Category Archives: Social Issues

By reducing Diwali to a mere ‘Riwaz’, Fabindia furthered Abrahamic religions’ denigrating agenda

Calling Diwali ‘Jashn-e-Riwaz’ is part of an old linguistic tactic that Abrahamics have been employing for ages to belittle us. To begin with, they added ‘ism’ to ‘Hindu’ but ‘ity’ to ‘Christian’, implying ours is dogma, theirs is faith. Islam stays Arabic, bearing no English language influence.

To say Diwali is a riwaz (custom) is to make the subtle point that the festival has no religious roots. Just as it is customary to greet people when we meet, we observe Diwali. No more serious than wishing ‘good morning’!

Have you noticed that chaste Urdu speakers never refer to the script for Hindi, Devanagari, as Devvanagari? They call it Nagari ― implying there is no godly aspect to it. This is another subtle show of disregard for our culture

When I was a teacher, I noticed Muslim students deliberately writing Hindu as “hindu”, with a lower-case h, in their exercise books. Note that the English language associates a certain degree of respect/recognition with proper nouns and certain adjectives. Even in French, Français (with capital F) and français (small f) have different values attached. My Muslim students who wrote “hindu” while never referring to the followers of their own religion as “muslim” were making a clear case of comparison, projecting M as greater than h

Referring to Krishna as “the blue god”, Hanuman as “the monkey god”, etc are linguistic ways of saying our religion is alien and amusing. If pop iconography determines these terms, why is Jesus Christ not “the crucified god”? Why is Allah not “the invisible god”?

While Allah cannot be depicted in paintings, films, sculpture, etc, the name flashes Arabic calligraphy before the eyes. So, shouldn’t Allah be “the Arab god”? He isn’t. Even the Buddha is not “the Nepali (born in Lumbini) god”. Adjectives for “god” are preserved only for us.

@FabindiaNews has merely furthered n old agenda of ME religions to degrade others w/ linguistic subtlety. Hindus should’ve objected to references like “the festival of colours” (Holi) & “festival of lights” (Diwali), but they hadn’t understood the game until now.

Surajit Dasgupta

Founder and editor-in-chief of @SirfNewsIndia, formerly with MyNation, Hindusthan Samachar, Swarajya, The Pioneer, The Statesman

9 अगस्त की सत्यता: इतिहास, भारत और औपनिवेशिक शक्तियां

-डॉ. मन्ना लाल रावत

हमारे जीवन में त्योहारों और उत्सवों का बड़ा महत्व है और भारतीय संस्कृति को तो त्यौहार और उत्सवों की संस्कृति रूप ही जाता है। जनजाति समाज के बंधु-भगिनियों में स्वाभाविक रूप से संस्कृति के सभी पक्षों से लगाव रहा है जो हमारी एक प्रमुख पहचान भी है। इसके माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक मूल्यों को जीवंत बनाए रखते हैं, परंतु विगत 2-3 वर्षों से एक नई प्रवृति आई है जिसे 9 अगस्त यानि विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाये जाने के रूप् में देख सकते हैं। यह आयोजन बिना ऐतिहासिक सत्यता जाने और बिना भारत के संदर्भ के होने लगा है। हद तो ये है कि इसमें कई बुद्धिजीवी भी सम्मिलित होने लगे और शासन स्तर पर कुछ लोक लुभावने नीतिगत निर्णय भी होने लगे परंतु भारत गणराज्य के रूप में इस दिन की सत्यता को जानना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह प्रश्न मात्र जनजाति समाज-संस्कृति का ही नहीं है बल्कि देश की संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से भी कीमती हो जाता है।

9 अगस्त, दिवस की ऐतिहासिक सत्यता:- हमें याद है कि मध्य काल में भौगोलिक खोजों के दौरान स्पेन और पुर्तगाल के राजाओं ने कैसे अग्रणी प्रयास किए। इस दौर में कैथोलिक मिशन की आर्थिक मदद से भारतवर्ष के व्यापार मार्ग खोजने के उद्देश्य से एक नाविक कोलंबस को समुद्री मिशन पर भेजा गया जिसके द्वारा भूलवश 12 अक्टूबर, 1492 को नई दुनिया की खोज की गई। नई दुनिया कुछ और नहीं, बल्कि उत्तरी अमेरिका का पूर्वी तट था। इस काल खण्ड में पुरे अमेरिकी महाद्वीप पर मूल निवासियों का अधिपत्य था जिसमें चेरोकी, चिकासौ, चोक्ताव, मास्कोगी और सेमिनोल प्रमुख थीं। इन सभी मूलनिवासियों को कोलंबस ने इंडियन कहा। कोलंबस की खोज के बाद धीरे-धीरे यूरोपीय शक्तियों ने अमेरिका में अपना साम्राज्य फैलाने की पूरी रूपरेखा तैयार की और सबसे पहले यहां के मूल निवासियों से संघर्ष करना पडा। इस क्रम में सबसे पहला युद्ध वर्जिन्या प्रांत में पवहाटन आदिवासियों से करना पड़ा। तीन युद्ध की इस श्रंृखला में पहला युद्ध 9 अगस्त 1610 को हुआ जिसमें पवहाटन कबीले के सभी सदस्य युद्ध करते हुए मारे गए। यह युद्ध भारतीय इतिहास के संदर्भ में अंग्रेजों के विरूद्ध सन् 1757 में प्लासी के युद्ध के समान माना जाता है। इस युद्ध की जीत के साथ ही अंग्रेजों को अमेरिका के आदिवासियों को पूरी तरह से खत्म करने का रास्ता खोल दिया।

त्रासदी भरी इस यात्रा में ‘आंसुओं की रेखा‘ व ‘धर्म प्रचार की शुरुआत करने के दिवस‘ को भी जानना आवश्यक है।

इस बात के समय में लगभग 250 वर्षों में अमेरिका के मूल निवासियों का भारी रक्तपात करके भी यूरोपीय शक्तियां केवल थोड़े से भैगोलिक भूभाग पर ही अपना आधिपत्य जमा सकी थीं, तब जॉर्ज वाशिंगटन और हन्नी नॉक्स के नेतृत्व में पहला ब्रिटिश-अमेरिकी युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध में सफलता अमेरिका को मिली एवं पेरिस की संधि के तहत अमरीकी कॉलोनी पर अधिकार, अमेरिका को मिला परन्तु और अधिक भूभागों पर कब्जा करके उसे आपस में बांटने की भी संधि हुई इंडियन रिमूवल ऐक्ट, 1830 के तहत सभी मूलनिवासी को जोर जबरदस्ती मिसिसिपी नदी के उस पार धकेला गया। इस संघर्ष में 30,000 स्थानीय मूल निवासियों (आदिवासीजन) रास्ते में ही मर-खप गए। यह घटना श्ज्ीम जतंपस व िज्मंतेश् (आंसुओं की रेखा) कहलाती है। इस दरमियान इतनी संख्या में मूलनिवासी लोग मारे गए कि मात्र 5 प्रतिशत ही जीवित बच सके।

काल साक्षी है कि क्रूरता का भी अपना एक लम्बा इतिहास है। इसके संवाहक शक्तियां अपने पुरखों की उपलब्धियों को समृतियों रूप में जिंदा रखने की कुचेष्ठा करती है और क्रूरता के इतिहास को जश्न में भी बदलना चाहती है। 12 अक्टूबर, 1992 कोलंबस की नई दुनिया की खोज के 500 वर्ष पूरे होने पर औपनिवेशिक शक्तियों ने एक बड़ा जश्न मनाने की योजना बनाई परंतु इन उत्सवों के विरोध में ‘कोलंबस चले जाव‘ नाम से एक अभियान चलाया गया। इस अभियान को शांत करने के लिए अपराध बोध के भाव से इस दिन को अमेरिका का ‘इंडिजिनस पीपल्स डे‘ घोषित किया गया। संयुक्त राष्ट्र द्वारा विश्व मूलनिवासी दिवस भी 12 अक्टूबर को ही मनाया था, मगर अमेरिका में विरोध और ब्रिटिश-पवहाटन युद्ध में ब्रिटेन की सत्ता वर्जिन्या प्रांत में स्थापित होने के कारण वहां धर्म प्रचार की शुरुआत करने का मौका प्राप्त हुआ। वह दिन भी 9 अगस्त ही था। क्रूरता के इतिहास के इस दिन को यादगार बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में एक गुप्त षड्यंत्र के तहत 9 अगस्त को ‘मूल निवासी दिवस‘ मनाने का निर्णय लिया गया।

अब आप समझ गये होंगे कि ‘मूलनिवासी दिवस‘ इतिहास के तथ्य व मर्म क्या हैं़? वास्तव में 9 अगस्त, 1610 को अमेरिका के मूल निवासी यदि ब्रिटिश सेना से अपना पहला युद्ध नहीं हारते तो आज भी अमेरिका के मूल निवासी पुरे अमेरिकी महाद्वीप के शासक होते। उनकी सभ्यता एवं संस्कृति अक्षुण्य रहती। उनका इतिहास भी उज्जवल व समृद्ध होता। क्या मूलनिवासी समूहों को अंग्रेजों द्वारा खत्म कर दिया गया या नहीं? क्या उक्त मूलनिवासी समूह के इतिहास से हम भारतीय को कुछ सीखने की आवश्यकता नहीं है? हमें याद रखना चाहिए कि यू.एन. की वर्किंग ग्रुप की विश्व मजदूर संगठन (प्स्व्) की पहली बैठक 1989 का हवाला दिया गया है, जो 9 अगस्त की तिथि की ओर संकेत करता है। यह वास्तव में एक सफेद झूठ है।

9 अगस्त: यू.एन. के मंच से वैश्विक बाजार में भ्रामक सूचनाओं का प्रसार विश्व मजदूर संगठन (प्स्व्) मजदूर के अधिकारों के कार्य हेतु एक विश्व स्तरीय संगठन है जिसका उद्देश्य मजदूरों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसके द्वारा 1989 में ‘राइट्स ऑफ इंडियन पीपल कन्वेंशन‘ क्रमांक 169 घोषित किया गया जिसमें ‘इंडिजिनस पीपल‘ शब्द का प्रयोग किया गया परंतु किसी परिभाषा में इसे स्पष्ट नहीं किया गया है। इसका मुख्य संबंध तत्कालीन औपनिवेशिक कॉलोनी से है, जहां बड़ी संख्या में देशज लोग रहते हैं जो वहां तब भी दूसरे दर्जे के नागरिक निवासरत थे। भारत ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे क्योंकि इसका संदर्भ भारत से नहीं था।
इस संधि की विफलता को देखते हुए विश्व मजदूर संगठन (प्स्व्) द्वारा इस विषय पर और अधिक आम राय बनाने और अन्य देशों को इस हेतु शामिल करने का काम करने के उद्देश्य से एक अलग संस्था बनाकर इस घोषणापत्र को अधिक से अधिक देशों द्वारा स्वीकार कराने का मंतव्य बनाया गया। इस दिशा में ‘वर्किंग ग्रुप फॉर इंडिजिनस पीपल‘ (ॅळप्च्) का गठन किया गया। ॅळप्च् की पहली बैठक 9 अगस्त को हुई थी, इसलिए सन् 1994 में 9 अगस्त को ‘विश्व इंडिजिनस पीपल डे‘ मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई। कई देशों में इस दिन अवकाश रखा जाने लगा।

हमें याद रचाना चाहिए कि वर्किंग ग्रुप फॉर इंडिजिनस पीपल द्वारा लगभग 20 वर्षों तक विचार विमर्श के उपरांत एक घोषणा पत्र जारी किया गया जो विश्व मजदूर संगठन के 1989 की संधि क्रमांक 169 का ही विकसित/संशोधित/परिमार्जित रूप था। यू.एन. द्वारा इस विषय पर आयोजित मतदान में 13 सितम्बर, 2007 को, में भारत गणराज्य की ओर से श्री अजय मल्होत्रा ने भारत का आधिकारिक मत रखा जो हमारे संप्रभूता, नागरिकों के मूलाधिकारों के साथ ही देश के सभी निवासी देश के मूलनिवासी होने के तथ्यों को लिए हुए था।
9 अगस्त का महत्व औपनिवेशिक शक्तियां सदा ही अपने क्रूरता के इतिहास को जीवित रखने की कोशिश करती रहीं हैं। अमेरिकी मूल निवासियों की धरती पर कोलंबस द्वारा पैर रखने के दिवस 12 अक्टूबर को ‘नेशनल इंडिजिनस पीपल डे/कोलंबस डे‘ जिसे ‘थैंक्स गिविंग डे‘ के रूप में मनाया जाता है, को ही ‘विश्व इंडिजिनियस ड‘े के रूप में मनाने की कोशिश की गई थी परंतु विवाद होने की और अमेरिका सहित कई देशों में मूलनिवासियों पर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के अमानवीय कृतियों के पुनः उजागर एवं आधुनिक जगत में प्रसारित होने के भय से इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन पाइर्, परंतु 1992 में 500 वर्ष पूरे होने के अवसर को ॅळप्च् द्वारा ‘विश्व इंडिजिनियस ड‘े मनाने के प्रस्ताव को 2 वर्ष के लिए टालना पड़ा। वर्ष 1994 में ैजण् ज्मतमें ठमदमकपबजं व िजीम ब्तवेे ;म्कपजी ैजमपदद्ध थ्मंेज क्ंल यानि 9 अगस्त के दिन हुई बैठक को कई कथोलिक सदस्यों ने शुभ दिन माना, इसलिए इस दिन को ‘विश्व इंडिजिनियस ड‘े (9 अगस्त) की घोषणा की गई। विश्व भर कैथोलिक चर्च थ्मंेज क्ंल को इंडिजिनियस लोगों के मध्य बड़े ही धूमधाम से मनाने हेतु प्रोत्साहित करते हैं। एक मान्यता अनुसार इस दिन से ही अमेरिका में ईसाई धर्म प्रचार की शुरुआत हुई थी, जो क्रिसमस या अंग्रेजी नव वर्ष तक जारी रहता है।

बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर सहित सभी ने इस बात को संविधान निर्माताओं ने अपने प्रखर बुद्धिमत्ता से स्थापित भी किया है कि भारत में सभीजन इस देश के मूल निवासी हैं परंतु यह क्या कुछ तत्वों के प्रभाव में हमारे चिंतक भी हमारे अपने इतिहास और महापुरुषों के एकत्व के विचारों के परे कहां निकल गए? इंडिजिनियस पीपल्स की अवधारणा सहित ये मनगढ़ंत बातें क्या जनजातियों के राष्ट्रीय मूल्यों, स्वतंत्रता हेतु दिये गये बलिदानों की संस्कृति की अनवरत श्रंृखला के गौरव के अनुकूल है? यह हमारा राष्टीय कर्तव्य है कि हम हमारे गणराज्य के यू. एन. में रखे गये मत दिनांक 13 सितम्बर, 2007 के अनुरूप ही चिंतन व कार्यव्यवहार रखें।
 जाने कैसी हवा चली और भारतवर्ष में भोला भाला जनजाति समाज एक भेड़ चाल का हिस्सा बनकर मूलनिवासियों के पतन ऐतिहासिक दिन 9 अगस्त को, विश्व मूलनिवासी दिवस मनाने लगे; जबकि यह अमेरिकी मूल निवासियों के नरसंहार का दिन है। इस दिन पवहाटन युद्ध में पांच मूलनिवासी कबीलों के नष्ट होने का दिवस जिसे औपनिवेशिक शक्तियों ने बड़ी चतुराई से संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों का उपयोग करते हुए सजावटी तौर पर प्रस्तुत किया है। यह सजावटी दिवस भारतीय संप्रभुता, भारतीय गौरवशाली इतिहास और जनजाति समाज के स्वतंत्रता सैनानियों/नायकों द्वारा औपनिवेशिक शक्तियों के विरुकिये गये अपने संघर्ष और बलिदानों की सच्ची श्रद्धांजलि नहीं हो सकता। हमारा प्रश्न हमारे पूर्वजों के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय मूल्यों में आस्था का ही रहा है व इसी के लिए हम नतमस्तक होते हैं। साथ ही साथ विश्व समाज में अमेरिकी आदिवासियों के समुदायों को नष्ट करने वाले विदेशी तत्वों के विरुद्ध ही होना चाहिए, क्योंकि 9 अगस्त को हर वर्ष कई हजार मूलनिवासी संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय के बाहर अपने पुरखों के पक्ष में खडे होकर 9 अगस्त, 1610 के क्रुर युद्ध की रीति, नीति व गति के विरोध में आंदोलन करते हैं, और तो फिर हम संवेदनशील, चिंतनशील व विवेकशील मानस वाले होकर भी 9 अगस्त को उत्सव कैसे बना सकते हैं?
……) का गठन किया गया। ॅळप्च् की पहली बैठक 9 अगस्त को हुई थी, इसलिए सन् 1994 में 9 अगस्त को ‘विश्व इंडिजिनस पीपल डे‘ मनाने की घोषणा संयुक्त राष्ट्र द्वारा की गई। कई देशों में इस दिन अवकाश रखा जाने लगा।

हमें याद रचाना चाहिए कि वर्किंग ग्रुप फॉर इंडिजिनस पीपल द्वारा लगभग 20 वर्षों तक विचार विमर्श के उपरांत एक घोषणा पत्र जारी किया गया जो विश्व मजदूर संगठन के 1989 की संधि क्रमांक 169 का ही विकसित/संशोधित/परिमार्जित रूप था। यू.एन. द्वारा इस विषय पर आयोजित मतदान में 13 सितम्बर, 2007 को, में भारत गणराज्य की ओर से श्री अजय मल्होत्रा ने भारत का आधिकारिक मत रखा जो हमारे संप्रभूता, नागरिकों के मूलाधिकारों के साथ ही देश के सभी निवासी देश के मूलनिवासी होने के तथ्यों को लिए हुए था।
9 अगस्त का महत्व औपनिवेशिक शक्तियां सदा ही अपने क्रूरता के इतिहास को जीवित रखने की कोशिश करती रहीं हैं। अमेरिकी मूल निवासियों की धरती पर कोलंबस द्वारा पैर रखने के दिवस 12 अक्टूबर को ‘नेशनल इंडिजिनस पीपल डे/कोलंबस डे‘ जिसे ‘थैंक्स गिविंग डे‘ के रूप में मनाया जाता है, को ही ‘विश्व इंडिजिनियस ड‘े के रूप में मनाने की कोशिश की गई थी परंतु विवाद होने की और अमेरिका सहित कई देशों में मूलनिवासियों पर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों के अमानवीय कृतियों के पुनः उजागर एवं आधुनिक जगत में प्रसारित होने के भय से इस प्रस्ताव पर सहमति नहीं बन पाइर्, परंतु 1992 में 500 वर्ष पूरे होने के अवसर को ॅळप्च् द्वारा ‘विश्व इंडिजिनियस ड‘े मनाने के प्रस्ताव को 2 वर्ष के लिए टालना पड़ा। वर्ष 1994 में ैजण् ज्मतमें ठमदमकपबजं व िजीम ब्तवेे ;म्कपजी ैजमपदद्ध थ्मंेज क्ंल यानि 9 अगस्त के दिन हुई बैठक को कई कथोलिक सदस्यों ने शुभ दिन माना, इसलिए इस दिन को ‘विश्व इंडिजिनियस ड‘े (9 अगस्त) की घोषणा की गई। विश्व भर कैथोलिक चर्च थ्मंेज क्ंल को इंडिजिनियस लोगों के मध्य बड़े ही धूमधाम से मनाने हेतु प्रोत्साहित करते हैं। एक मान्यता अनुसार इस दिन से ही अमेरिका में ईसाई धर्म प्रचार की शुरुआत हुई थी, जो क्रिसमस या अंग्रेजी नव वर्ष तक जारी रहता है।

बाबा साहब भीम राव आम्बेडकर सहित सभी ने इस बात को संविधान निर्माताओं ने अपने प्रखर बुद्धिमत्ता से स्थापित भी किया है कि भारत में सभीजन इस देश के मूल निवासी हैं परंतु यह क्या कुछ तत्वों के प्रभाव में हमारे चिंतक भी हमारे अपने इतिहास और महापुरुषों के एकत्व के विचारों के परे कहां निकल गए? इंडिजिनियस पीपल्स की अवधारणा सहित ये मनगढ़ंत बातें क्या जनजातियों के राष्ट्रीय मूल्यों, स्वतंत्रता हेतु दिये गये बलिदानों की संस्कृति की अनवरत श्रंृखला के गौरव के अनुकूल है? यह हमारा राष्टीय कर्तव्य है कि हम हमारे गणराज्य के यू. एन. में रखे गये मत दिनांक 13 सितम्बर, 2007 के अनुरूप ही चिंतन व कार्यव्यवहार रखें।

 जाने कैसी हवा चली और भारतवर्ष में भोला भाला जनजाति समाज एक भेड़ चाल का हिस्सा बनकर मूलनिवासियों के पतन ऐतिहासिक दिन 9 अगस्त को, विश्व मूलनिवासी दिवस मनाने लगे; जबकि यह अमेरिकी मूल निवासियों के नरसंहार का दिन है। इस दिन पवहाटन युद्ध में पांच मूलनिवासी कबीलों के नष्ट होने का दिवस जिसे औपनिवेशिक शक्तियों ने बड़ी चतुराई से संयुक्त राष्ट्र संघ के मंचों का उपयोग करते हुए सजावटी तौर पर प्रस्तुत किया है। यह सजावटी दिवस भारतीय संप्रभुता, भारतीय गौरवशाली इतिहास और जनजाति समाज के स्वतंत्रता सैनानियों/नायकों द्वारा औपनिवेशिक शक्तियों के विरुकिये गये अपने संघर्ष और बलिदानों की सच्ची श्रद्धांजलि नहीं हो सकता। हमारा प्रश्न हमारे पूर्वजों के प्रति प्रतिबद्धता और राष्ट्रीय मूल्यों में आस्था का ही रहा है व इसी के लिए हम नतमस्तक होते हैं। साथ ही साथ विश्व समाज में अमेरिकी आदिवासियों के समुदायों को नष्ट करने वाले विदेशी तत्वों के विरुद्ध ही होना चाहिए, क्योंकि 9 अगस्त को हर वर्ष कई हजार मूलनिवासी संयुक्त राष्ट्र के मुख्यालय के बाहर अपने पुरखों के पक्ष में खडे होकर 9 अगस्त, 1610 के क्रुर युद्ध की रीति, नीति व गति के विरोध में आंदोलन करते हैं, और तो फिर हम संवेदनशील, चिंतनशील व विवेकशील मानस वाले होकर भी 9 अगस्त को उत्सव कैसे बना सकते हैं?

Payment of monthly honorarium to religious workers by Govt. of AP –Will it stand Judicial scrutiny

By: K. Sahadev

The Government of Andhra Pradesh has issued orders vide GENERAL ADMINISTRATION (SC.I) DEPARTMENT G.O.MS.No. 52 Dated: 14-05-2021, enhancing financial support to the religious workers in places of worship of two important religious communities of the State viz., Hindus, Muslims. In the case of Christians, it is a new scheme. It leaves out three other minorities- Sikhs, Jains and Buddhists.

The present G.O cites “ensuring religious harmony” in the state as the main objective of payment of monthly honorarium to religious workers of different religions. The G.O. further mentions extension of payment to functionaries working in churches is similar to the support being given to the Archakas working in temples and Imams/Muezzins working in mosques. However, this is a false comparison as the G.O. very clear states that quantum of payment to Archakas is based on grade of the temple, which in turn depends upon income generated by the temple. It clearly means that Hindu temple archakas are NOT paid out of public exchequer.

The Scheme for Payment of Honorarium to Imams and Muezzins of Mosques in Andhra Pradesh commenced in June 2016. The G.O. mentions that:

The scheme for payment of Honorarium to the selected Imams and Muezzins of the non-income earning Masjids in the State of Andhra Pradesh is intended to support the Andhra Pradesh State Waqf Board since the Board is not in a position to meet the expenditure. The Andhra Pradesh State Waqf Board shall take steps to strengthen the respective Waqf institutions to attain self-sufficiency to meet the expenditure.

The latest order marks the beginning of state funding of religious workers in Andhra Pradesh. Promoting communal harmony was not the objective stated at in 2016. The new G.O. not only increased the quantum of payment for Muslim religious workers but also introduced payment of monthly honorarium for Christian religious workers. But by including the enhancement of honorarium for Hindu archakas in this G.O., an impression is sought to be given out that even they are being paid out of state exchequer, which is factually incorrect. State is yet to show any concern towards Hindu archakas rendering their services in temples without any income. On the contrary, state is meddling with Hindu religious institutions through legislation and administrative actions by arbitrarily fixing the remuneration of Archakas, grading of temples, appointing Executive Officers, interfering in dharmic rituals of temples, disposing off temple assets etc.

CAN PUBLIC FUNDS BE USED FOR PAYMENT TO RELIGIOUS WORKERS?

This raises the larger question whether the public money can be used to pay individuals of a particular religion with the purported objective of ensuring communal harmony?

In 2012, the Government of West Bengal issued instructions for payment of monthly honorarium to Imams in mosques. The decision was challenged in Calcutta High court (W.P. No. 358 of 2012) and the decision of the government was quashed. The highlight of the judgement are:

1) The State Government cannot spend any money for the benefit of few individuals of a particular religious community ignoring the identically placed individuals of the other religious communities since the State cannot discriminate on the ground of religion in view of the Article 15 (1) of the Constitution of India.

2) The State Government by providing funds for making payment of honorarium to the Imams and Muezzins has acted in clear violation of the provisions enshrined under Article 14 and 15 (1) of the Constitution of India.

3) No exercise has been made by the Competent Authority of the State Government to ascertain the financial condition of various other members of the Muslim community as well as members of other religious communities before taking the decision for issuing the impugned memorandum.

4) The public purpose mentioned in Article 282 cannot be a purpose which offends the provisions of Article 14 and 15 (1) of the Constitution of India.

5) Imams and/or Muezzins are few individuals of the Muslim community and attached with the mosques. Decision to provide honorarium to the said individuals cannot serve the general interest of the community as a whole.

6) We hold that the impugned memo issued by the State Government is not only discriminatory in nature being violate of Article 14 of the Constitution of India but the same also discriminates on the ground of religion which offends Article 15 (1) of the Constitution of India.

7) We are constrained to hold that the grants made by the State Government for providing honorarium to the Imams and Muezzins were not for the public purpose as mentioned in Article 282 of the Constitution of India

8) Hon’ble Supreme Court in the case of Sri Divi Kodandarama Saram & Ors. Vs. State of A. P. & Ors., reported in 1997 (6) SCC 189 considered the payment of salary to ‘Archaka’ of Hindu Temple. In the aforesaid decision, Hon’ble Supreme Court made it clear that public fund cannot be utilised for the purpose of making payment of Archakas and trust looking after the temple was advised to collect donation from the public to defray the expenses.

9) No provision has however, been made in the Constitution authorising the State Government to make payment of the honorarium to few individuals of a particular religious community. As a matter of fact, Government cannot spend any money for the benefit of few individuals of a particular religious community to the exclusion of the members of the other religious communities in view of a specific provision of Article 15 (1) of the Constitution.

10) The concerned Executives of the State Government have squandered public money by releasing funds to the Wakf Board for the purpose of making payment of monthly honorarium to the Muezzins even in absence of any government order under Article 166 of the Constitution of India. We take strong exception for spending money even in absence of appropriate government order under Article 166 of the Constitution of India.

Thus it is very clear that payment to religious workers from public funds has been held to be “squandering of public money”. The objective cited in the Govt. of AP G.O. i.e., “communal harmony” also fails to stand judicial scrutiny in view of observation (5) cited in the above judgement. The judges have clearly held that payment to few individuals of a particular community does not serve the interests of all members of that community, leave alone serving promotion of inter-faith communal harmony.

The judgement also referred to a judgement of the Hon’ble Supreme Court in a matter of payment of honorarium to Imams. The hon’ble court clarified that the scheme formulated by the SC was for payment of a uniform scale of salary to Imams from the income of the respective state Wakf Boards and not public funds.

The Hon’ble Supreme Court in the aforesaid decision never directed the State Government or the Govt. of India to take the responsibility for making payment to the Imams who are admittedly performing the duty of leading the community prayer in the mosques.

KERALA HC JUNE 2021:

June 2021, the Kerala High Court on Tuesday asked the state government, why they were financing a religious activity while considering a petition against the former’s decision to provide pension to madrasa teachers in the state. The order was  issued on a petition filed seeking to quash the Kerala Madrasa Teachers’ Welfare Fund Act, 2019, which is passed for disbursing pension and other benefits to madrasa teachers.

This is an ongoing case but it is pertinent to note that courts have consistently upheld the view that governments cannot finance any religious activity and such actions are unconstitutional. Article 46 of the Directive Principles of State Policy enshrined in the Constitution of India call upon the state to “promote with special care the educational and economic interests of the weaker sections of the people”.

Anomalies observed in recent payment of honorarium to religious workers in Andhra Pradesh:

In May, 2020, the Government of Andhra Pradesh made a one-time payment to religious workers who are facing hardship and distress of various religious institutions, as a measure of relief arising out of break out of COVID-19 Pandemic. A sum of Rs.33.92 crores was sanctioned out of Disaster Relief funds. The ratio of religious workers to population of that religion as per 2011 was highly irrational. While Christians constituted 1.39 % of the population of AP, Christian religious workers received 43.99 % of total amount paid out. Every 24th Christian in the state is a religious worker, if we go by 2011 census figures for the state of AP.

ANDHRA PRADESH – ONE TIME PAYMENT FROM DISASTER RELIEF FUNDS TO RELIGIOUS SERVICE RENDERERS – RELIGION-WISE FIGURES OF BENEFICIARIES VIS-À-VIS STATE POPULATION

POPULATION OF AP as per Census 2011% OF POPULATON% OF BENEFICIARES: TOTAL BENEFICIARIESTOTAL BENEFICIARIES
HINDUS4,48,75,69890.86 %45.70 %31,017
MUSLIMS36,17,7137.33 %10.31 %7,000
CHRISTIANS6,82,6601.39 %43.99 %29,841
OTHERS2,10,7280.42 %0.00 %0
TOTAL4,93,86,799100.00 %100.00 %67,858

This lead to a peculiar situation wherein, in some areas, the number of Christian religious workers was more than the actual number of Christians in the area. Sample figures from Prakasam district:

MANDALCHRISTIANSNO. OF PASTORS
Naguluppalapadu8475
Ballikurava8449
Pedda Aravidu1633

In addition, data obtained through RTI queries on the details of Christian religious workers who were paid honorarium showed that 60 % of Christian pastors in the sample were holding Hindu community certificates. This raised many questions and exposed a lack of strict scrutiny in the processing of applications for sanction of honorarium to religious workers.

RELIGIOUS COMPOSITION OF CHRISTIAN PASTORS WHO RECEIVED ONE TIME HONORARIUM FROM GOVT. OF AP

(Sample size 347)

CHRISTIAN39.19%
HINDU-SC42.94%
ST1.44%
HINDU-OBC9.51%
HINDU-OC4.32%
NA2.59%
TOAL100%

The present G.O. has laid out 3 eligibility criteria that have to be fulfilled by the applicants to be considered under the scheme.

(a)  Church should be registered under the Societies Act;

(b)  Land should be registered in the name of Church;

(c) The institution should not have any other source of income.

This is in addition to the existing conditions of the Christian religious worker holding a Christian community certificate and being a qualified Christian religious worker. However, the additional eligibility criteria have not gone down well with the Christian religious worker community. In videos and social media posts, they have been pointing out that most of the churches are not registered as societies and they have been functioning from premises owned/taken on rent by the religious worker on an individual basis. In some cases, the churches are functioning from structures raised on public land.  Christian community elders expressed the opinion that not more than 1,000 Christian religious workers will meet the criteria and thus eligible to receive a monthly honorarium. Well established churches, popularly known as mainline churches pay monthly salaries, have regular postings/transfers and promotions. Religious workers from such churches will be out of the purview of the present scheme.

Thus it will be interesting to see whether the present scheme, as outlined above, will stand judicial scrutiny if and when challenged in a court of law. Also, it will be keenly observed whether the government will heed the concerns raised by the Christian community and relax existing eligibility criteria.

Source:

https://www.organiser.org/Encyc/2020/9/10/Andhra-Pradesh-70-percent-Christian-pastors-who-received-govt-honorarium-hold-SC-OBC-caste-certificates.html

Muslim Candidate Gets Fake BC-E caste reservation certificate for Elections

The Musheerabad police of Hyderabad have booked a case in Crime No. 377/2020 under Sections 420, 466, 468 and 471 of the Indian Penal Code, following a complaint lodged by Musheerabad Tahsildar K Janaki, who said Inayat Khan was issued a BC-E certificate from Musheerabad.

Also, the case has been booked on the issuers and the people involved in the fake reservation certificate that was issued to Inayat Fatima. She is the sister in law of Congress leader Feroz Khan who was arrested for assaulting scribe.

The candidate Inayat Fathima Khan who was contesting from Vijaya Nagar Colony ward in the Hyderabad civic polls was issued a fraudulent OBC Certificate /  BC-E certificate from the Musheerabad mandal and on verification, no application made by her was found in the office.

The candidate resides in Nampally and she took the fake reservation certificate from the Musheerabad MRO and it resulted in the case bust.

At the MeeSeva office from where the application was made, the file was locked using a password denying access to the application document. During preliminary enquiry, it was also noticed that the Aadhar card details were false and facts were misrepresented, the Tahsildar said, demanding action against the guilty after investigation. Further investigation is going on.

Returning Home: My Reconversion Story – by Shimtihun Lyngwa

No, it’s not the immediate “Ghar Wapsi” effect; nor has the Rashtriya Swayamsevak Sangh have an impact in my life. My decision to leave the Christian faith and return to Niam Khasi didn’t just happen because of a few negative conversations, or a few isolated events — my decision was made because I realized I’ve been staying in the “wrong house” all these years. Two years ago, there would be no way in fiery hell that I could ever conceive of leaving the Christian faith. But here I am today.


I have received a lot of mixed reactions from being honest about my religious beliefs. For over a year, I had been terrified to tell anyone that I wasn’t a Christian anymore, because I was afraid of all the relationships I would lose, and all the people that would distance themselves from me. To me it feels like there’s a tremendous stigma in a lot of Christian circles about people leaving the church, and this assumption that I’m not a good person, or a person Christians can be friends with, because my views are now so different.


A lot of Khasi Christians I had met would refer to other Khasis who still followed the indigenous faith as “non-believers” and talk about them in a sort of vernacular that reflected an “us versus them” attitude, as though these “non-believers” were a part of the community, and that the community was a dirty and unreligious place filled with all sorts of depravity. “We are of the Khasi Community, but not of the Khasi Community,” is a catch-phrase I often heard, and while I appreciate holding onto certain Christian values about one’s conduct in life, I didn’t want people to think of me as “of the Khasi Community” — when they were thinking of the Khasi Community as such a terrible, unreligious place.

I was really scared of telling people. What I started to realize though, is that people had been distancing themselves because of my religious views, and that I didn’t want those kind of people in my life. I would rather be friends with people who would love me, regardless of my religious beliefs. And I am very happy and grateful to say that I do still have friends that are Christians, and our beliefs and views are very different, but that hasn’t had an effect on our friendship. That was very huge and important to me, Other people have, yes, chosen to distance themselves from me, or let our friendship “fade away” or have told me they were disappointed in me, or even worse, call me a hypocrite or tell me I’m going to hell, or try and “re-convert” me.


A lot of Christians I know have used the bible to justify slavery. And I have no idea how to interpret the stories in the Bible where God commands people to commit genocide, or God destroys populations and wipes out cultures, and tears entire cities to the ground, or floods the world sparing only one family and a bunch of animals. But even fast-forwarding to today, it feels like so many Christians I met were content to pick-and-choose the parts of the Bible they would follow.


There is a clear double standard in many Christian denominations in this Christian State, and because of that, churches are actually not a place for fellowship for everyone. One person told me, in a conversation we were having about abortion and human rights, that if a child gets raped, she has to keep the baby. I know that these attitudes are reflective of the extreme and fundamentalist side of religious belief, but regardless, these were people I personally knew and connected with that said this to me, and I never thought I had come from a place and had relationships with people who could demonstrate such intolerance.


Morally and ethically, I cannot follow a religion that would advocate such hate, judgment, and ignorance. I know that a lot of Christians do a tremendous deal of good things in society, and advocate on behalf of many oppressed people, but I still really sorely miss the critical conversations where these double standards exist in the Bible, the interpretation, and how that enacts itself in the world, and wish for more Christian leaders to speak about these issues. So maybe it should be up to me to fix the church, but it got to a point where I started to realize this kind of hate is larger than just a problem that needs to be fixed, but that it is ingrained into a really big part of Christian culture in the so-called “Christian State” of Incredible India.


So many church denominations are content to split up if they disagree; people believe so strongly and fervently in their interpretation of the Bible that they would sooner split up their church denomination than actively dialogue and try to understand one another. And for all of the things I can do, I cannot go up against that kind of strength of belief — to many, it is church doctrine, and not something that simply changes.
But why did I decide to return home to Niam Tynrai? I could recall the time where I “was moved by an overwhelming presence” during a climb to Lum Sohpetbneng, where everything felt very different, and I clearly felt a “sacredness” to everything and everyone gathered there. I could feel that “holy presence” every time I’m at the sacred Lum Sohpetbneng, and I can never seem to forget that feeling. But I believe I’m not the only one. There are a lot of Khasi Christians out there who weren’t given a “choice”.

There seems to be an assumption that because I’m not a Christian anymore, I no longer believe in God, but I do very much, and still wish to be included in the dialogue. There is a very fine and delicate balance between the relationship of people based on their religious beliefs, allowing room for dialogue, and the opportunity to learn from one another. Like the lesson I learned so long ago, it is difficult, but so right to exist in the liminal experience that is being able to be wrong, and being willing to learn from one another, and, like that speaker who spoke at Lum Sohpetbneng, have the courage to hold your true faith and ideas in an open hand, and truly see what it is they are made of.


Mahatma Gandhi once asked Christian missionaries, “If you feel that only conversion to Christianity is the path to salvation, why don’t you start with me or Mahadev Desai? Why do you stress on conversion of the simple, illiterate, poor and forest-dwellers? These people can’t differentiate between Jesus and Mohammad and are not likely to understand your preachings. They are mute and simple, like cows. These simple, poor, Dalit and forest-dwellers, whom you make Christians, do so not for Jesus but for rice and their stomach.”

This quote on religious conversion by the Father of the Nation got the hackles up of the Christian community. If we would have asked a similar question to Christian missionaries who came to the Khasi Hills early in the 19th century, we could have avoided this mass religious conversion altogether. But it’s never too late to return back home. I have; so should you.


(Email: shimtilyngwa@gmail.com)

Source: The Shillong Times (https://theshillongtimes.com/2020/09/01/my-reconversion-story/)