स्वतंत्र भारत में औपनिवेशिक प्रकल्प का परिशिष्ट : ‘नैरेटिव’

किसी भी राष्ट्र को परतंत्र बनाकर उसके निवासियों कोअपनी ही परतंत्रता रक्षक बनाने
के वैचारिक प्रकल्प को ‘नैरेटिव’ कहते हैं, इसके अनुसार राष्ट्रीय भावना को विकसित करने
वालेतत्वों पर ही अविश्वास करनेकी वैचारिक संस्कृति को बढ़ावा दिया जाता है। इस्लामिक
उपनिवेशवाद और यूरोपीय उपनिवेशवाद के बाद स्वतंत्र भारत मेंवैचारिक उपनिवेशवाद की
बेड़ी में जकड़े भारतवर्ष को इस ‘नैरेटिव’ से सावधान करनेऔर इसके मूलोच्छेदन का संकल्प
दिलानेके लिए हैदराबाद विश्वविद्यालय में राष्ट्रवादी बौद्धिकों के प्रकल्प ‘विवेकानंद यूथ
फ़ोरम’ के तत्वावधान में ‘Interactive Discussion On Narrative’ नामक
संगोष्ठी का आयोजन किया गय; जिसमें उपकुलपति प्रो. श्री आर एस सर्राजू जी के
उपस्थिति में अतिथि श्री आयुष जी (CEO, ADROITEC) ने नैरेटिव की विशद
व्याप्ति, उसके मिथ्यापवाद तथा राष्ट्र निर्माण के प्रमुख बाधक तत्व के रूप में उसकी
दुरभिसंधियों का विश्लेषणात्मक परिचय प्रस्तुत किया।

प्रो सर्राजूगारू नेअकादमिक प्रविधि की त्रुटिपूर्णता की ओर ध्यान दिलातेहुए कहा
कि विज्ञान में प्रयुक्त शोध प्रणाली का मानविकी तथा समाजिकी में यथारूप प्रयोग करना
भयंकर होता हैक्योंकि कालप्रवाह में मानविकी आगे चला जाता है जिसके सामाजिक प्रभाव
को पूर्ववत नहीं किया जा सकता है। सामाजिक विमर्शों के नाम पर प्रतिभाव प्रेरित नाना
प्रकार की अस्मिताओ को जन्म देकर सामाजिक विद्वेष फैलाना हमारा ध्येय कभी नहीं होना
चाहिए। हमारा ध्येय ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ है।

विश्वविद्यालय परिसर मेंव्याप्त नैरेटिव आधारित विद्वेष के माध्यम से अकादमिक
जगत में इसकी व्याप्ति का गहरा संकेत प्राध्यापक श्री रावुलु कृष्णा जी ने प्रस्तुत किया।
तत्पश्चात् शोधार्थी श्री समर कुमार पाढ़ी ने वैयक्तिक गीत प्रस्तुत किया। इसके पश्चात्
वक्ता श्री आयुष जी नेअपनेविचार प्रतिपादित किए।

अपनी विचार प्रस्तुति की भूमिका के रूप में विभिन्न प्रकार के ‘इंडेक्स’ जैसे हैप्पीनेस
इंडेक्स, डेमोक्रेटिक इंडेक्स, रिलीजियस फ़्रीडम इंडेक्स इत्यादि में भारत के हास्यास्पद रैंकिंग
का स्मरण दिलाते हुए इसकी आधारहीन विद्वेषिता को उजागर किया। उन्होंने कहा कि भारत
जबकि विश्व की पाँचवीं सबसेबड़ी अर्थव्यवस्था है, विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या का
भरण-पोषण कर रहा है, फिर भी इसे ‘विकासशील’ पहचान से आगे जाने की अनुमति प्राप्त
नहीं है। सच्चाई तो यह है कि इन इंडेक्स में शीर्ष पर सुशोभित देशों की या तो जनसंख्या
नगण्य है या वो भारत से कहीं अधिक अराजकता से व्याप्त हैं। विद्यालयों में खुलेआम
गोलीबारी हो जाती है, जिसको मन करता है वही बंदूक़ लेकर हत्या कर देता है। बंदूक़ और
ड्रग संस्कृति को जानबूझकर पोसने वाले देश स्वयं को श्रेष्ठ दिखाकर रैंकिंग करवाएँगे तो यही
परिणाम होना है। जब भेड़िया का राज हो तो नृशंसता नैतिक कर्तव्य माना ही जाएगा।

भारतीय राष्ट्रीय एकता को विरल करनेके लिए इसे ‘No Nation’ , ‘Nation in Making” या
‘Conglomerate Nation’ के रूप मेंव्याख्यायित किया जाता रहा है ताकि इस बात का सामाजिक
प्रचार देश को विखंडित अस्मितामूलक अराजकता का अखाड़ा बना सके। उत्तर-दक्षिण,
आर्य-द्रविड़, सवर्ण-दलित, नॉर्थईस्ट- मेनलैंड, आदिवासी-मुख्यधारा का द्वन्द मार्क्सवादी वर्ग
संघर्षके ‘टूल’ का रूपांतरण है जो समाज को दो ख़ेमों में बाँट कर अस्थिरता पैदा करने का
एक औज़ार है। उत्तर दक्षिण क्षेत्र मात्र का द्योतक है इसे सामाजिक स्वरूप देना निहायत ही
विद्वेषपूर्ण है। आर्य- द्रविड़ के पीछे कोई वैज्ञानिक तार्कि क कारण नहीं है। हेत्वाभास के
आधार पर खड़ा किया गया यह द्वन्द के वल संघर्षको जन्म दे रहा है। एक समय इसके आधार
पर खड़ा किया गया संघर्ष; अब जब इसके तथ्य बदल गए हैं, तो भी अपने उसी स्वरूप में
कार्यरत है ; जो हमें सर्राजू सर के निष्कर्षकी याद दिलाता है कि इसे ‘UNDO’ नहीं किया
जा सकता। यह व्याख्याओ का मनमाना पन ही है जिसका सामाजिक प्रभाव विध्वंसात्मक
होता है। सवर्ण और दलित का सामाजिक जीवन अलग अवश्य रहा है लेकिन साथ ही
अन्योन्याश्रित भी रहा है। किसी प्रकार की अमानवीयता का कोई उदाहरण नहीं मिलता है।
जबकि एकता के कई सूत्र ऐतिहासिक साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत हैं। महाराणा प्रताप के साथ
लड़नेवाले भील आज के ST हैं, शिवाजी महराज के साथ लड़ने वाले समाज के ऊपर से
लेकर नीचे तक सभी वर्गों के महाबली थे। विद्वेष के जो उदाहरण आज उपलब्ध हैं वो
औपनिवेशिक समय में फूट डालनेके लिए प्रक्षिप्तांश के रूप मेंग्रंथों में जोड़ दिए गए थे। ग़ैर
सवर्णों के आर्थिक वंचना का नया नैरेटिव गढ़ा जा रहा है। भारत अठारहवीं शताब्दी तक विश्व
की सबसेबड़ी अर्थव्यवस्था रहा है, जो उत्पादक जातियों के स्वस्थ सामाजिक स्थिति का
परिचय देता है। ये उत्पादक जातियाँही आजकल ग़ैर सवर्णों में शामिल हैं जैसे- बढ़ई,
कुम्हार, बुनकर, माली, किसान, स्वर्णकार, लोहार, शिल्पी इत्यादि । भारत में गिरिवासी,
वनवासी, ग्रामवासी, नगरवासी सभी भारतवासी हैं। इससे अलग भारतीय विचारों में कोई
स्थापना नहीं है ; ये सारी स्थापनाएँ पाश्चात्य नरेटिव की देन है।

हिंदी थोपने का एक नैरेटिव चलाया जाता रहा है। श्री आयुष जी प्रश्नात्मक मुद्रा में
कहतेहैं – कौन हिंदी थोप रहा है! जिसे हिंदी भाषी कहते हैं उनकी भी भाषा हिंदी नहीं है। हिंदी
गढ़ी गयी भाषा है, जिसे राष्ट्रीय सम्पर्क की भाषा के रूप में सभी ने एकमत से स्वीकार किया
है। हिंदी सिनेमा के कई बड़े कलाकार बंगाली, मराठी, पंजाबी, सिंधी इत्यादि हैं।

शिक्षा की वंचना का नरेटिव- आयुर्वेद, गंधर्ववेद, शिल्पवेद, आर्थिकी, सैन्य विद्या,
इत्यादि सभी को प्राप्त थे। किसी के लिए भी इनमें वंचना का प्रावधान नहीं था। फिर यह
कहने का क्या आधार हो सकता है धूर्तता के कि शिक्षा सेवंचित किया गया था।

देश की सामाजिक शक्ति इसकी सबसे प्रबल शक्ति है। आजकल इसपर ही सबसे
ज़्यादा प्रहार हो रहा है। कभी विवाहेत्तर सम्बन्धों को न्यायसम्मत ठहराया जाता है, तो कभी
समलैंगिकता को। विवाह की आयुसीमा बढ़ाकर यौन संबंध बनानेकी आयुसीमा को घटा
दिया जाता है। हिंदू त्योहारों पर नकारात्मक दुष्प्रचार, तथा हिंदू धर्म को कुरीतियों का
कोंगलोमेरेट सिद्ध किया जा रहा है। स्त्री मुक्ति के नाम पर अराजकता को प्रश्रय देना,
स्वतंत्रता के नाम पर नशेबाज़ी, जागरूकता के नाम पर अराजक धरना-प्रदर्शन सभी इसी
नैरेटिव से उत्पन्न है।

आवश्यकता है हम नैरेटिव के विषय में जागरूक हों और जागरूकता का प्रसार करें।
इसके दुष्प्रभावों को समझें और समाज में भी इसका प्रचार करें। समाज कार्यों मेंसकारात्मक
रचनात्मकता के द्वारा ही इसके प्रभावों को सीमित किया जा सकता है।

कार्यक्रम का संचालन और विषय का परिचय साकेत बिहारी ने प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम के आयोजन और इसकी व्यवस्था को सुचारु बनाने में बालाराजू, सुदर्शन रेड्डी,
कृष्णा नायक जी, एवं अन्य सहयोगियों नेअपना अथक सहयोग दिया।

प्रश्नोत्तर काल में सुधी श्रोताओ की सक्रिय भागीदारी ने विषय की गम्भीरता और उसके आवश्यक प्रभाव को
स्पष्ट कर रहे थे। उपस्थित विद्यार्थियों, शोधार्थियों में हैदराबाद विश्वविद्यालय के अतिरिक्त
मौलाना आज़ाद नैशनल उर्दू यूनिवर्सिटी, IIIT के भी सामाजिक चिंतक और एकेडेमिसीयन भी
थे। सबने एक स्वर में विषय की गम्भीरता और आवश्यकता पर अपना मत प्रकट किया तथा
इस शृंखला में विभिन्न विषय क्षेत्रों में व्याप्त नैरेटिव पर संवाद की प्रक्रिया को आगेबढ़ानेकी
आवश्यकता अनुभव की।

रिपोर्ट:-
साकेत बिहारी पाण्डेय
शोधार्थी, हिंदी विभाग
हैदराबाद विश्वविद्यालय

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