Shri Guruji on Telangana in 1973

तेलंगाना पर पूज्य श्री गुरूजी और पूज्य स्वामी विश्वेश्वर तीर्थ के बीच हुए वार्तालाप – ६ फरवरी १९७३, उडुपी

स्वामीजी – आन्ध्र प्रदेश के विभाजन के लिए तीव्र आन्दोलन हो रहा है l

गुरूजी – दोनों ही ओर जन आन्दोलन का इतना अधिक प्रभाव और इतनी अधिक पकड़ दिखाई दे रही है, कि आन्ध्र और तेलंगाना के रूप में आन्ध्र प्रदेश के विभाजन की संभावना प्रतीत हो रही है l

इस समस्या का दुखदायी पहलू केवल यही है कि हिम्साचार, बसों, रेलों, डाक – तार जैसी सार्वजनिक संपत्ति की क्षति होने के उपरांत तथा उभय क्षेत्रों के बीच गहरी कटुता उत्पन्न हो जाने के बाद ही यह हल होगी l

 किसी आन्दोलन द्वारा हिंसक रूप धारण करने के बाद ही किसी माँग को स्वीकार करने का प्रदेश व केंद्र सरकारों का दृष्टिकोण तथा आन्दोलानकारीयों का क़ानून व्यवस्था की दृष्टि से विचार न करना अत्यंत खतरनाक है l क्योंकि इससे वैधानिक शासन के प्रति लोगों में आदर की भावना कम होगी l अतः हिंसा की प्रतीक्षा क्यों की जानी चाहिए ? यदि माँग न्यायपूर्ण और तर्कसंगत है, तो उसे स्वीकार कर लिया जाये l

जहाँ तक आन्ध्र प्रदेश की इस समस्या का प्रश्न है, आन्ध्र ( समुद्र तटीय) और तेलंगाना, विभाजन की माँग कर रहे है, इसे स्वीकार किया जा सकता है l एक ही भाषा के एक से अधिक प्रदेश बनाने में कोई हानि नहीं है l युद्ध की दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं सीमावर्ती क्षेत्रों में अधिक प्रदेशों का निर्माण करते समय, सतर्कता आवश्यक होती है l किन्तु असम, नेफा, मणिपुर, त्रिपुरा क्षेत्रों से नागालैंड, मेघालय, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश जैसे छोटे-छोटे प्रदेश अराष्ट्रीय शक्तियों के दबाव में आकर जब बनाये जा सकते है, तब फिर सौहार्दता के साथ आन्ध्र प्रदेश का विभाजन क्यों न कर दिया जाए ?

वास्तव में भाषा के आधार पर प्रदेशों का पुनः गठन अपने आप में एक गलत कदम था l अब भी भाषा के आधार पर नहीं अपितु प्रशासनिक सुविधा आदि का ध्यान रखकर नए सिरे से प्रदेशों का पुनरगठन हो, तो विघटन की प्रक्रिया रुक जाएगी l मेरा अभी भी यह मत है कि शासन की एकात्म-प्रणाली अपने देश के लिए सर्वाधिक अनुकूल है l

गुरूजी समग्र – Vol ९, Pg २५६

Translated into English 

Shri Guruji on the demand for Telangana on 6th Feb, 1973 at Udupi – In discussion with Pujya Swami Visweswara Teertha.

 The division of Andhra Pradesh seems imminent. The tragedy however is that this would happen only after a lot of violence and a bitterness among both areas. 

 It is a practise of the state and central governments, not to heed to people’s movements unless they become violent. At the same time, the people leading the movements make a mockery of law and order. This is dangerous because it leads to a a lowering of respect of constitution and law in the eyes of the people. If the demand is logical and just, why should the government wait till it gets violent ?

 As far as the issue of the division of Andhra Pradesh is concerned, the division of the state into coastal Andhra and Telangana must be accepted. There is no harm in forming more than two states of people speaking the same language.

 Coastal states have a big role to play in the security of a country and therefore a lot of care needs to be taken while making decisions on the same. It is unfortunate that very small states like Assam, NEFA, Maniour, Tripua, Arunachal Pradesh were formed due pressure from anti-national forces. However, the division of Andhra Pradesh is a formation which is not due to pressure from anti-national forces. Why not allow a smooth formation of two states ?

 In fact, the formation of states on the basis of language is in itself a wrong step. Even now, I suggest the formation of states must be on the basis of administration convenience. This would strengthen the country and will stop creation of fissures. I am also of the opinion that an Integral system of government would be best suited for our country.

Shri Guruji Samagra – Vol 9, Pg 256

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