपने उद्बोधनों में, श्री दत्तोपंत जी ने यह उद्घोष किया, उस समय दुनियां के आधे देशों पर लाल झंडा लहरा रहा था। कोई भी जानकार व्यक्ति ऐसी बात मानना तो दूर, सोचना भी, समझदारी नहीं मानता था, ऐसे, सटीक विश्लेषक थे दत्तोपंत जी, आज, परिणाम हम सभी के सामने है।

दत्तोपंत जी की चीन यात्रा –

3 अप्रेल से 19 अप्रेल 1985 को, ऑल चायना फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियन्स के निमंत्रण पर, श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी के नेतृत्व में, भारतीय मजदूर संघ का प्रतिनिधि मंडल चीन यात्रा पर गया। प्रतिनिधि मंडल में,श्री मनहर भाई मेहता, श्री रास बिहारी मैत्र, श्री वेणुगोपाल, और श्री ओम प्रकाश अग्धी शामिल थे। 17 दिवसीय चीन यात्रा के दौरान, दत्तोपंत जी ने, चीन, के समाज जीवन, औद्योगिक सम्बन्धों, मजदूर संगठनों, राज्य व्यवस्था का अत्यन्त बारीकी से अध्ययन किया। यात्रा के दौरान, चीन के मजदूर नेताओं, प्रसासनिक अधिकारियों, कम्यूनिष्ट पार्टी के नेताओं से विस्तार से चर्चा हुई। प्रतिनिधि मंडल के विदाई के अवसर पर, चीन रेडियो द्वारा, श्रद्धेय दत्तोपंत जी का विदाई संदेश रिकार्ड किया गया, जो 28अप्रेल 1985 को सार्वजनिक रूप से प्रसारित चीन यात्रा के पश्चात, अपने देश व्यापी प्रवास के दौरान, अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि, ‘‘चीन में, केवल नाम मात्र के लिए कम्यूनिज्म है, चीन, कम्यूनिज्म छोड़ चुका है।’’ उन्होंने इस बात पर प्रसन्नता प्रकट की , कि, चीन के ट्रेड यूनियन्स ने, बी. एम. एस. की कार्यप्रणाली का व्यापक अध्ययन करने के बाद, हमें निमंत्रित किया था। उन्होंने कहा कि, बी. एम. एस. की त्रिसूत्री, ‘‘राष्ट्र का औद्यौगिकिकरण, उद्यौगों का श्रमिकीकरण, और श्रमिकों का राष्ट्रीयकरण, ’’ की सभी ने प्रसंशा की।

भारतीय किसान संघ की स्थापना  –

3-4 मार्च 1979 में, कोटा, राजस्थान में भारतीय किसान संघ के अखिल भारतीय अधिवेशन का आयोजन कर, किसानों के अखिल भारतीय संगठन की स्थापना की। देश के बहुत बड़े, शौषित–पीड़ित और असंगठित जन समुदाय में आत्म विश्वास जाग्रत करते हुए उन्होंने आव्हान किया कि, ‘‘हर किसान हमारा नेता है’’ और नारा दिया कि, ‘‘देश के हम भंडार भरेंगे, लेकिन कीमत पूरी लेगें।’’ महापुरूषों के संकल्प सत् संकल्प होते है, और सत् संकल्प, भगवान को पूरे करने होते है। सनातन हिन्दू धर्म के अधिष्ठान पर, पूर्णतः गैर–राजनैतिक, और प्रखर राष्ट्रवाद से प्रेरित, देश का सबसे बड़ा, सबसे सक्षम, जन संगठन खड़ा हुआ। सामुहिक चर्चा, सामुहिक निर्णय और सामुहिक नेतृत्व के सिद्धान्त और व्यवहार की सफलता की स्थापना की। आज भारतीय किसान संघ, किसानों और राष्ट्र के हितों का सबल, सजग प्रहरी के नाते सभी को ध्यान में आता है।

सामाजिक समरसता मंच और सर्वपंथ समादर मंच की स्थापना –

बाबा साहेब अम्बेडकर जन्म शताब्दी के अवसर पर पुणे में, दिनांक 14 अप्रेल 1983 को सामाजिक समरसता मंच की स्थापना की। यह सुखद संयोग था कि इसी दिन प. पू. डॉक्टर जी का जन्मदिन वर्ष-प्रतिपदा भी था। ‘‘सामाजिक समरसता के बिना सामाजिक समता असम्भव है।’’ इस ध्येय वाक्य का उद्घोष कर, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, हिन्दु समाज की अत्यन्त पीड़ादयक व्याधि के उपचार का मार्ग प्रस्सत किया। श्रद्धेय ठेंगड़ी जी को, पूज्य बाबा साहब अम्बेडकर के निकट सानिध्य का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। पूज्य बाबा साहब के हृदय की पीड़ा को समझने का महान अवसर प्राप्त हुआ था। सर्वसमावेशी सनातन हिन्दू धर्म के अधिष्ठान पर हिन्दू समाज की एकात्मता के महान कार्य को सम्पादित करने के लिए,सामाजिक समरसता मंच के माध्यम से मार्गदर्शन प्रारम्भ किया। इसी कड़ी में, दिनांक 16 अप्रेल 1991 को नागपुर में, सर्वपंथ समादर मंच की स्थापना की।

आर्थिक साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्ष –  स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना

सन् 1980 के आस-पास श्रद्धेय ठेंगड़ी जी, ने विकसित गौरे देशों के,साम्राज्यवादी षडयंत्रों से राष्ट्र को सावधान करना प्रारम्भ कर दिया था। अपने सार्वजनिक भाषणों, कार्यकर्ता बैठकों, अर्थशास्त्रज्ञों की गोष्ठींयों तथा व्यक्तिगत बातचीत में राष्ट्र पर आसन्न संकट की स्पष्ट सम्भावना प्रकट करते थे। श्री ठेंगड़ी जी ने सावधान किया कि, ‘‘विश्व बैंक, अर्न्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष और, बहुराष्ट्रीय कम्पनियां, पश्चिमी गौरे देशों के, शौषण करने के नये हथियार है, जिनके माध्यम से, साम–दाम–दंड–भेद का उपयोग करते हुऐ गौरे देश, विकसनशील तथा अविकसित देशों का शौषण कर रहे है।’’ जनरल एग्रीमेंट ऑन टेरिफ एण्ड ट्रेड (गेट) जिसकी स्थापना 1 जनवरी 1948 में की गई थी, इसमें केवल एक ही विषय था, माल का अन्तराष्ट्रीय व्यापार। 1986 में, गेट समझौते की उरूग्वै वार्ताओ के दौर में, कुख्यात डंकेल प्रस्तावों का मसविदा, सामने आया। अभी तक गैट वार्ताओं में, केवल माल पर लगने वाले सीमा शुल्क को कम करने के बारे में बातचीत होती थी। लेकिन, 1986 में, गैट के अध्यक्ष आर्थर डंकेल ने, गैट का दायरा विस्तृत करते हुऐ, ‘‘वस्तुओं के व्यापार के साथ, सेवाओं के व्यापार को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा और तीन नये विषय गैट वार्ता की टेबल पर लाये:-

  1. बौद्धिक सम्पदा अधिकारों का व्यापार(TRIPS)
  2. निवेश सम्बन्धी उपक्रमों का व्यापार(TRIMS)
  3. तथा कृषि(Agreement on Agriculture)

डंकेल प्रस्तावों का व्यापक अध्ययन करने के पश्चात् श्रद्धेय दत्तोपंत जी,ने देश को आव्हान किया कि, ‘‘डंकेल प्रस्ताव गुलामी का दस्तावेज है।’’ उन्होंने आगाह किया कि, भारत सरकार देश विरोधी डंकेल प्रस्तावों को अस्वीकार करें। क्योंकि डंकेल प्रस्ताव, आर्थिक साम्राज्यवाद लाने वाला है। राष्ट्र की सम्प्रभुता संकट में पड़ जाएगी। उन्होंने केवल सरकार को चेतावनी ही नहीं दी वरन् डंकेल प्रस्तावों के विरोध में व्यापक जन–आंदोलन खड़ा करने के लिए, सरकार पर भारी जन दबाव लाने के लिए देश भर में जन-जागरण का आव्हान भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ तथा अनेक देश भक्त संगठनों की विशाल-रेलियों तथा प्रदर्शनों के माध्यम से, आर्थिक साम्राज्यवाद के कारण, आसन्न आर्थिक गुलामी के विरोध में,राष्ट्र व्यापी आन्दोलन का आव्हान किया। उन्होंने इसे, स्वतंत्रता का दूसरा संग्राम कहा और इस दूसरे स्वतंत्रता संग्राम को चलाने के लिए 22 नवम्बर 1991 को नागपुर में स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की। उस बैठक में अखिल भारतीय स्वरूप की पांच संस्थाओं के प्रमुख पदाधिकारी उपस्थित थे। जिसमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, सहकार भारती, अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत, भारतीय किसान संघ तथा भारतीय मजदूर संघ शामिल थे।

नागपुर बैठक में, स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक के नाते, डॉ. मा. गो.बोकरे को दायित्व दिया गया, डॉ. बोकरे सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा नागपुर विश्वविद्यालय के उप- कुलपति रहे। आप पूर्व में कट्टर मार्क्सवादी रहे, और कम्यूनिष्ट पार्टी के एक चोटी के विचारक, यह मान्यता उन्हें प्राप्त हुई थी, परन्तु कालान्तर में उनके विचारों में परिवर्तन हुआ और उन्होंने विख्यात पुस्तक ‘हिन्दू अर्थशास्त्र’ लिखा। इसके साथ ही, मा. मदनदास जी देवी को राष्ट्रीय सह संयोजक का दायित्व दिया गया। स्वदेशी जागरण मंच,भारतीय मजदूर संघ तथा भारतीय किसान संघ तथा अनेक देशभक्त संगठनों द्वारा व्यापक जन जागरण तथा जन दबाव के अभियानों के बावजूद, केन्द्र सरकार ने, संसद को भी अंधेरे में रखकर, डंकेल प्रस्तावों पर हस्ताक्षर करके विश्व व्यापार संगठन समझौते को स्वीकार कर लिया।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, इस चुनौती को स्वीकार करते हुए स्वदेशी जागरण मंच के हैदराबाद अधिवेशन में, सम्मेलन को “युद्ध परिषद्” की बैठक संबोधित करते हुये विदेशी ताकतों के साथ “प्रत्यक्ष युद्ध” की घोषणा की, और सभी देशभक्तों को, स्वतंत्रता की दूसरी लड़ाई में भाग लेने का आव्हान किया। उनके आव्हान की ताकत थी की, देश की सारी मनीषा स्वदेशी जागरण मंच की संचालन समिति में भर गई थी। श्री मुरलीधर राव, श्री एस. गुरुमूर्ति, श्री गोविन्दाचार्य, श्री रविन्द्र महाजन, डॉ. महेशचन्द्र शर्मा, डॉ. भगवती प्रकाश शर्मा, श्री योगानंद काले, श्री अब्राहम वर्गीज, श्री अरूण ओझा, श्री बी. एस. कुमार स्वामी, श्री बी. के. केला, डॉ. महेश शर्मा आदि केवल कुछ नाम है।

स्वतंत्रता के दूसरे संघर्ष के आव्हान की गूंज दलों और वैचारिक सीमाओं को लांघते हुए सर्वदूर सुनाई देने लगी। विख्यात वामपंथी नेता श्रीपाद् अमृतडांगे की पुत्री श्रीमति रोजा देशपांडे, सोशलिस्ट नेता श्री एस. आर. कुलकर्णी, पूर्व प्रधानमंत्री श्री चंद्रशेखर, विख्यात मजदूर नेता श्री जॉर्ज फर्नाडीज, विख्यात वामपंथी विचारक और सर्वोच न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस वी. आर. कृष्ण अय्यर, विख्यात अर्थशास्त्री श्री रुद्रदत्त, विख्यात पर्यावरणविद् श्रीमति वंदना शिवा, आदि सभी, लोकमान्य नेताओं ने स्वदेशी के आव्हान को समर्थन और ताकत प्रदान की। यह दत्तोपंत जी के आव्हान की ताकत थी।

स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय किसान संघ, भारतीय मजदूर संघ और सभी देशभक्त संगठनों  को ओर व्यापक स्तर पर जन जागरण का आव्हान किया। देश भर में, स्थान स्थान पर, सभा संगोष्ठी, धरना प्रदर्शन, के माध्यम व्यापक जन जागरण और जन दबाव उत्पन्न किया। संघर्ष यात्राओं के माध्यम से देश भर में, जन जागरण यात्राओं का अभियान लिया गया। अनेक देश भक्त संगठनों ने अपने अपने प्रकार से शौध अध्ययन, समाचार पत्रों में, प्रचार प्रसार और विश्व व्यापार संगठन से देश पर होने वाले व्यापक दुष्परिणामों का व्यापक अध्ययन और शोध करके स्वदेशी आन्दोलन को ताकत प्रदान की। ऐसे महापुरूषों में डॉ. बी. के. केला अग्रिम पंक्ति में आते है जिन्होंने पेटेन्ट कानूनों के दुष्परिणामों का व्यापक अध्ययन किया।

वैश्विक आन्दोलन का नेतृत्व –

श्रद्धेय दत्तोपंत जी के स्पष्ट और कालजयी मार्गदर्शन से स्वदेशी आन्दोलन, कम समय में ही राष्ट्रव्यापी आन्दोलन बन गया। विश्व व्यापार संघ की द्विवार्षिक मंत्रीस्तरीय बैठकों से पूर्व देश भर में व्यापक जन जागरण और जन दबाव के कार्यक्रमों के माध्यम से सरकार पर लगातार दबाव बनाये रखने में मंच ने सफलता प्राप्त की। पहली सफलता सियेटल में मिली। सियेटल में आयोजित डब्लयु. टी. ओ. की मंत्रीस्तरीय बैठक, में भारत के वाणिज्य मंत्री, श्री मुरासोली मारन ने हिम्मत के साथ, भारत की जनता का पक्ष रखा। उन्होंने स्वदेशी जागरण मंच के लोकप्रिय स्लोगन ‘‘ नो न्यू नेगोशियेसन बट री–नेगोशियेसन’’ पर स्थिर रहे और वार्ता आगे नहीं बढ सकी। सभी देशभक्तों ने उसकी सराहना की। W.T.O. की अगली मंत्रीस्तरीय बैठक ‘‘दोहा’’ में आयोजित की गई। वह भी सफल नहीं हो सकी। उसके बाद अगली मंत्रीस्तरीय बैठक कानकुन में आयोजित की गई। कानकुन बैठक से पूर्व देश भर में, W.T.O. के विरोध में व्यापक प्रदर्शन किये गये। दिल्ली में एक लाख लोगों का विशाल प्रदर्शन हुआ। इस सबका सरकार पर दबाव उत्पन्न हुआ। कानकुन सम्मेलन में भारत के वाणिज्य मंत्री श्री अरूण जेटली ने, भारत का पक्ष व्यापकता से रखा। कानकुन बैठक में अनेक अफ्रिकी देशों तथा कैरेबियन देशों ने भी भारत का साथ दिया तथा कानकुन बैठक असफल रही।

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने, विश्व व्यापार संगठन के समझौते पर स्पष्ट मार्गदर्शन करते हुए कहा था कि, ‘‘वर्ल्ड ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन इज ए मिसनोमर, इट इज ए, वैस्टर्न वर्ल्ड, ट्रेड ऑर्गेनाइजेशन’’ इतना कहने से सारा विषय समझ में आ जाता था। W.T.O. के विरोध में उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया था कि, ‘‘डब्ल्यु.टी.ओ., तोड़ो, छोड़ो या मोड़ो’’। वास्तव में स्वदेशी आन्दोलन के माध्यम से श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने वैश्विक आन्दोलन का सफल नेतृत्व किया।

देश और धर्म पर आई हर चुनोती  स्वीकार –

श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेगड़ी ने सम्पुर्ण जीवन में , समय – समय पर सनातन हिन्दू विचार की प्रासंगिकता को स्थापित करने का महान कार्य सम्पादित किया। 1948 से 49 में, जब, कम्युनिज्म बड़ी चुनौती के रूप में विश्व पटल पर छाया हुआ था उस समय, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ने प. पू. श्री गुरूजी के मार्गदर्शन से, मजदूर क्षैत्र में, भारतीय मजदूर संघ की स्थापना करके और सनातन हिन्दू दर्शन के प्रतिष्ठान पर देश का सबसे बड़ा मजदूर संगठन खड़ा कर, साम्यवादियों को उनके ही क्षैत्र में, परास्त किया। साम्यवाद और पूंजीवाद की दोनों विचारधाराओं को, भौतिकवादी विचार दर्शन कह कर अस्वीकार करते हुए श्रद्धेय ठेंगड़ी जी ने हिन्दू विचार दर्शन के आधार पर ‘‘थर्ड वे’’ का प्रवर्तन किया, अर्थात हिन्दू जीवन मूल्यों के आधार पर विश्व व्यवस्था का प्रवर्तन भारत में पाश्चात्य लोकतंत्र की प्रणाली के अनेक महापुरूषों यथा, लोकमान्य तिलक, पू. महात्मा गांधी, श्री चक्रवर्ती राजगोपालचारी, श्री मानवेन्द्र नाथ राय, पू. श्री गुरूजी तथा पंडीत दीन दयाल जी ने पाश्चात्य लोकतांत्रिक प्रणाली को भारतीय समाज जीवन के अनुपयुक्त बताया था। श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी, हिन्दू परम्परा का मंडन करते हुए कहते थे कि, देश भक्ति से प्रेरित, स्वायत और स्वयंशासी जन संगठन राज सत्ता पर, धर्मदंड की भूमिका सफलतापूर्वक निभाएगें, तभी राजसत्ता राजधर्म का पालन करेगी। 1986 से डंकेल प्रस्तावों के विषय में और उसके बाद बने विश्व व्यापार संगठन के विषय में, राष्ट्र पर आसन्न आर्थिक साम्राज्यवाद और विदेशी गुलामी के विरूद्ध पुनः उन्होंने हिन्दू अर्थव्यवस्था की श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए व्यापक जन आंदोलन तथा गंभीर वैचारिक आंदोलन का सूत्रपात किया। और ‘‘देशभक्ति की साकार अभिव्यक्ति है, स्वदेशी का सूत्र दिया।

परम पूज्य गुरूजी, और पंडित दीनदयाल उपाध्याय की परम्परा में श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी ने सनातन धर्म के अधिष्ठान पर राष्ट्रवादी विचार प्रवाह को सुपरिभाषित करने का महान कार्य सम्पन्न किया। समकालीन विभाजनकारी राजनीति के संशौधन हेतु,वैकल्पिक राजनैतिक प्रक्रिया को वैचारिक तथा व्यवहारिक अधिष्ठान प्रदान करने का महान कार्य आपने सम्पादित किया। श्रद्धेय ठेंगड़ी जी ने, भारतीय मजदूर संघ, भारतीय किसान संघ, तथा स्वदेशी जागरण मंच जैसे राष्ट्रवादी संगठनों का निर्माण केवल परिवर्तन के वाहक के रूप में ही नहीं, तो राष्ट्र के समक्ष और समर्थ प्रहरी संगठनों के रूप में किया। ये केवल एक ओर आन्दोलन मात्र नहीं होकर आधुनिक राजनीति की अपर्याप्तता को संशोधित करने का सशक्त माध्यम बने। इसीलिए कृतज्ञ राष्ट्र ने श्रद्धेय ठेंगड़ी जी को राष्ट्र ऋषि कहकर संबोधित किया।

महानिर्वाण –

दिनांक 14 अक्टुबर (अमावस्या) 2004 को पुणे में, श्रद्धेय दत्तोपंत जी ठेंगड़ी को महानिर्वाण हुआ। आपका विचार–धन, हजारों वर्षों तक देशभक्तों को मार्गदर्शन करता रहेगा। आपने लगभग 200 से अधिक छोटी–बड़ी पुस्तके लिखी, सेकड़ों प्रतिवेदन प्रकाशित किये तथा हजारों की संख्या में आलेख पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित है।

–डॉ रणजीत सिंह